आत्मा – एक द्रव्य के रूप में अध्ययन

अध्याय –1 (आत्मा के अस्तित्व की सिद्धि)

अनात्मवादी वैज्ञानिक युग:- वर्तमान आधुनिक वैज्ञानिक युग न केवल भौतिक, वरन् सामाजिक, राजनैतिक एवं मानसिक परिवर्तनों का एक मात्र आधार एवं प्रेरक है इसने जहां जीवन के सभी पक्षों से सम्बन्धित अनेक नई अवधारणाओं को जन्म दिया है वहीं इसने अनेक प्राचीन मान्यताओं, सिद्धान्तों एवं परम्पराओं को भी अविश्वसनीय एवं अनुपयोगी ठहरा दिया है। इस का सर्वाधिक प्रभाव आधुनिक शिक्षा प्राप्त, सम्पन्न एवं समृद्धिशील युवा व प्रौढ़ पीढ़ी पर हुआ है जो भौतिक विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरने में असफल रही मान्यताओं को निरस्त करने में जरा भी संकोच नहीं करती, विज्ञान के प्रति यह विश्वास इतना घनीभूत है कि थोड़े भी व्यक्तियों या वस्तुओं पर किये गये अध्ययन या प्रयोगों के निष्कर्षों को वह तुरन्त ही आत्मसात् करने हेतु तत्पर रहती है, भले ही वे निष्कर्ष बाद के अध्ययनों में मिथ्या भी सिद्ध हो जाने वाले हों।

प्राचीन काल से ही विश्व के प्रसिद्ध दर्शनकारों ने, मनीषी महर्षियों ने आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार किया है, साथ ही आत्मा के स्वभाव शक्तियों, कार्यों, वर्तमान दुःखमय संसार दशा एवं उससे मुक्ति के उपायों पर भी विचार किया है। एक चार्वाक दर्शन ऐसा है जो आत्मा के पृथक् अस्तित्व को स्वीकार न कर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश इन पंच महाभूतों के संयोग से जीवोत्पत्ति का प्रतिपादन करता है।

आधुनिक विज्ञान ने इस चार्वाक दर्शन की मान्यता को और भी विस्तार दे दिया है क्योंकि अनेक प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोगों एवं अध्ययनों में भी आत्मा कहीं पकड़ने में नहीं आया, वैज्ञानिक उपकरण उसके अस्तित्व को प्रमाणित करने में सर्वथा असफल रहे। चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक प्रविधियों ने (माइक्रो बायोलॉजी, अंगों का प्रयोग शाला में विकास एवं प्रत्यारोपण), कम्प्यूटर क्रान्ति ने और अब कृत्रिम बुद्धि के विकास के प्रयासों ने आत्मा के पृथक अस्तित्व को स्वीकार करने वालों के समक्ष चुनौती सी प्रस्तुत कर दी है।

भौतिक वैज्ञानिक उन्नति के दुष्प्रभाव:- आज की इस भौतिक उन्नति ने वर्तमान ही नहीं वरन् पूर्व (बुजुर्ग) पीढ़ी को भी भौतिकता के रंग में इस प्रकार रंग दिया है कि नैतिकता, सदाचार व संयम की सारी मर्यादायें छिन्नभिन्न हो गई हैं और मानव समाज भौतिक इन्द्रिय विषयों से प्राप्त क्षणिक सुख में ही मग्न होकर आत्म पतन के मार्ग पर निश्चिंतता से अग्रसर है। प्रबुद्ध समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक व अन्य विचारशील लोग इस पर चिन्ता तो व्यक्त करते हैं परन्तु वे भी बेबस अनुभव करते हैं क्योंकि भौतिक सुखों की लालसा से प्रेरित जीवन चर्या स्वार्थपूर्ण, सद्भाव व संवेदना शून्य एवं व्यस्त से व्यस्ततम होती जाती है।

