Jainism

आध्यात्मिकता

आध्यात्मिकता क्या है?

आज के चरम भौतिकवादी युग में जहां व्यक्ति भौतिक इन्द्रिय सुखों की सामग्री के संकलन हेतु अहर्निश आकुलित है वहां यह प्रश्न भी विश्व के विभिन्न भागों में उठता रहता है कि क्या इस आकुलता पूर्ण अंधी दौड़ का कहीं अन्त भी है ? क्या शाश्वत वास्तविक सुख-शांति का कहीं अस्तित्व भी है ? यदि अस्तित्व है तो उसे किस प्रकार अर्जित किया जा सकता है? और इसी क्रम में बार बार अध्यात्म अथवा आध्यात्मिकता जैसे शब्द वायुमण्डल में गूंजते रहते हैं। अनेकानेक चितकों व दार्शनिकों ने अध्यात्म या आध्यात्मिकता की अपने-अपने प्रकार से व्याख्या की है लेकिन यह जानना समझना फिर भी शेष रह जाता है कि वास्तव में अध्यात्म क्या है, आध्यात्मिकता का प्रवेश जीवन में किस प्रकार हो सकता है कि जिससे यथार्थ आत्मिक सुख व शांति जीवन में प्रगट हो सके।

अध्यात्म की परिभाषा व अर्थ :- अध्यात्म शब्द अधि+आत्म दो शब्दों से मिलकर बना है। अधि का अर्थ निकट होना एवं जानना भी होता है। इस प्रकार अध्यात्म का अर्थ हुआ आत्मा के निकटवर्ती होना अथवा आत्मा को जानना। हम यह कह सकते हैं कि अध्यात्म से तात्पर्य आत्मा के निकटवर्ती होकर उसका सम्यक प्रकार से परिज्ञान ही है। इसी से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि आध्यात्मिकता एक ऐसी स्थिति है, प्रवृत्ति है जिसमें व्यक्ति का जीवन व उसके विचार अध्यात्म से ओत-प्रोत होते हैं अर्थात उसमें आत्महित की मुख्यता रहती है।

सुख का स्त्रोत – आत्मा :- यदि वस्तु स्वरूप का निरपेक्ष भाव से एवं यथार्थ विश्लेषण किया जाय तो सम्पूर्ण विश्व के समस्त ही दृव्य स्वतन्त्र रूप से परिवर्तनशील तथा अपनी अपनी अनन्तानन्त शक्तियों से परिपूर्ण, अनादि अनन्त दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक आत्मा भी अनादि अनन्त, स्वतन्त्र, ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य आदि अनन्त गुणों से परिपूर्ण चेतन दृव्य सिद्ध होता है। अनादि काल से ही इस जगत के जीवों को सुख की खोज रही है और अनादि संस्कार वश परमुखापेक्षी वृत्ति के कारण यह जीव सुख की खोज आत्मेतर बाह्य जड़ पदार्थों में ही करता रहा है और वर्तमान भौतिक उन्नति भी उस सुख की खोज की प्रवृत्ति जन्य प्रयत्नों का ही प्रतिफल है। लेकिन सुख वास्तव में बाहर नहीं है, यह तो आत्मा के सुख-गुण का स्वतन्त्र परिणमन हैं जिसके प्रतिफल में बाâय अनुकूल पदार्थों की संयोगवश उपस्थिति के काल में जीव को कथन मात्र सुख की अनुभूति होती है। उन विषयों में वास्तव में सुख रंचमात्र भी नहीं होता, इसीलिये जीव को शीघ्र ही अन्य अनुकूल सामग्री की आवश्यकता प्रतीत होने लगती है और यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। पाश्चात्य अर्थ शास्त्रियों-चिंतकों ने भी यह बात स्वीकार की है कि पदार्थों के संचय व उपभोग में सुख व संतुष्टि नहीं है। वे इस सांसारिक सुख को एक विशिष्ट मानसिक स्थिति का परिणाम कहते है।

अत: यह सिद्ध हो जाने के बाद कि सांसारिक भोग सामग्री के संचय व उपभोग का आत्मा के सुख से किंचित भी सम्बन्ध नहीं है। यह जानना आवश्यक हो जाता है कि फिर सुख क्या है और कहां है?

पूर्वोक्त विवेचन से ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सुख बाह्य पदार्थों में नहीं है तो फिर वह जहां उसकी अनुभूति की जाती है वहां ही होना चाहिये और जैन दर्शन का यह अपूर्व अनुसन्धान है कि आत्मा ही सुख का स्त्रोत है, साधन है और यदि आत्मा को, उसके स्वरूप को जानकर उसके निकटवर्ती हुआ जा सके अर्थात आत्मा में ही उसके ज्ञान को स्थिर किया जा सके, स्वयं के ज्ञान द्वारा ही सर्व प्रभुता सम्पन्न अनन्त गुणात्मक निज चैतन्य आत्म दृव्य को अनुभव किया जा सके तो उसमें विद्यमान सहज सुख का अनुभव भी किया जा सकता है।

