Jainism

अध्यात्म – एक रहस्यमय विज्ञान

सदा से ही मानव मन अति जिज्ञासु है। प्रकृति के रहस्यों के प्रति उसकी जिज्ञासा तो कमाल की ही है जिसके फलस्वरूप वर्तमान जगत भौतिक सुविधाओं की चकाचोंध में मस्त हो रहा है। इसी प्रकार प्राचीनकाल से ही जिज्ञासु मनीषियों की जिज्ञासा का केन्द्र यह जानने-देखने वाला, सुख-दुख का अनुभव करने वाला आत्मा भी रहा है। परन्तु वास्तव में आत्मा इतना अमूर्त व रहस्यात्मक पदार्थ है कि उसके बारे में कोई एक मत नहीं बन पाया और फलतः अनेक मत-मतान्तर आज विश्व में प्रचलित है। परन्तु आत्मा के बारे में यथार्थ तो कोई एक ही हो सकता है क्योंकि प्रत्येक वस्तु का स्वभाव सुनिश्चित देखा जाता है और उसमें विचलन संभव ही नहीं हैं क्योंकि वस्तु स्वयं अपने स्वभावरूप परिणमन द्वारा एकपने की ही घोषणा करती है।

अस्तु अध्यात्म की रहस्यात्मकता पर चर्चा करने से पूर्व यह जानना समीचीन होगा कि अध्यात्म शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है ?

अध्यात्म का अर्थ एवं स्वरूप:- आत्मनि अधि-विग्रह, अव्ययी भाव समास के द्वारा अध्यात्म शब्द निष्पन्न होता है जिसका अर्थ है-आत्मा का है आधार जिसका अथवा आत्मा के आधार से जो होता है उसे अध्यात्म कहते हैं।

इस प्रकार मुख्यतः आत्म द्रव्य, आत्मा के ज्ञान, दर्शन, सुख आदि स्वभाव, आत्मा के स्वाभाविक एवं वैभाविक परिणाम (पर्यायें) तथा गौण रूप से आत्मा के साथ संयोग रूप में रहने वाले शरीरादि अचेतन पदार्थ, गतियाँ, इन्द्रियाँ, द्रव्य प्राण, कर्म आदि का आधार आत्मा भी होने से ये सब अध्यात्म के अन्तर्गत अध्ययन के विषय हैं।

देखा जाये तो अध्यात्म शब्द, दो शब्दों से मिलकर बना है:-

अध्यात्म = अधि + आत्म

‘अधि’ शब्द का साहित्य में निम्न तीन अर्थों में प्रयोग हुआ है। जैसे अधि अर्थात्

1. जानना जैसे अध्ययन,

2. महत्वपूर्ण होना जैसे अधिक और

3. निकटवर्ती होना जैसे अध्यग्नि अर्थात विवाह संस्कार की अग्नि के निकट।

आत्म या आत्मा अर्थात् जानने-देखने वाला, सुख-दुख का अनुभव करने वाला चेतन पदार्थ।

अब अधि शब्द के तीनों अर्थों को आत्मा शब्द के साथ लगाकर देखने पर अध्यात्म शब्द के तीन अर्थ होते हैं जो निम्न प्रकार हैं:-

(1) अध्यात्म = अधि + आत्म = जानना + आत्मा अर्थात् आत्मा का ज्ञान या आत्मा को जानना

अतः अध्यात्म शब्द का प्रथम अर्थ होगा – आत्मा को सम्पूर्णतः एवं यथार्थतः जानना, द्रव्य-गुण-पर्याय रूप से जानना, विभिन्न दृष्टिकोणों से जानना।

(2) अध्यात्म = अधि+आत्म = आत्मा का महत्वपूर्ण होना/लगना। अर्थात् अन्य समस्त सांसारिक जड़-चेतन वस्तुओं की तुलना में आत्मा का (अपने आत्मा का) अधिक या महत्वपूर्ण लगना। फलतः निज आत्मा के प्रति रूचि उत्पन्न होना।

(3) अध्यात्म = अधि+आत्म =आत्मा के निकटवर्ती होना। अर्थात् आत्मा को आत्मपने से जानना, अनुभव करना, उसमें लीन होना।

उक्त तीनों अर्थों को समेकित रूप से देखा जाये तो अध्यात्म शब्द का अर्थ व प्रयोजन दोनों स्पष्ट हो जाते हैं।

सर्व प्रथम आत्मा के स्वरूप को यथार्थतः विशिष्ट ज्ञानियों से व आगम/सत् शास्त्रों के अभ्यास पूर्वक जाना जाये तथा अपने विवेक एवं अनुभव की तुला पर उसके स्वरूप का निर्णय/निर्धारण किया जाये। यदि आत्मस्वरूप का सही निर्णय किया गया है तो सहज ही उस व्यक्ति को अपना आत्मा ही पूर्ण शुद्ध, स्वतन्त्र एवं सर्व महत्वपूर्ण प्रतीत होगा। क्योंकि आत्मस्वरूप का सम्यक् परिज्ञान होने पर यह समझ में आ जाता है कि जीव के सारे क्रिया-कलाप (ज्ञान, सुख आदि) परपदार्थों के हस्तक्षेप या सहयोग बिना उसकी अपनी स्वरूप सामथ्र्य से यथासमय होते हैं तथा उसमें ही होते हैं। अतः ज्ञान व सुखरूप अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिये अपना आत्मा ही आश्रयभूत होने से महत्वपूर्ण प्रतीति में आता है। इस प्रकार अपने निज शुद्धात्मतत्त्व के ही पूर्ण, शुद्ध स्वतन्त्र एवं सर्वोपरि हितसाधक ज्ञात होने पर जीव में अपने उस पूर्ण शुद्ध आत्मा के प्रति रूचि एवं श्रद्धा उत्पन्न होती है और उसके निकटवर्ती होने का पुरूषार्थ प्रारम्भ होता है। निकटवर्ती होने का अर्थ है – जीव जो अपनी दर्शन-ज्ञान शक्ति के द्वारा अब तक परपदार्थों (इन्द्रियों द्वारा ग्रहण की जाने वाली भोग सामग्री) को ही अपने हितरूप मानकर उनको देखने-जानने में ही लगा रहता था, अब उनसे उदासीन होकर, उन परपदार्थों एवं उनके गुण-पर्यायों (कार्याें) के प्रति उपेक्षा भाव रखता हुआ स्वयं को ही सर्वोपरि मानता हुआ निज-ध्रुव-शुद्धात्मा को ही जानने, अनुभव करने तथा उसमें ही लीन होने हेतु उद्यत होता है।

यह स्वाभाविक भी है क्योंकि जो भी कोई वस्तु या व्यक्ति हमें महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं, उनके प्रति हमारी रूचि उत्पन्न हो जाती है। हम उनका अनुभव करने (उनके निकटवर्ती होने) का प्रयत्न करते ही हैं।