अतः जब आत्मा-परमात्मा की, आत्म विकास की चर्चा भी की जाती है तो लोगों का सामान्य मत यह होता है कि आत्मा किसने देखा, स्वर्ग-नरक कोरी कल्पना है। अतः परलोक की चिन्ता छोड़कर वर्तमान में जीना ही श्रेयस्कर है। और ऐसी मान्यता ने व्यक्ति को अपने से और भी दूर कर दिया है। यह कहा जाता है कि विज्ञान ने जीवन को अधिक सुविधा युक्त, स्वतन्त्र एवं सक्षम बना दिया है परन्तु यथार्थ इसके सर्वथा विपरीत है। व्यक्ति अब अधिक अक्षम, साधन-सुविधाओं का गुलाम व अन्ध विश्वासी हो गया है।

इसी का नतीजा है – समाज में नये प्रकार के अंध विश्वासों का जन्म, असुरक्षा, पारस्परिक अविश्वास, अनैतिकता एवं अनाचार से ग्रस्त सामान्य जीवन का आविर्भाव, जहां शिक्षा के प्रसार के बाद भी अन्याय, अनीति व अपराधों का ग्राफ बढ़ता ही जाता है। भौतिक सुख के आकर्षण की पराकाष्ठा ने सामाजिक, भौतिक एवं मानसिक पर्यावरण को चिन्ताजनक स्तर तक प्रदूषित कर दिया है।

अध्यात्मआत्मज्ञान की आवश्यकता:- ऐसी स्थिति में प्राचीन आध्यात्मिक एवं संयमित जीवन शैली की आवश्यकता एवं महत्व और भी बढ़ गया है। इस बात की अतीव आवश्यकता है कि वर्तमान पीढ़ी को प्राचीन संतुष्ट, सुखी, संयमित एवं संतुलित जीवन शैली के आधार – अध्यात्म एवं तत्सम्बन्धी जीवन आदर्शों व सिद्धान्तों से वैज्ञानिक एवं तार्किक विधियों का प्रयोग कर परिचित कराया जावे।

इस हेतु प्रथमतः यह अनिवार्य आवश्यकता है कि व्यक्ति आत्मा के अस्तित्व से, उसके गुण-स्वभाव व उसकी सामर्थ्य से परिचित एवं आत्म सामर्थ्य का विश्वासी हो। आत्म-पतन के कारणों व आत्म विकास की विधियों व आत्मोन्नति के सुफल का उसे ज्ञान व विश्वास हो। केवल तभी वह भौतिकता के मायाजाल से मुक्त होकर वास्तविक आत्मिक सुख शान्तिमय एवं सर्वतः सन्तुष्ट जीवन जीने में सफल हो सकता है।

इसी उद्देश्य को लेकर प्रस्तुत आलेख में आत्मा के सम्बन्ध में आधुनिक पीढ़ी द्वारा उठाये जाने वाले अविश्वास जनित प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं को ध्यान में रखते हुये तर्क, अनुभव व आगम के प्रकाश में तथा वैज्ञानिक प्रयोगों की असफलता के आधार से विचार करना, आत्मा के अस्तित्व को सुनिश्चित रूप से सिद्ध करना तथा आत्मा के स्वरूप, सामर्थ्य, वर्तमान दशा एवं आत्मविकास की विधियों पर भी विचार करना अभीष्ट है।

आत्मा एवं इसके समानार्थक शब्दों के अर्थ:-

(1) आत्मा का अर्थ:- आत्मा शब्द संस्कृत भाषा के अनुसार ‘अत्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है –सतत् गमन। गमनार्थक धातुएं ज्ञान के अर्थ में भी प्रयुक्त होती हैं। अतः अत् का एक अर्थ निरन्तर जानना भी है।

आत्मा शब्द भाषा विज्ञान के अनुसार इस प्रकार निष्पन्न हैः- आत्मा = आ+अत् (धातु) + मनिन् (प्रत्यय), ‘आ’ का अर्थ है पूर्ण रूप से, ‘अत्’ अर्थात् सतत् जानना एवं ‘मनिन्’ का अर्थ है तन्मय रूप से अथवा तन्मय होकर। ‘मनिन्’ प्रत्यय, आ+अत् में जुड़ने पर आत्मन् शब्द बनता है (मनिन् में इन् का लोप हो जाने से) आत्मन् से ही ‘आत्मा’ बनता है।

