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बिना आत्म-ज्ञान के विराग अकार्यकारी है

शुकदेव विशेष ज्ञानी थे, संयम की मूर्ति थे,  किन्तु उन्हें अपने में कोई अभाव अनभव होता था। उनके पिता वेद व्यास ने यह देखा तो उन्हें राजा जनक के पास मिथिला जाने को कहा। शुकदेव वहाँ गये। नगर के स्त्री-पुरूषों के चारों ओर वैभव इठला रहा था, पर इसका उनके मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जव वह महल की ड्योढ़ी पर पहुँचने पर द्वारपालों ने उन्हे रोक दिया। वे धूप में बहुत समय तक खडे़ रहे, लेकिन इसका भी उन पर कोई असर नहीं हुआ। अन्त में उन्हे महल के भीतर पहुँचा दिया। वहाँ छाया में वह चिन्तन लीन हो गये। इसके पश्चात उन्हें बड़े ही सुहावने उद्यान में ले जाया गया, बढ़िया भोजन कराया गया और रात को सोने के लिए स्थान दिया गया। पर शुकदेव ब्राह्य मुहूर्त में उठे, चिंतन में डूब गये। नगर और महल का सम्पूर्ण जीवन अत्यन्त लुभावना था। नगर की सजावट ,नागरिकों का रहन-सहन, महल की भव्यता, सब कुछ अद्भुत था, लेकिन शुकदेव उस ऐश्वर्य के बीच ऐसे रहे, जैसे जल में कमल रहता है। अगले दिन उन्हें राजा जनक के सामने उपस्थित किया गया। राजा को सारी जानकारी थी। उन्होंने शुकदेव की अर्चना की, उन्हें ऊँचे आसन पर आसीन किया और स्वयं उनके सामने धरती पर बैठ गये। विनत होकर उन्होंने कहा, “महाराज, आप दुनिया की मोह-माया से मुक्त हैं, सुख से परे हैं। आप ज्ञान के भंडार हैं। लेकिन आपको अपने ज्ञान और महानता का भान नहीं है। इसी से आप अपने अन्तर में कोई कमी पा रहे हैं।” जनक के इतना कहते ही शुकदेव अपने स्वरूप को पहचानने में जुट गये।

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