इस प्रकार अध्यात्म शब्द का अर्थ है अपनी आत्मा को जानकर, उसे महत्वपूर्ण-सर्व प्रकार से उपादेय समझकर उसके निकटवर्ती होने का अर्थात् उसमें लीन होने का सम्यक्-सार्थक प्रयत्न करना। यही अध्यात्म का एक मात्र प्रयोजन भी है।

इस अध्यात्म का आधार आत्मा ही है। अतः यथार्थतः अध्यात्म आत्मा में, आत्मा के लिये, आत्मा के आधार से आत्मा द्वारा ही उत्पन्न / प्रवर्तित / क्रियाशील होता है। अतः वास्तव में तो अध्यात्म में आत्मा से भिन्न बाह्य चेतन-अचेतन पदार्थों की कोई भूमिका अथवा उपयोगिता नहीं रहती।

उक्त विवेचन से यह तथ्य भी स्वतः ही सिद्ध है कि आत्मा से भिन्न सारे ही सांसारिक पदार्थ, आत्मा के संयोग में रहे हुये शरीरादि पदार्थ एवं उनके निमित्त से होने वाले आत्मा के शुभाशुभ भावों का ज्ञान व भूमिकानुसार प्रवृत्ति प्रारम्भिक दशा में उपयोगी होने पर भी सदैव ही अध्यात्म (आत्मानुभूति) के क्षेत्र-सीमा से बाहर ही रहते हैं।

अध्यात्म की आवश्यकता:- यह एक सर्वज्ञात एवं अनुभूत तथ्य है कि जगत के सारे ही प्राणी सुख चाहते हैं और दुख से डरते हैं। सभी जीवों के सारे ही क्रियाकलाप परनिरपेक्षतः स्वयं को सुखी करने की भावना से ही प्रेरित होते हैं। वह सुख अनुभूतिपूर्वक होता है, और अनुभूति ज्ञानपूर्वक होती है। अतः यह सिद्ध है कि सुख व ज्ञान साथ साथ चलते हैं।

आत्मा एक अमूर्त पदार्थ है जो इन्द्रियों से जाना नहीं जाता। अतः संसार दशा में अनादि काल से ही इन्द्रियों से ही रचित इस शरीर में रहने वाला आत्मा इन्द्रियों की अधीनता में रहता हुआ, इन्द्रियों के अनुकूल विषयों में ही सुखबुद्धि मानता हुआ, इन्द्रियों के विषयभूत जड़ भोगसामग्री की प्राप्ति व उनके भोग उपभोग में ही मग्न रहता हुआ स्वयं को सुखी मानता आ रहा है। परन्तु वास्तव में कुछ काल बाद ही एक विषय में अतृप्ति एवं अरूचि का अनुभव करता हुआ, फलतः दुखी होता हुआ पुनः किसी अन्य इष्ट वस्तु की प्राप्ति व उसके सेवन के लिये प्रयत्नशील हो जाता है। और इस तरह उसका यह प्रयत्न निरन्तर चालू रहता है। वह भोगों की आकांक्षाजनित दुःख से पीडि़त जीव मृगमरीचिका में जल की कल्पना से पीडि़त हरिण की भांति निरन्तर आकुलित ही रहता है। यह इस बात से भी सिद्ध है कि प्रचुर भौतिक सुख समृद्धि के बीच रहने वाले धनिक भी अनेक प्रकार के दुःखों से पीडि़त देखे जाते हैं। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रियों के विषयों के संग्रह व सेवन में सुख नहीं है अतः सुख जड़ पदार्थों का स्वभाव भी नहीं है।

परन्तु सुख अथवा दुःख का अनुभव किया जाना यह एक यथार्थ है अतः सुख-दुःख कहीं तो होना चाहिये, सुख किसी वस्तु का स्वभाव / शक्ति होना चाहिये क्योंकि स्वभाव ही व्यक्त होता है। जब यह सुख जड़ पदार्थों में नहीं है तो इसे वहाँ होना चाहिये जहाँ इसका अनुभव किया गया है। नींद में स्वप्न देखते समय अनेक विषयों के सेवन व स्थितियों के अनुभवजनित सुख के वेदन से भी यह सिद्ध है कि सुखानुभूति परपदार्थ निरपेक्ष आत्मा का कार्य है जो आत्मा में आत्मा से ही सहज होता है।

इस प्रकार सुख आत्मा का स्वभाव सिद्ध होता है और दुःख उसका विभाव अथवा विकार। अतः सुख की खोज बाह्य पदार्थाें में न करके अपने आत्मा में ही की जानी चाहिये कि जहां वह अनुभव किया जाता है।

इसी प्रकार ज्ञान भी ज्ञेय पदार्थों के आश्रित न होकर आत्मा का सहज स्वतन्त्र स्वभाव सिद्ध होता है क्योंकि आत्मा में ज्ञान नामक एक शक्ति/स्वभाव है जो स्व एवं परपदार्थोें को जानने की सामथ्र्य वाला है। अनादि से ही जीव की यह अज्ञानमय मान्यता रही है कि ज्ञान परपदार्थों से होता है, उनकी ओर उन्मुख होने पर होता है और वह पदार्थों का ज्ञान होता है। आत्मा स्वयं सहज ही ज्ञेय निरपेक्ष रहता हुआ ही पदार्थों को जानने की सामथ्र्य वाला है इस ओर किसी की दृष्टि नहीं जाती। स्वप्न में होने वाला पदार्थों का ज्ञान इस बात को सिद्ध करता है कि जानने के लिये पदार्थों का सामने होना आवश्यक नहीं है और पदार्थ सामने होने पर ज्ञान हो ही जाये ऐसा भी आवश्यक नहीं है क्योंकि कई बार ध्यान अन्यत्र होने पर वस्तुएं सामने से निकल जाने पर भी उनका ज्ञान नहीं हो पाता और कई बार गूढ़ समस्याओं के समाधान भी अनायास ही सूझ जाते हैं।

विश्व के महान वैज्ञानिकों द्वारा पूर्व में अज्ञात वैज्ञानिक सिद्धान्तों का आविष्कार एवं उनके आधार पर निर्मित वैज्ञानिक उपकरण आत्मा के सहज ज्ञान स्वभाव की सामथ्र्य के ही परिचायक हैं। अनेक स्कूली शिक्षा से वंचित सामान्यजनों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में अर्जित उपलब्धियाँ भी उनके सहज ज्ञान एवं विवेक की सामथ्र्य का ही प्रतिफलन है।