इस प्रकार ‘आत्मा’ शब्द का अर्थ हुआ – पूर्ण रूप से तन्मय होकर निरन्तर जानना। ‘अत्’ का अर्थ निरन्तर गमन-परिणमन भी होने से यह पदार्थ के नित्य-निरन्तर परिणमन-परिवर्तनशील स्वभाव को भी सूचित करता है।

आधुनिक विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, उसकी अवस्था मात्र बदलती है। परिवर्तन के साथ स्थायित्व अथवा स्थापित्व के साथ परिवर्तन यही सृष्टि का शाश्वत नियम है। अतः इस सिद्धान्त के अनुसार आत्मा भी निरन्तर परिवर्तनशील एवं वस्तु रूप से ध्रुव (स्थाई) रहने वाला पदार्थ होना चाहिये। वह ऐसा है भी।

वर्तमान जीवन में जन्म से लेकर वर्तमान समय तक के अर्जित ज्ञान व अनुभूत सुखादि से, राग-द्वेष आदि भावों के परिवर्तनों व पुनर्जन्म की घटनाओं से आत्मा का स्थायित्व के साथ परिवर्तनशीलता का स्वभाव अथवा आत्मा की उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मकता स्वतः सिद्ध है। ‘आत्मा’ की इस पूरी व्याख्या से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि आत्मा नामक पदार्थ या द्रव्य मात्र जानने-देखने, अनुभव करने के ही स्वभाव वाला होने से मात्र ज्ञाता-दृष्टा है। जड़ पदार्थों को बनाना, बिगाड़ना, उनमें परिवर्तन करना अथवा उनका उपयोग-यह सब इसके कार्य की सीमा से बाहर ही है।

(2) आत्मवाची समानार्थक मुख्य शब्द और उनके अर्थ:-

() ‘जीव का अर्थ:- ‘जो जीवे सो जीव’ ऐसा सूत्र वाक्य है। जो जीता है, जिसमें जीवन है उसे जीव कहते हैं।

‘जीवन’ शब्द ‘जीव’ शब्द में ‘न’प्रत्यय लगने से बनता है। ‘न’ प्रत्यय क्रिया की निरन्तरता का सूचक है, अतः जीवन का अर्थ हुआ – जीवरूप से निरन्तर रहना और यह कार्य जीव के अतिरिक्त अन्य का नहीं हो सकता। क्योंकि शरीर को जीव द्वारा त्याग देने के बाद उसमें जीव का अभाव हो जाने से जीव के स्वभाव से सम्बंधित सारी ही क्रियाएं अर्थात् जीवन की क्रियाएं भी समाप्त हो जाती है। जबकि शरीर अपने पूर्ण स्वरूप-संरचना के साथ यथावस्थित पड़ा रहता है।

जीवन अर्थात् जानने-देखने, सुख-दुःख का अनुभव करने वाले जीव का जीव रूप से रहना/जीवित रहना। जब तक किसी शरीर में सक्रिय इन्द्रियाँ, मन- वचन- काय बल, आयु एवं श्वासोच्छवास पाये जाते हैं तब तक उसमें जीवन की जानने-देखने, सुख-दुःख का अनुभव करने की क्रियाओं का अथवा तो राग-द्वेष, क्रोध-मान आदि विकार रूप (दोषपूर्ण) भावों का अस्तित्व भी पाया जाता है और तब तक ही उसमें जीवन का अस्तित्व स्वीकार किया गया है, उसे जीवित कहा जाता है।

साथ ही सुख-दुःख का अनुभव एवं रागादि विकार भी ज्ञानपूर्वक ही होते हैं, अतः जीव का मुख्य स्वभाव एवं कार्य जानना सिद्ध होता है। इस प्रकार आत्मा ही जीव है और जीव ही आत्मा है।

() चेतन का अर्थ:- चेतन शब्द चेत+न (प्रत्यय) मिलकर बना है, तथा चेत शब्द ‘चित्’ धातु से निष्पन्न होता है। जिसका अर्थ है:- जानना, देखना, समझना, सतर्क होना आदि। अतः चेतन शब्द – चेत+न (प्रत्यय) मिलकर बना होने से यह भी जानने-देखने, समझने, सतर्क होने रूप कार्य की निरन्तरता का सूचक है। फलतः जिसमें ये क्रियायें होती हैं वह चेतन वस्तु है।

