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आत्म ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं

राजकुमार भद्रायु ने भगवान महावीर से प्रवज्या ग्रहण करने का निश्चय किया तब उसके पिता ने उसे ऐसा करने से इन्कार किया और पूछा  बेटा, ऐसा कौनसा अभाव है, जिसके कारण तुम दीक्षा ले रहे हो ? यदि राज्य की इच्छा है, तो मैं – अभी तुम्हें राज्य सौंम देता हूँ ।

राजकुमार – पिताजी !मुझे यह राज्य नहीं चाहिए।

राजा- तो फिर तुम्हें क्या चाहिए?’’

राजकुमार-मुझे जगत् की कोई नाशवान् वस्तु नहीं चाहिए। अब मेरे अन्तःकरण में ज्ञान प्रकाश हो गया है। अन्तरात्मा के प्रकाश के समक्ष इन हीरे -मोती आदि का प्रकाश फीका पड़ जाता है। फिर आत्मा के प्रकाश के अतिरिक्त दूसरे किसी भी बाह्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं रहती।

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