अतः सुख के समान ही ज्ञान भी आत्मा का ही सहज परनिरपेक्ष स्वभाव होना चाहिये।

इस प्रकार सुख व ज्ञान आत्मा का स्वभाव है अतः ऐसे आत्मा के आश्रय से ही यथार्थ सुख का अनुभव व ज्ञान का पूर्ण विकास सम्भव है और यहीं पर अध्यात्म की आवश्यकता सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार आत्मा का पूर्ण सुखी (वीतरागी) व पूर्ण ज्ञानी (सर्वज्ञ) होना यह अध्यात्म के बिना (निज आत्मा के ज्ञान, रूचि व लीनता रूप पूर्ण समर्पण के बिना) संभव नहीं है और यह पूर्णता ही अध्यात्म का वरदान है।

अध्यात्म का लक्ष्य: उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अध्यात्म का लक्ष्य आत्मा को अज्ञानजनित दुःख, मोह-राग-द्वेषादि विकारों, अल्पज्ञता आदि अपूर्णताओं से मुक्त करना और आत्मिक अतीन्द्रिय पूर्ण ज्ञान व सुख की उपलब्धि रूप पूर्ण मुक्त दशा-सिद्धत्व की प्राप्ति कराना है।

अध्यात्म की सीमा- अध्यात्म अमूर्त आत्मा का विज्ञान है अतः इसका मुख्य विषय तो आत्मा एवं सुख प्राप्ति हेतु उसमें होने वाले प्रयत्न एवं क्रियाएं ही हैं। यह संसारदशा में आत्मा के साथ संयोग सम्बन्ध होने से अन्य भौतिक जड़ पदार्थों का भी यथोचित अध्ययन करता है, परन्तु अन्य भौतिक विज्ञानों की तरह जड़ पदार्थों की शक्तियों का गहन अध्ययन-विश्लेषण इसका विषय नहीं है क्योंकि इसका उद्देश्य तो आत्मा व जड़ पदार्थों के मध्य देखे व माने जाने वाले निमित्त-नैमित्तिक, कत्र्ता-कर्म एवं भोक्ता-भोग्य आदि अनेक प्रकार के सम्बन्धों की यथार्थता का ज्ञान कराकर आत्मा की अन्य पदार्थों व स्वयं की शक्तियों के सम्बन्ध में अज्ञानमूलक भ्रान्तियों का निवारण करना है ताकि आत्मा की पराधीन वृत्तियों का अभाव होकर स्वाधीन आत्मिक जीवन का प्रारम्भ हो सके। कहा भी है – ‘पराधीन सपने हु सुख नाहीं’।

अध्यात्म की प्रकृति:- प्रत्येक विषय की प्रकृति के सम्बन्ध में एक प्रश्न सदैव ही उत्पन्न होता है कि वह विज्ञान है या कला। आगे इसी सम्बन्ध में विचार किया गया है।

अध्यात्म एक विज्ञान है:- किसी भी वस्तु या वस्तुओं से सम्बन्धित सत्य, क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित ज्ञान विज्ञान कहलाता है। साथ ही विज्ञान के अन्तर्गत खोजे गये नियम या सिद्धान्त सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक होते हैं। यह भी सुविदित तथ्य है कि सभी वस्तुओं में कुछ सामान्य गुण होते हैं और कुछ विशेष गुण होते हैं। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से पदार्थों में पाये जाने वाले द्रव्यमान, जड़त्व, गुरूत्व, घनत्व आदि सामान्य गुण हैं तथा प्रत्येक द्रव्य में उसके अपने विशेष गुण भी होते हैं जिनसे वह अन्य द्रव्यों से पृथक जानने में आता है। जैसे सोने व लोहे के, नमक व शक्कर के विशेष गुण स्पष्ट ही भिन्न भिन्न होते हैं। प्रयोगशालाओं में प्रयोग करने पर वे वैज्ञानिक सिद्धान्त तथा गुण सत्य सिद्ध होते हैं, जो वैज्ञानिक सिद्धान्तों की प्रामाणिकता का समर्थन करते हैं।

यदि अध्यात्म को भी विज्ञान की कसौटी पर कसा जाय तो अध्यात्म भी एक विज्ञान है ऐसा सिद्ध होता है क्योंकि सभी द्रव्यों में सामान्य व विशेष गुण पाये जाते हैं जैसे सभी जीवों में पाये जाने वाले दर्शन, ज्ञान व सुख आदि जीव के विशेष गुण हैं तथा अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व आदि चेतन-अचेतन सभी द्रव्यों में पाये जाने से सामान्य गुण हैं। विभिन्न पदार्थों के सम्बन्ध में, अध्यात्म के सिद्धान्त यथा – स्वतन्त्र परिवर्तनशीलता, अकत्र्ता एवं अभोक्ता स्वभाव, निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध, कर्म सिद्धान्त आदि अनेक सिद्धान्त सार्वकालिक व सार्वभौमिक सिद्धान्त हैं, जो लौकिक जीवन का गहन विशलेषण करने पर अथवा तो अनुभव की कसौटी पर कसने पर सत्य सिद्ध होते हैं।

जिस प्रकार आधुनिक विज्ञान तर्क, अनुमान, प्रयोग एवं अनुभव के आधार पर लक्ष्य की ओर बढ़ता है तथा उसका उद्देश्य मानव जीवन को सरल, सहज व आनन्दमय बनाना है। उसी प्रकार अध्यात्म भी तर्क, अनुमान प्रयोग व अनुभव के आधार पर अपने आत्महित रूप लक्ष्य (सच्चे सुख की प्राप्ति) की ओर बढ़ता है तथा उसका उद्देश्य भी आत्मा की पूर्ण शुद्ध निर्विकार सच्चिदानन्दमय दशा की उपलब्धि करना है।

अध्यात्म आत्मा की वर्तमान संसार अवस्था का, उसमें यथार्थ वस्तु स्वरूप के अज्ञानजनित मोह-राग-द्वेषादि विकारी भावों एवं इन्द्रिय विषयों मे इष्ट-अनिष्ट बुद्धि से प्रेरित प्रवृत्ति से उत्पन्न होने वाले दुःखों से मुक्ति का सटीक अनुसन्धान करता है तथा अध्यात्म ही यह बताता है कि इन्द्रिय ज्ञान व सुख पराधीन, क्षणिक एवं आकुलतामय होने से हेय हैं और आत्माश्रित ज्ञान व सुख स्वाधीन, स्थायी एवं निराकुलतामय होने से उपादेय है। अध्यात्म विभिन्न द्रव्यों के मध्य देखे जाने वाले परस्पर निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धों का सूक्ष्म विश्लेषण कर द्रव्यों के परस्पर अकर्तृत्व एवं सहज स्वतन्त्र कार्योत्पत्ति की शक्तियों का प्रतिपादन करता है। इस प्रकार