लगभग 50-60 वर्ष पूर्व माताएं बच्चों को प्रातः जगाते समय कहा करती थीं, ‘उठो बेटा! चेत करो, उठो। यहां इस कथन का तात्पर्य यह था कि रात्रि पर्यन्त तुम अपने चेतने सम्बन्धी (जानने-देखने, सीखने-समझने सम्बन्धी) कार्यों से निद्रा की दशा में विरत रहे हो, अब सूर्योदय हो गया है अतः तुम उठो और अपने जानने-देखने रूप कार्य में लग जाओ, जाग्रत हो जाओ।

वास्तव में तो चेतन का चेतने सम्बन्धी कार्य निद्रावस्था में भी स्वप्नादि के देखने रूप से अथवा अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प, विचार आदि के रूप में निरन्तर चलता ही रहता है जो चेतन वस्तु के चेतने रूप स्वभाव की निरन्तर क्रियाशीलता का ही द्योतन करता है। चेतन होने की योग्यता अथवा स्वभाव को ही चैतन्य कहते हैं, इसे ही चेतना भी कहा जाता है। इस प्रकार जो आत्मा है, वही जीव है, वही चेतन है।

आत्मा के अस्तित्व की सिद्धि:-

आत्मा व इसके समानार्थक जीव व चेतन शब्दों की व्याख्या समझ में आने पर आत्मा नामक चेतन पदार्थ के अस्तित्व में कोई संदेह रहना नहीं चाहिये। परन्तु अनेक विचारकों के अनेक मन्तव्य होने से, वैज्ञानिकों द्वारा आत्मा के अस्तित्व की पुष्टि न होने से आत्मा नामक वस्तु के स्पष्ट अस्तित्व के प्रति संदेह होना स्वाभाविक है।

आत्मा नामक वस्तु का स्वतन्त्र अस्तित्व है इसे सिद्ध अथवा स्वीकार करने के लिये निम्न बिन्दुओं पर दृष्टिपात करना उपयोगी रहेगा।

(1) कोई भी शब्द निरर्थक नहीं होता:- इस विश्व में जितने भी वाचक शब्द हैं उनसे सम्बन्धित वाच्य वस्तु का सदैव ही सद्भाव पाया जाता है। चाहे वह किसी भी भाषा का हो। वह वस्तु कोई द्रव्य, उसका कोई गुण या स्वभाव अथवा उसकी कोई दशा (पर्याय) हो सकती है। यदि नई वस्तुओं का आविष्कार होता है तो उसके लिये नये शब्द भी बनाये जाते हैं जैसा कि आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के तीव्र प्रवाह के इस युग में देखा जा रहा है। पुराने लोगों ने जिन कम्प्यूटर, मोबाइल, राकेट, चिप, स्टार्टअप आदि शब्दों के बारे में पढ़ा भी नहीं था, वे आज के बच्चों की जुबान पर भी चढ़े हुये हैं।

यदि यह कहा जाये कि बन्ध्या-पुत्र, आकाश-कुसुम जैसे शब्द तो हैं परन्तु ये वस्तुएं तो देखी नहीं जाती। इसका उत्तर यह है कि ये शब्द नहीं, शब्द युग्म हैं जो असम्भव अस्तित्व हीन वस्तुओं को इंगित करते हैं। वास्तव में मूल शब्द तो बन्ध्या (स्त्री), पुत्र, आकाश और कुसुम हैं ओैर इनका अस्तित्व तो जगत में सुविदित है।

उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि आत्मा नामक शब्द यदि लोक व्यवहार में सुप्रचलित है तो आत्मा नामक पदार्थ भी जगत में होना ही चाहिये। असत् (अस्तित्वहीन) पदार्थों के लिये लोक व्यवहार में भी कोई शब्द प्रचलित नहीं होता।