आध्यात्मिकता व उसके लक्षण :- उस सहज आत्मिक सुख की अनुभूति में मग्न रहना, वास्तविक अध्यात्म का प्रतिफल है और यही आध्यात्मिकता है। अपने स्वरूप को जान लेने व स्वभाव भूत सुख की अनुभूति के साथ ही व्यक्ति की प्रवृत्ति में आमूलचूल परिवर्तन दृष्टिगत होने लगते हैं और ये परिवर्तन उस व्यक्ति के जीवन के लिये तो मंगलमय होते ही हैं यह समाज के लिए भी हितकर एवं अनुकरणीय होते हैं। उन परिवर्तनों में मुख्यत: दृष्टिगोचर बिन्दु निम्न प्रकार हो सकते है :-
1. संसार, शरीर व भोगों के प्रति उदासीनता
2. अनुकूल व प्रतिकूल पदार्थों के प्रति निरपेक्ष भाव
3. सभी जीवों में समदृष्टि व उनके प्रति करूणा व वात्सल्यभाव
4. सच्चे देव-शास्त्र-गुरू के प्रति निष्काम गुणाग्रही भक्ति
5. संयमित जीवन व अहिंसक प्रवृत्ति
6. जीवन में अन्याय-अनीति व अभक्ष्य का त्याग आदि-आदि

अब प्रश्न यह खड़़ा होता है कि आध्यात्मिकता का जीवन में समावेश किस प्रकार का हो सकता है। क्या यह धार्मिक क्रिया काण्डों के माध्यम से संभव है अथवा तो तत्व चिंतन द्वारा प्रगट हो सकता है अथवा आचरण शुद्धि एवं नैतिकता के विकास का नाम ही आध्यात्मिकता है। आइये इनका बिन्दुवार विश्लेषण किया जाये।

धार्मिक क्रिया काण्ड और आध्यात्मिकता:- यह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है कि जैसे जैसे भौतिकवादी प्रवृत्ति समाज में वृद्धिंगत होती जाती है वैसे ही विभिन्न समाजों में धार्मिक क्रियाकाण्डों की प्रचुरता भी दृष्टिगत हो रही है और सामान्य व्यक्ति इन आयोजनों में भाग लेकर ही अपनी धार्मिक आध्यात्मिक आकांक्षाओं की पूर्णता मान कर संतुष्ट हो जाता है। परन्तु वास्तव में इन क्रियाकाण्डों का आध्यात्मिकता से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। व्रत, जप, तप, कथा, संगोष्ठी, प्रवचन, पूजा-पाठ-विधान आदि के आयोजन में व्यक्ति सामर्थ्य भर धन व्यय करके, गीत-संगीतमय कार्यक्रम आयोजित करके तथा उस समय वहां उपस्थिति मात्र दर्ज कराके स्वयं को कृतकृत्य मान लेता है। प्रवचन-शिविर-विधानादि के कथ्य तथा व्रत-उपवासादि के प्रयोजन का उसको जरा भी स्मरण नहीं रहता और इनका आयोजन प्रतिष्ठा व प्रशंसा अर्जन अथवा स्वास्थ्य रक्षण के लक्ष्य तक सीमित रह जाता है।

ये आयोजन आध्यात्मिकता के वाहक व स्त्रोत तभी हो सकते हैं जब इन में तड़क-भड़क, भव्यता, गीत-संगीत के स्थान पर भावों की-उपयोगिता की प्रधानता हो, जब व्यक्ति का लक्ष्य इन आयोजन में पूजा-विधानादि, प्रवचनादि में आये हुए विषय को गंभीरता से ग्रहण करने का हो और कार्यक्रम के बाद उसका चिन्तन उपादेय बुद्धि पूर्वक उस विषय की तरफ मुड़े, अन्यथा तो ये आयोजन प्राण रहित श्रंगारित मृत कलेवर की भांति निरर्थक हो जाते हैं।

तत्वचिन्तन और आध्यात्मिकता:- आध्यात्मिकता को जीवन में प्रतिष्ठित करने का एक महत्वपूर्ण साधन है तत्व चिंतन। वस्तु स्वरूप के सम्यक परिज्ञान पूर्वक अपने शुद्धात्म सहज ज्ञानानन्द स्वभाव का ज्ञान करना, उसका निरन्तर चिन्तन-स्मरण करके उस अनन्त महिमावान निजस्वरूप की महत्ता का अपने ज्ञान में निश्चय करना और फिर अपने उपयोग को-ज्ञान को स्वरूप में स्थिर करना, यह आध्यात्मिकता को अपने जीवन में प्रतिष्ठितकरने का एक ही उपाय है।