अध्यात्म द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त यथार्थ, तर्क-आगम व अनुभव की कसौटी पर सत्य सिद्ध होने से अध्यात्म एक यथार्थ विज्ञान है। हाँ! यह मूर्त भौतिक विज्ञान न होकर अमूर्त आत्मा का विज्ञान है क्योंकि इसमें अन्य पदार्थों का अध्ययन होते हुये भी आत्मा के हित हेतु आत्मस्वरूप के अनुसंधान की ही मुख्यता होती है।

अध्यात्म द्वारा ही आत्मा की स्वभावभूत शक्तियों, गुणधर्मों का अध्ययन कर संसार के चतुर्गति रूप दुःखों से उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। मुक्ति ही वह दशा है जहां उसकी सारी ही शक्तियां पूर्ण निर्मल, शुद्ध एवं सर्व सामथ्र्य सहित प्रगट हो जाने से आत्मा सदा के लिये आत्माश्रित अतीन्द्रिय आनन्द का रसास्वादन करता हुआ सुस्थित रहता है।

अध्यात्म विशुद्ध विज्ञान है:- विशुद्ध विज्ञान, विज्ञान का वह रूप है जिसमें उपयोगिता पर बल न देते हुये मात्र प्रकृति के रहस्यों की खोज की जाती है। विशुद्ध विज्ञान अपनी खोजों के प्राणी जीवन व पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों एवं उनके दुरूपयोग-सदुपयोग के प्रति उदासीन रहकर कार्य करता है। उसका उद्देश्य तो मात्र प्राकृतिक रहस्यों का उद्घाटन करना है चाहे वे लाभदायक हों या हानिकारक जैसे आणविक ऊर्जा, विस्फोटक पदार्थों, संचार साधनों, रसायनों आदि अनेक वस्तुओं-साधनों का आविष्कार।

इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो अध्यात्म भी एक विशुद्ध विज्ञान है क्योंकि यह भी जगत के चेतन-अचेतन पदार्थों के निरपेक्ष एवं यथार्थ स्वरूप का अनुसन्धान करता है। सिद्धान्तों के प्रतिपादन में अध्यात्म इस बात की परवाह नहीं करता कि उनको जानकर अज्ञानी सामान्यजन अप्रसन्न अथवा स्वच्छंद भी हो सकते हैं अथवा उनका विरोध भी हो सकता है। जैसे विश्व की अनादि-अनन्तता, वस्तु की अनन्त गुणमयता, चेतन-अचेतन द्रव्यों में परस्पर अकर्तृत्व एवं अभोक्तृत्व, द्रव्यों का स्वतन्त्र परिणमन स्वभाव, निमित्तों की कार्य निष्पादन में अकिंचित्करता, इन्द्रिय सुख की दुःखमयता आदि सिद्धान्त।

अध्यात्म सकारात्मक विज्ञान है:- सकारात्मक विज्ञान, विज्ञान का वह रूप है जो प्रकृति के उद्घाटित रहस्यों एवं सिद्धान्तों के मानव / प्राणी जीवन एवं पर्यावरण हितैषी होने की चिन्ता भी करता है। यह ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों की खोज के प्रति उदासीन रहता है जिनका जीवन व पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने अथवा दुरूपयोग होने की सम्भावना हो।

इस अर्थ में यदि देखा जाये तो अध्यात्म एक सकारात्मक विज्ञान भी है, क्योंकि इसका जन्म ही आत्मा के आधार से और आत्महित के लिये ही होता है। अतः यह आत्मा के रागादि विकारों व अल्पज्ञता आदि अपूर्णताओं के कारणों का अनुसन्धान करता है तथा उन कारणों को दूर करके आत्मा की निर्विकार पूर्ण ज्ञान व सुख की दशा की प्राप्ति का मार्ग उद्घाटित करता है। अध्यात्म के सारे ही सिद्धान्त जगत के जीवों की सुख प्राप्ति हेतु शरीर, इन्द्रियों व विविध भोग-उपभोग सामग्री के प्रति पराधीनता व इनके अभाव में अनुभूत दीनता का अभाव कर उनकी स्वतन्त्रता व पूर्णता का मार्ग प्रशस्त करने वाले ही होते हैं, तो भी सामान्यजन अध्यात्म के सिद्धान्तों को जानकर स्वच्छन्द व अप्रसन्न न हों इसके लिये अध्यात्म सापेक्षिक कथन पद्धति (स्याद्वाद) का प्रयोग करता है ताकि सभी जिज्ञासु अध्यात्म के सिद्धान्तों का मर्म सही परिप्रेक्ष्य में समझकर अपनी अज्ञानमूलक कलुषित चित्तवृत्तियों से (मोह-राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभादि कषाय रूप परिणामों-भावों से) मुक्त हो सकें और आत्महित के मार्ग को सहजता से समझ सकें।

अध्यात्म कला भी है:- विज्ञान द्वारा खोजे गये सिद्धान्तों का प्रयोग करते हुये जीवन के लिये उपयोगी वस्तुओं व विधियों का प्रतिपादन कर जीवन को सुखी बनाना यह कला है। कला द्वारा वस्तुओं व कार्य विधियों को सुन्दर-आकर्षक रूप दिया जाता है जिससे लोगों का जीवन सरल व सहज हो जाता है।

कला की कसौटी पर यदि देखें तो अध्यात्म कला भी सिद्ध होता है, क्योंकि अध्यात्म का, आध्यात्मिक सिद्धान्तों व जीवन शैली का जीवन में प्रवेश होते ही उस साधक व्यक्ति का जीवन सहज, सरल, स्वाधीन एवं सुखमय होने लगता है। अध्यात्म के सिद्धान्तों का प्रयोग करने वाला साधक आत्मा से भिन्न चेतन-अचेतन पदार्थों के स्वतन्त्रतया होने वाले संयोग व वियोग की दशाओं से अप्रभावित ही रहता है, वह वास्तव में आत्ममय जीवन जीता हुआ सहज ज्ञाता-दृष्टा मात्र रहता है वह कर्तृत्व के भय अथवा अहंकारजनित तनावों से मुक्त रहता हुआ अन्य लोगों के लिये भी सुन्दर-सहज, सरल, अहिंसक व अपरिग्रही जीवन का आदर्श प्रस्तुत करता है। वह अपनी वाणी का प्रयोग हित, मित, प्रिय वचन बोलने के लिये ही करता है। साधना के मार्ग पर वह इस प्रकार आगे बढ़ता है कि उसके निमित्त से सूक्ष्म जीव भी पीडि़त नहीं होते। वह अहिंसा, क्षमा, दया आदि की साक्षात् मूर्ति होता है। वह जीवन में पूर्वकृत कर्मों के फल में आने वाली प्रतिकूलताओं से आत्मस्वभाव के आश्रय से उत्पन्न निराकुल शान्ति व आनन्द के बल पर अप्रभावित ही रहता है, क्रोध-ईष्र्या-द्वेष, अहंकार, छलकपट जैसे अनेक दुर्गुण उसका स्पर्श भी नहीं कर पाते।