(2) विश्व को जानने वाला कोई तो भिन्न चेतन पदार्थ होना ही चाहिये:- वास्तव में तो यह विश्व चेतन-अचेतन पदार्थों का समुदाय है जहां सभी अपनी पृथक् सत्ता को कायम रखते हुये एक साथ रहते हैं तथा कार्य रूप परिणमन (अवस्था परिवर्तन) भी अपने स्वभावानुसार उनमें सहज ही होता रहता है। यदि विश्व में मात्र अचेतन द्रव्यों का ही अस्तित्व स्वीकार किया जाये तो उनके जानने वाले भिन्न द्रव्य के अभाव में विश्व व उसके घटक द्रव्यों का अस्तित्व ही निरर्थक हो जाता है।

यदि जानने वाला ही न हो तो विश्व के जानने में आने योग्य पदार्थों के अस्तित्व का क्या अर्थ है? यदि यह कहा जाये कि भोजन-पानी, हवा, व स्त्री-पुरूष के रज-वीर्य से मिलकर बना यह शरीर ही चेतनता को प्राप्त होकर जानने-देखने, अनुभव करने की सामर्थ्य वाला हो जाता है और शरीर की स्थिति तक (आयु प्रमाण) वह जानता-देखता भी रहता है, तो यह बात युक्ति संगत नहीं है। क्योंकि ऐसा मानने पर जन्म-मृत्यु की, आयु की बात कोरी कल्पना ही होगी। वास्तव में तो अनेक अचेतन पदार्थों से मिलने पर भी उनमें मूलतः चेतना का अभाव होने से उनके यथा विधि संयोग से निर्मित शरीर में चेतना का उत्पन्न होना असंभव है।

अतः जगत के अचेतन, जड़ पदार्थों को जानने वाला कोई चेतना संयुक्त, जानने-देखने के स्वभाव वाला भिन्न द्रव्य होना ही चाहिये और ऐसा है भी क्योंकि विश्व एवं उसके घटक द्रव्यों को देखना जानना यह तो प्रत्यक्ष ही है। यह देखने-जानने वाला पदार्थ ही आत्मा है।

(3) जन्म मृत्यु का होना आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करता है:- नवीन देह को आत्मा के द्वारा धारण करना जन्म कहलाता है और वर्तमान शरीर को त्याग देना ही मृत्यु कहलाता है। संसार अवस्था में आत्मा अपने कर्मानुसार अलग-अलग जड़ शरीरों को धारण करता हुआ एवं उस शरीर में अपनी आयु पूर्ण कर उसको छोड़ता और पुनः नवीन देह धारण करता रहता है। शरीर व आत्मा का संयोग होने पर जीवन की क्रियाएं प्रारम्भ होती हैं और इनका वियोग होने पर वे समाप्त भी हो जाती हैं। परन्तु जीव और शरीर कभी समाप्त नहीं होते, इनका मात्र रूपान्तरण होता है।

मृत्यु के बाद भी जड़ शरीर व उसके अंगोपांग तो वही रहते हैं, परन्तु उनमें आत्मा के अस्तित्व के कारण चलने वाली जीवन की क्रियाएं समाप्त हो जाती हैं। इससे सिद्ध होता है कि शरीर कहीं मरता नहीं है, वह तो जीवित अवस्था में एवं मृत्यु के बाद की अवस्था में भी समान ही रहता है। अतः वहां जीवन का आधारभूत कोई अन्य पदार्थ अवश्य ही उससे भिन्न होना चाहिये जो जानने-देखने वाला, सुख-दुःख का अनुभव करने के स्वभाव वाला हो, वही आत्मा है।

वास्तव में तो जीवित प्राणी का शरीर एवं मृत शरीर दोनों ही अचेतन है। आत्मा ही एक मात्र चेतन पदार्थ है जिसके निमित्त से उस शरीर में जीवन के लक्षण देखे जाते हैं। जीवन की सारी मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओं के पीछे भी मूलतः तो ज्ञान ही है जो आत्मा का विशिष्ट स्वभाव है तथा जो जीवन की क्रियाओं के परिवर्तन के क्रम में भी सदाकाल विद्यमान रहता है। इस प्रकार भी आत्मा का पृथक् अस्तित्व सिद्ध होता है।