ज्ञान के माध्यम से ही स्वरूप की महत्ता आती है और “मेरे लिये विश्व का सर्वोत्तम महत्वपूर्ण पदार्थ मैं ही हूं, मेरा ज्ञान दर्शन सुख ही मेरे लिये उपकारक है अन्य का नहीं” ऐसा दृढ़ विश्वास होने पर ही व्यक्ति का उपयोग अन्य जागतिक पदार्थों से विमुख होकर स्वकेंद्रित हो सकता है। तत्व चिंतन का यह प्रतिफल होना चाहिये कि आत्मा का उपयोग चिन्तन तक ही सीमित न रह कर, उससे अतीत होकर स्वभाव में ही एकाकार हो जावे तथा निज अनन्त गुणमय स्वरूप की अनुभूति व उसका अतीन्द्रिय आनन्द उसे प्रगट हो।

यदि व्यक्ति चिंतन तक ही सीमित रहे, अनेकानेक शास्त्रों का अध्ययन-ज्ञानार्जन करके ही स्वयं को संतुष्ट मान ले तो वह अपने ज्ञान के कारण प्रतिष्ठा तो अर्जित कर सकता है उसके जीवन में कुछ सदाचार का प्रवेश भी हो सकता है, किन्तु यथार्थ आध्यात्मिकता का उसके जीवन में प्रवेश नहीं हो सकेगा और वह वास्तविक आत्मिक आनन्द से भी वंचित ही रहेगा।

आचरण शुद्धि एवं नैतिकता का आध्यात्मिकता से सम्बन्ध :- जिन लोगों के जीवन में आध्यात्मिकता का प्रवेश हो जाता है उनके जीवन में पवित्र आचार-विचार व व्यवहार सहज ही स्थान पा जाते हैं। परन्तु सामान्य व्यक्ति उस व्यक्ति की आत्मा में उत्पन्न निर्मलता व आध्यात्मिकता से परिचित न होने के कारण बाहर में दृष्टिगोचर उस उच्च स्तरीय आचार-विचार व नैतिकता को ही आध्यात्मिकता मान बैठता है। यही कारण है कि आज के युग में आचरण शुद्धि व नैतिकता के जीवन में पदार्पण को सर्वाधिक महत्व दिया जा रहा है और जिन लोगों के जीवन में सदाचार व नैतिकता पाये जाते हैं उन्हें आध्यात्मिक भी मान लिया जाता है। वास्तव में तो सदाचार व नैतिकता मन्द कषायी जीवों के जीवन में सहज ही पाये जाते हैं। इनका आध्यात्मिकता से कोर्इ सीधा सम्बन्ध नहीं है। हाँ ! यह बात भी सत्य है कि सदाचार व नैतिकता की शुभ भाव भूमि जीवन में आध्यात्मिकता के प्रवेश के लिये अनुकूल भूमिका का निर्माण करती है। यदि व्यक्ति ऐसी कोमल परिणामों की भाव भूमि में तात्विक रूचि पूर्वक अध्यात्म का बीजारोपण करने का उपक्रम करे तो यह सहज साध्य हो सकता है। अन्याय अनीति व अनाचार की कठोर ह्रदय भूमि में तो अध्यात्म की चर्चा भी सुहाती नहीं है, उसके जीवन में पदार्पण की तो बात ही बहुत दूर है।

अधिकांशत: होता तो यह है व्यक्ति अपने जीवन में सदाचार व नैतिकता को अपनाकर सन्तुष्ट हो जाता है और स्वयं के आध्यात्मिक होने का भ्रम पालकर आत्मोन्नति के मार्ग पर चलने के प्रयत्नों से भी विराम पा लेता है। आज जगत में ऐसे ही लोगों का बाहुल्य भी है और वे ही जगत के लोगों को सदाचारी व नैतिक बनाने के विभिन्न उपक्रम भी करते रहते हैं। ऊपर से देखने पर यह बाह्य सदाचार व नैतिकता व्यक्ति व समाज के लिये हितकर भी होती है परन्तु यथार्थ आध्यात्मिकता के अभाव में यह स्थार्इ नहीं होती और समय आने पर वही व्यक्ति अनैतिक व्यवहार भी करने लगता है।

आध्यात्मिकता का फल :- इस प्रकार स्पष्ट है कि आध्यात्मिकता धार्मिक क्रिया काण्डों से, कोरे तत्त्वज्ञान से तथा बाह्य नैतिक सदाचार मय आचरण से विलक्षण एक विशिष्ट प्रवृत्ति है जो व्यक्ति में निज शुद्धात्म तत्व की श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र पूर्वक उत्पन्न होती है और जिसके फल स्वरूप व्यक्ति का जीवन बाह्य जागतिक क्रिया कलापों, सम्बन्धों से विरक्त होकर, जगत के प्रति समभाव रखता हुआ मात्र आत्महित की प्रेरणा से तथा उसके लक्ष्य से ही संचालित होता है। अन्तत: ऐसा व्यक्ति अपने सम्पूर्ण मोहादि विकारों का अभाव कर निज अनन्त गुणात्मक स्वरूप की शुद्धता-पूर्णता को प्रगट कर सादि अनन्त काल तक निज स्वाधीन निराकुल सुख का उपभोग करता रहता है।

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