ऐसा सुन्दर स्व-पर को आत्महितप्रेरक निस्प्रह जीवन अध्यात्म को सर्वोत्तम कला की श्रेणी मंस खड़ा कर देता है। अध्यात्म अन्य सांसारिक कलाओं से विलक्षण कला है क्योंकि सांसारिक कलाएं तो इन्द्रिय विषयों की पोषक होने से जीवों को संसार में उलझने में निमित्त बनती हैं जबकि अध्यात्म की कला जीवों को संसार के दुःखों के मार्ग से हटाकर स्वाधीन निराकुल आत्मिक सुख की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अध्यात्म विज्ञान भी है और कला भी।

अध्यात्म एक रहस्य मय विज्ञान है:- वे तथ्य रहस्य कहे जाते हैं जिन का ज्ञान सामान्य व्यक्तियों को अपनी सहज सरल बुद्धि से नहीं हो पाता। किन्तु वे ही अबूझ तथ्य कुछ विशिष्ट ज्ञानियों तथा धुनी लोगों की जिज्ञासापूर्ण शोध के निमित्त बनते हैं और बाद में उन रहस्यों पर से पर्दा उठ जाता है। अनेक आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कार किसी समय कोरी गप्प अथवा कल्पना की उड़ान प्रतीत होते थे किन्तु आज वे हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हंै। उनकी बदौलत ही आज मानव समाज अधिक सुविधापूर्ण जीवन जीने की अपनी इच्छा को पूर्ण करने में सफल हो सका है।

इसीप्रकार प्राचीन काल से ही अध्यात्म विज्ञान या आत्म-विद्या भी मनीषियों की शोध-खोज का केन्द्र बिन्दु रही है जबकि सामान्यजन तो आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करने से भी इन्कार करते रहे हैं। क्योंकि जगत के सामान्य जीवों का शरीर, इन्द्रियों व उनके विषयभूत जड़ पदार्थों से तो सहज परिचय रहा है परन्तु उस शरीर में रहने वाले ज्ञान व आनन्द स्वभावी चैतन्य आत्मा से वे सदा ही अपरिचित रहे हैं।

आत्मा इन्द्रिय ज्ञान से जानने में न आने वाला एक अमूर्त तत्त्व है जो संसार दशा में इन्द्रियों के निमित्त से जानता देखता है और सुखी-दुखी होता हैं परन्तु इन्द्रियां व भौतिक पदार्थ जिसे छू भी नहीं पाते।

संसार दशा में पूर्व सत्कर्मों के फल में लोगों को न्यूनाधिक अनुकूलताएं उपलब्ध होती ही है और संस्कारवश व्यक्ति उनमें ही संतुष्ट रहता हुआ काल व्यतीत करता रहता है और समय आने पर अग्रिम यात्रा पर चला जाता है। इन प्राप्त अनुकूलताओं में सुख बुद्धि से प्रेरित इष्ट का संग्रह व अनिष्ट का परिहार करने के निरर्थक प्रयत्नों में कदाचित् प्राप्त सफलता-असफलता को ही जीवन का सत्य मानते हुये तथा संस्कारवश मान्य आराध्य देवों की कृपा एवं कोप से प्रेरित भक्ति को ही एक मात्र उपादेय मानते हुए यथार्थ वस्तु स्वरूप की ओर सहज ही दृष्टिपात भी नहीं करता।

इस जीवन में विभिन्न पदार्थों में सहज ही होने वाली विभिन्न अवस्थाओं में कार्य-कारण सम्बन्ध देखे जाते हैं जिनसे इस संसारी जीव की कत्र्ता-कर्म एवं भोक्ता-भोग्य रूप मिथ्या भ्रान्ति पुष्ट होती रहती है और वह उन जागतिक संयोगों की व्यवस्था में ही लगा रहता है। समयानुसार अर्जित असफलताओं व प्रतिकूलताओं का वह सही विश्लेषण करने में भी असमर्थ रहता है। फलतः उसकी दृष्टि आत्मा व अन्य पदार्थों के यथार्थ स्वरूप व माने गये कत्र्ता-कर्म व भोक्ता-भोग्य सम्बन्धों की निरर्थकता की ओर जाती ही नहीं है। और यदि कोई ज्ञानी पुरूष उसकी चर्चा करता भी है तो संसार, शरीर व भोगों में आसक्ति के कारण आत्मा-परमात्मा की चर्चा-वार्ता के प्रति उसका उपेक्षा भाव ही रहता है।

इस प्रकार उपरोक्त व अन्य अनेक कारणों से आत्म विद्या या अध्यात्म-विज्ञान सामान्यजनों के लिये रहस्यमय ही बना रहता है। परन्तु यह भी एक तथ्य है कि जिन महा मनीषी साधकों ने अपने आत्मा के रहस्यों पर से पर्दा उठाकर उसका साक्षात्कार किया है वे अपनी आत्मा में ही स्वभावरूप से विद्यमान अतीन्द्रिय ज्ञान व आनन्द का उपभोग करते हुये सदा-सर्वदा सुखी रहते हैं फिर उन्हें भौतिक इन्द्रिय विषयों के रूप में जड़ पदार्थों की आवश्यकता भी प्रतीत नहीं होती।

यहां यह बात स्पष्टतः ध्यान में रखनी चाहिये कि भौतिक विज्ञान के रहस्योद्धाटन जीवों की भौतिक लालसाओं को बढ़ा कर वास्तव में तो उनके दुःखों-आकुलताओं में वृद्धि ही करते हैं जबकि आत्मा के रहस्यों का उद्घाटन व्यक्तियों के जीवन को निराकुल शान्ति व आनन्द से भर देता है जिससे जगत की अनुकूल व प्रतिकूल स्थितियां उन्हें प्रभावित करने में भी असमर्थ रहती हैं।

संक्षेप में अध्यात्म की रहस्यमयता के कारणों को निम्न बिन्दुओं से व्यक्त किया जा सकता है:-

1. आत्मा व आत्मलीनता की विधि से अपरिचय:- आत्मा अमूर्त-अतीन्द्रिय पदार्थ है जिससे संसारी जीव अनभिज्ञ है, इन्द्रिय विषयों में लीनता का उसे अभ्यास है परन्तु आत्मलीनता की विधि से वह सर्वथा अपरिचित है।

2. आत्माश्रित निराकुल सुख के प्रति अविश्वास:- संसारी जीव का इन्द्रियजनित आकुलतामय सुखों-दुःखों से दीर्घकाल से ही परिचय है। उसे यह विश्वास ही नहीं होता कि (1) इन्द्रिय विषयों के सेवन के बिना भी कोई जीव सुखी हो सकता है। (2) आत्मा सुख स्वभावी है और आत्मलीनता द्वारा उस आत्मिक निराकुल सुख का अनुभव भी किया जा सकता है। अतः वह उस ओर का प्रयत्न ही नहीं करता।

3. ईश्वर कर्तृत्व में सहज विश्वास:– संसारी जीवों का ईश्वर कर्तृत्व में सहज ही विश्वास चला आता है। शुभ कार्यों में (पूजा-भक्ति दया-दान आदि) उनकी रूचि भविष्य में भोगाकांक्षा की पूर्ति की इच्छा से सहज ही रहती है, वे उसे ही धर्म मानते हैं, अतः आत्मलीनतारूप यथार्थ धर्म व उसके आत्मस्वरूप की पूर्णतारूप फल में उनका विश्वास ही नहीं होता।

4. आत्मा की स्वरूप सामथ्र्य के प्रति अविश्वास:- संसार दशा में जीव राग-द्वेष-मोह आदि विकारों से युक्त व अल्पज्ञ ही देखा जाता है उनमें न्यूनाधिकता से भी वह परिचित है। परन्तु आत्म साधना द्वारा कोई जीव इन विकारों से व अल्पज्ञता से मुक्त होकर आत्मा की पूर्ण शुद्ध स्वभावभूत शक्ति व सामथ्र्य को प्रगट कर सकता है, पूर्ण वीतरागी व सर्वज्ञ भी हो सकता है, पूर्ण सुखी हो सकता है ऐसा विश्वास उन्हें नहीं होता। अतः आत्म-विकास के हेतुभूत अध्यात्म विज्ञान की ओर उनका प्रयत्न प्रारम्भ ही नहीं हो पाता, फलतः अध्यात्म रहस्यमय ही बना रहता है।

5. यथार्थ वस्तु स्वरूप से अपरिचय:- पदार्थों में अनन्त गुण-धर्म-शक्तियां स्वभावरूप से विद्यमान है जिनका कार्य नित्य नई अवस्थाओं के रूप में चलता रहता है। इनके कारण ही लौकिक जीवन में भिन्न-भिन्न पदार्थों में अनेक प्रकार के अनुकूल-प्रतिकूल संयोगजनित कत्र्ता-कर्म एवं भोक्ता-भोग्य सम्बन्ध देखे व माने जाते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप पर संसारी जीव की दृष्टि भी नहीं जाती।

6. अध्यात्म विज्ञान की सापेक्षिक कथन पद्धति (स्याद्वाद) से अपरिचय:- वस्तु में अनन्त गुण-धर्म, शक्तियां पाई जाती हैं। अन्य पदार्थों के साथ आत्मा के संयोग सम्बन्ध एवं निरन्तर परिवर्तनशील स्वभाव के कारण पदार्थों की अनेक दृष्टियों से व्याख्या की जा सकती है परन्तु एक बार में एक ही प्रकार से कथन करना संभव होने से अध्यात्म में सापेक्षिक कथन पद्धति ‘स्याद्वाद’ का प्रयोग किया जाता है। वस्तु स्वरूप में प्रवर्तित होने वाली अनेक अपेक्षाओं एवं उनकी कथन पद्धति से अपरिचित होने से अध्यात्म सामान्यजनों के लिये रहस्यमय ही बना रहता है।

7. आत्मा के प्रति रुचि व उग्र पुरूषार्थ का अभाव:- जो आत्मा की बात भाग्यवश सुनते समझते भी हैं उनकी संसारी भोगों में तीव्र रूचि के कारण आत्महितकारी क्रियाएं व्रत-तप-संयमादि, अहिंसा-सत्य-अपरिग्रह आदि अत्यन्त कठिन व कष्ट कर प्रतीत होती हैं अतः उनका ज्ञान निरर्थक चला जाता है अथवा तो अनादि संसारजनित लौकिक संस्कारों से मुक्त होकर आत्मा की प्रतीति व लीनता के लिये आवश्यक उग्र प्रयत्नों का अभाव होने से आत्मिक आनन्द से वंचित ही रह जाते हैं और यह अतीन्द्रिय सुख उनके लिये रहस्य ही बना रह जाता है।

अध्यात्म के अध्ययन का विषय-क्षेत्र एवं कार्य:- किसी भी विषय के अध्ययन का विषय-क्षेत्र कुछ विशिष्ट पदार्थ या विभिन्न जीवों-मानवों का विशिष्ट व्यवहार होता है। इसी प्रकार अध्यात्म का अध्ययन का विषय क्षेत्र भी सुनिश्चित है, जो निम्न बिन्दुओं में प्रदर्शित किया जा सकता है:-

(1) ज्ञान व सुख हेतु जीवों, मुख्यतः मनुष्यों के व्यवहार का अध्ययन एवं उनकी मान्यताओं व अभिप्रायों का विश्लेषण:- आत्मा से सम्बन्धित होने से अध्यात्म का विषय आत्मा ही है। इस विश्व में विशुद्ध आत्मा की उपलब्धि न होने से अध्यात्म देहधारी जीवों के व्यवहार का, उनमें भी मुख्यतः पंचेन्द्रिय मन सहित पशुओं एवं मनुष्यों द्वारा ज्ञान व सुख की प्राप्ति के लिये किये जाने वाले व्यवहार का अध्ययन करता है। यह उनकी शारीरिक व शाब्दिक क्रियाओं के आधार से मनोविज्ञान का आश्रय लेते हुये उनकी भावनाओं का (राग-द्वेष, भय, घृणा, क्रोध-मान-माया-लोभ आदि) तथा उन भावनाओं के विश्लेषण द्वारा उन जीवों के आन्तरिक अभिप्राय व मान्यताओं का अध्ययन करता है।

(2) चेतन-अचेतन पदार्थों (जीवित प्राणी एवं जड़ पदार्थ) के मध्य होने वाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण द्वारा वस्तुओं के स्वभावों एवं जगत मान्य सम्बन्धों का मूल्यांकन:- अध्यात्म प्राणियों द्वारा अपने राग-द्वेष की पूर्ति हेतु अपने शरीर व अन्य चेतन-अचेतन पदार्थों के प्रति की जाने वाली क्रियाओं के निमित्त से उनमें होने वाले परिवर्तनों – प्रतिक्रियाओं का भी सूक्ष्म निरीक्षण एवं विश्लेषण करता है तथा इसके आधार से पदार्थों में अन्तर्निहित शाश्वत गुणों-शक्तियों व उनकी परिवर्तनशील अवस्थाओं के स्वभाव का निर्णय-निर्धारण करता है और इसके आधार पर जगत मान्य कत्र्ता-कर्म, भोक्ता-भोग्य आदि अनेक सम्बन्धों की यथार्थता का मूल्यांकन करता है।

(3) वस्तु स्वभाव के निर्णय के आधार पर पंचेन्द्रियों के विषय-भोगों में इष्ट-अनिष्ट बुद्धि एवं कत्र्ता-कर्म आदि सम्बन्धों की सार्थकता का परीक्षण:- इस अध्ययन द्वारा अध्यात्म लौकिक जीवों की पंचेन्द्रिय विषयों में इष्ट-अनिष्ट बुद्धि की सार्थकता का परीक्षण कर उनकी विपरीतता-निरर्थकता का ज्ञान कराता है तथा संसारदशा में आत्मा व अन्य चेतन-अचेतन पदार्थों के प्रति अनुभूत पारस्परिक

विविध कर्ता-कर्म आदि सम्बन्धों की विपरीतता / अयथार्थता भी सिद्ध करता है। इस प्रकार अध्यात्म पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का प्रतिपादन करता हुआ लौकिकजनों के दुःख की कारणभूत विपरीत मान्यताओं का निराकरण करता है तथा वस्तुओं में अन्तर्निहित अनन्त गुण धर्म जनित स्वतन्त्र परिणमन स्वभाव से परिचय कराता है।

(4) आत्म विकास के साधना पथ का निर्धारण एवं उसके विरोधाभासों के विश्लेषण पूर्वक उनकी तार्किक व्याख्या करना:- अध्यात्म केवल यथार्थ वस्तु स्वरूप का अनुसंधान एवं प्रतिपादन ही नहीं करता वरन् लौकिकजनों को अपनी विपरीत मान्यताओं से मुक्त होकर आत्माश्रित सुखमय जीवन जीने का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

एतदर्थ अध्यात्म प्राणियों के संसार-शरीर एवं विषय भोगाश्रित आकुलतामय जीवन से परे विरक्त आत्माश्रित आनन्दमय जीवन की विधि, उसकी अनुभूतियों एवं उसकी पूर्णता के स्वरूप एवं फलका, इस प्रकार आत्म साधना के मार्ग के प्रारम्भ से लेकर उसकी पूर्णता पूर्वक साध्य (पूर्णशुद्ध आत्म दशा, परमात्म पद) की प्राप्ति की स्थितियों का अध्ययन व निर्धारण करता है। वह साधक दशा में सांसारिक शरीराश्रित जीवन (शुभाचार) व आत्माश्रित जीवन (आत्मानुभूति की दशा) के विरोधाभासों का अध्ययन-विश्लेषण एवं उनकी तार्किक व्याख्या भी करता है, ताकि सामान्य जिज्ञासुजनों के साधना पथ के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले सन्देहों का, जिज्ञासाओं का समाधान हो सके और वे पूर्ण निश्चिंत होकर अपूर्व पुरूषार्थ पूर्वक आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो सकें।

इस हेतु अध्यात्म उन महाभाग साधकों को आदर्श रूप में उपस्थित करता है जिन्होंने संसार-शरीर व भोगों से विरक्त होकर अपने आत्मा की पूर्ण शुद्ध स्वाधीन अनन्तगुणमय स्वरूप-सत्ता का अनुभव कर तपश्चरण पूर्वक अतीन्द्रिय ज्ञान व आनन्द की पूर्णता को उपलब्ध किया है। जिज्ञासु साधकजन उन महापुरूषों के उपदेशों एवं साधना पथ का अनुसरण कर अपने आत्म विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

(5) पूर्ण आत्म विकास की स्थिति का विश्लेषण, अध्ययन एवं व्याख्या करना:- अध्यात्म आत्म विकास के साधना पथ (मोह रागादि आत्म विकारों का क्रमिक अभाव एवं आत्मिक ज्ञान व सुख की जिस प्रकार वृद्धि हो वह प्रयत्न) का अध्ययन करने के साथ ही आत्मा के पूर्ण विकास की स्थिति (शुद्धात्म दशा, परमात्म दशा, परंब्रह्म दशा, मुक्त दशा) का भी अध्ययन, विश्लेषण एवं व्याख्या करता है। अध्यात्म ही बताता है कि जिस प्रकार शुद्ध स्वर्ण की उपलब्धि सम्भव है उसी प्रकार शुद्ध आत्म द्रव्य (शरीर एवं मोह-रागादि आत्म विकारों से पूर्णतः मुक्त एवं ज्ञान-दर्शन-सुख आदि आत्मिक गुणों के पूर्ण विकास युक्त आत्मा) की उपलब्धि भी सम्भव है, तथा जैसे शुद्ध स्वर्ण की उपलब्धि होने पर वह स्वयमेव कभी अशुद्धता को प्राप्त नहीं होता अथवा जैसे तिलों में से तेल पृथक होने पर वह पुनः तिल रूप नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा भी अपने मोह-रागादि विकारों से, शरीरादि बाह्य संयोगों से एक बार पूर्ण मुक्त होने पर पुनः विकारों व संयोगों से युक्त नहीं होता, तथा भावी अनन्त काल तक सहज स्वभाव सिद्ध पूर्ण ज्ञान व आनन्दमयदशा का उपभोग करता हुआ सत्-चित् आनन्दमय ही रहता है। अध्यात्म के अनुसार यह आत्मा की कृतकृत्य दशा है जहां सर्व इष्ट की प्राप्ति एवं सर्व अनिष्टों का अभाव हो गया है।

अध्यात्म के अध्ययन/प्रतिपादन की विधियाँ:-अध्यात्म आत्मा के हित से सम्बन्धित है तथा आत्महित की भावना से उत्पन्न होकर आत्म विकास की पूर्णता की उपलब्धि तक क्रियाशील रहता है । संसार दशा में पूर्ण शुद्ध आत्माओं की अनुपलब्धि होने से यह संसार में विद्यमान सदेह आत्माओं के व्यवहारों का अध्ययन करते हुये आगे बढ़ता है। संसार दशा में आत्मा के, विशेषकर मनुष्य दशा में अनेक प्रकार के कार्य-व्यवहार दृष्टिगोचर होते हैं।

प्रत्येक कार्य-व्यवहार के दो पक्ष होते हैं:- एक यथार्थ परक (पर निरपेक्ष) और दूसरा व्यवहार परक (पर पदार्थ अथवा प्रयोजन सापेक्ष)। अतः उन कार्यों एवं व्यवहारों का सम्यक् अध्ययन करने के लिये दो प्रकार के दृष्टिकोणों की आवश्यकता होती है:- प्रथम तो यथार्थ वस्तु स्वरूप को प्रमुखता देते हुये और दूसरा दो भिन्न वस्तुओं के पारस्परिक सम्बन्धों को अथवा प्रयोजन (उद्देश्य) को मुख्यता देते हुये। प्रथम दृष्टिकोण को हम ज्ञान प्रधान और दूसरे दृष्टिकोण को प्रयोजन प्रधान भी कह सकते हैं।

(1) ज्ञान प्रधान दृष्टिकोण:- प्रत्येक पदार्थ में वस्तु स्वभाव को देखा जाये तो अध्ययन की दृष्टि से उसे दो अंशों में विभक्त किया जा सकता है। एक उसका स्थाई या नित्य अंश, दूसरा परिवर्तनशील अंश। प्रथम अंश को द्रव्य (अनन्त गुण-धर्ममय वस्तु) व दूसरे अंश को पर्याय/अवस्था/दशा आदि कहते हैं। पर्याय द्रव्य व गुणों के स्वभाव को व्यक्त करने वाली व क्षणिक होती है।

पदार्थ के नित्य अंश का, द्रव्य स्वभाव का अध्ययन करने वाले दृष्टिकोण को द्रव्यार्थिक दृष्टिकोण (शास्त्रीय भाषा में द्रव्यार्थिक नय) कहते हैं, तथा पदार्थ के परिवर्तनशील अंश का, पर्याय स्वभाव का अध्ययन करने वाले दृष्टिकोण को पर्यायार्थिक दृष्टिकोण (शास्त्रीय भाषा में पर्यायार्थिक नय) कहते हैं।

इस प्रकार द्रव्यार्थिक नय एवं पर्यायार्थिक नय क्रमशः वस्तु के नित्य स्थाई एवं परिवर्तनशील क्षणिक स्वभावों का अध्ययन करने के लिये उपयोगी हैं। अध्यात्म के प्रारम्भ के लिये प्रथमतः ज्ञान प्रधान दृष्टिकोण से पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का अध्ययन किया जाता है।

(2) प्रयोजन प्रधान दृष्टिकोण:- वस्तुओं की स्वभावगत विशेषताओं के सम्यक परिज्ञान के लिये ज्ञान प्रधान दृष्टिकोण का प्रयोग किया जाता है। तदुपरान्त अध्यात्म में आत्महित की मुख्यता होने से प्रयोजन प्रधान दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है। हम जानते हैं कि प्रयोजन बदलने पर व्यक्ति का दृष्टिकोण भी बदल जाता है। मात्र दृष्टिकोण ही नहीं बदलता, उसका व्यवहार भी बदल जाता है। अध्यात्म इस परिवर्तनशील व्यवहार व दृष्टिकोण का अध्ययन करता है तथा उसके पीछे निहित अभिप्राय का भी विश्लेषण एवं व्याख्या करता है।

प्रयोजनानुसार परिवर्तनशील व्यवहार को समझने के लिये निम्न उदाहरण देखने योग्य है:- एक व्यक्ति का परिवार भी है और उसका मित्र भी है। अन्य लोगों की तुलना में मित्र उसका आत्मीय है, परन्तु परिवार हित की मुख्यता होने पर मित्र गौण हो जाता है, अपने शरीर व इन्द्रियों की सम्बन्धित आवश्यकताओं/इच्छाओं की मुख्यता की दशा में परिवार भी गौण हो जाता है, अपने राग-द्वेष, ममत्व आदि भावों की मुख्यता होने पर अपना शरीर व इन्द्रियां भी उपेक्षित हो जाती हैं और आत्महित की मुख्यता होने पर ये राग-द्वेष-ममत्व आदि भाव भी उपेक्षित हो जाते हैं तथा सन्यास की दशा में अनन्त गुणमय निज शुद्धात्मा ही आत्मिक ज्ञान व सुख का हित साधक होने से मुख्य रह जाता है।

इन परिवर्तनशील प्रयोजनपरक भावों का / व्यवहारों का अध्ययन करने के लिये अध्यात्म पुनः दो दृष्टिकोणों का प्रयोग करता है:- प्रथम यथार्थ परक दृष्टिकोण और दूसरा औपचारिक दृष्टिकोण। शास्त्रीय भाषा में इन्हें क्रमशः निश्चय नय एवं व्यवहार नय कहा जाता है।

निश्चय नय के अनुसार पदार्थ का अनन्तगुण-धर्ममय स्वभाव, उसके शुद्धाशुद्ध परिणाम (पर्यायें, अवस्थाएं) ही उस वस्तु की कही जाती हैं, जबकि व्यवहार नय दो भिन्न वस्तुओं में भी विभिन्न औपचारिक सम्बन्धों को स्वीकार कर एक द्रव्य को दूसरे द्रव्य का कत्र्ता, कर्म, स्वामी आदि कहता है अथवा जो जैसा है उसे वैसा कहना, जो जिसका है उसे उसका कहना यह निश्चय नय है; और जो जैसा नहीं है उसे वैसा कहना, जो जिसका नहीं है उसे उसका कहना यह व्यवहारनय है। इसीलिये निश्चय नय को सत्यार्थ, भूतार्थ, परमार्थ एवं व्यवहार नय को असत्यार्थ, अभूतार्थ, अपरमार्थ भी कहा जाता है।

जिस प्रकार प्रयोजन की मुख्यता होने पर दृष्टिकोण एवं व्यवहार बदल जाता है, उसी प्रकार अध्यात्म मार्ग में प्रयोजनानुसार निश्चय एवं व्यवहार नय के विषय भी बदलते जाते हैं। अध्यात्म मार्ग में आगे बढ़ने पर साधक बाह्य पर द्रव्यों-भावों से हटकर निज शुद्धात्म स्वभाव की ओर झुकता जाता है तदनुसार ही निश्चय व व्यवहार नय के विषय स्थूल से सूक्ष्म होते जाते हैं जो निम्न प्रकार है:-

1. स्व-निश्चय एवं पर-व्यवहार 2. शुद्ध-निश्चय एवं अशुद्ध-व्यवहार

3. द्रव्य-निश्चय एवं पर्याय-व्यवहार 4. अभेद-निश्चय एवं भेद-व्यवहार

पूर्वोक्त भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से वस्तुओं का अध्ययन व कथन करने की विधि को स्याद्वाद कहते हैं। इस पद्धति में कथन का पक्ष मुख्य और अन्य समस्त पक्ष / दृष्टिकोण गौण हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त अन्य विषयों की तरह ही अध्यात्म भी सर्वमान्य अध्ययन विधियों का प्रयोग करता है जैसे

1. ज्ञात से अज्ञात की ओर,

2. सरल से कठिन की ओर एवं

3. स्थूल से सूक्ष्म की ओर।

इस प्रकार अध्यात्म वस्तुगत स्वभावों, विशेषताओं एवं प्राणियों के व्यवहारों, उनके पीछे छिपी मान्यताओं एवं अभिप्रायों का अध्ययन करता है और विद्यार्जन का जो लक्ष्य सम्पूर्ण जगत में मान्य किया गया है उस ओर

1. अन्धकार से प्रकाश की ओर,

2. असत् से सत् की ओर एवं

3. मृत्यु से अमरत्व की ओर साधक प्राणियों को अग्रसर करता है।

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