(4) आयु का व्यवहार आत्मा की पृथक सत्ता का परिचायक है:- आयु का व्यवहार विश्व व्यापी है। जब दो व्यक्ति मिलते हैं तो जिज्ञासावश आयु भी पूछ ली जाती है। आयु अर्थात किसी आत्मा की उस शरीर में व्यतीत की गई समयावधि। इस प्रकार आयु का व्यवहार आत्मा के किसी शरीर में रहने की अवधि जानने के सम्बन्ध में होता है।

शरीर जिन जड़ परमाणुओं का बना है वे तो शाश्वत हैं और उनका परिणमन रूप कार्य निरन्तर चलता रहता है। उन जड़ परमाणुओं के विशिष्ट प्रकार के संयोग को ही शरीर कहा जाता है जिसको अपना आश्रय स्थल बनाकर कोई जीव उसमें रहता है। प्रत्येक जीव का अपने-अपने भाव रूप कर्मानुसार अपने शरीर में रहने का समय भी निश्चित होता है और समयावधि पूरी होते ही जीव उस पुराने शरीर को छोड़कर नये शरीर में चला जाता है। इस अवधि को ही उस जीव की उस शरीर में रहने की आयु कहा जाता है। इससे सिद्ध होता है कि आयु का लोक व्यवहार भी शरीर से भिन्न आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करता है।

(5) पुनर्जन्म पूर्वजन्म की स्मृति:- समाचार पत्रों में यदा-कदा प्रकाशित होने वाले पुनर्जन्म व पूर्वजन्म की स्मृति के समाचार भी इस शरीर से भिन्न किसी चेतन पदार्थ के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। किसी-किसी व्यक्ति को (जीव को) मृत्यु के बाद धारित नवीन जन्म में पूर्व भव (पूर्व जन्म) की स्मृति उत्पन्न हो जाती है। उस व्यक्ति द्वारा पूर्व जन्म का विवरण बताये जाने एवं परीक्षण किये जाने पर सत्य भी पाया जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि पूर्व देह को छोड़कर आया हुआ जीव ही नवीन देह को धारण कर नवीन स्थान पर उत्पन्न हुआ है। चूंकि जीव का स्वभाव ही जानना-देखना है, और कोई भी द्रव्य कभी भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता, इस नियम से वह जीव अपने ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव सहित ही नये स्थान पर उत्पन्न होता है। किसी किसी जीव को किसी समय में अपने ज्ञान स्वभाव के पूर्व जन्म की स्मृति रूप विकास को प्राप्त हो जाने पर ही वह पूर्वजन्म का विवरण बता पाता है। यह पूर्व जन्म की स्मृति रूप ज्ञान का विकास सब जीवों को नहीं होता।

पूर्व जन्म की स्मृति एवं नवीन देह का धारण, आत्मा के शरीर से भिन्न अस्तित्व को तथा अस्तित्व की निरन्तरता को सिद्ध करता है। शरीर जड़ है अतः मृत्यूपरान्त उसको नष्ट कर दिया जाता है अथवा नष्ट होने के लिये छोड़ दिया जाता है और शरीर व इन्द्रियों की क्रियाओं के माध्यम से अपने अस्तित्व की घोषणा करने वाला आत्मा अन्यत्र नवीन देह धारण कर लेता है।

(6) व्यंतरों (भूतप्रेतों, प्रेतात्माओं का) का अस्तित्व:- विश्व में भूत-प्रेतों, प्रेतात्माओं का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है। ये भूत-प्रेत व्यंतर जाति के देव होते हैं जो सामान्यतः तीव्र राग या द्वेष रूप प्रकृति वाले या तीव्र अहंकारी होते हैं। ये अपने तीव्र राग या द्वेष के कारण स्वयं को उपलब्ध विशिष्ट ज्ञानजन्य स्मृति का उपयोग करके अपने पूर्व जन्मों से सम्बन्धित प्रियजनों का हित करने के लिये अथवा शत्रुओं को परेशान-पीड़ित करने के लिये अथवा तीव्र अहंकार की पूर्ति हेतु अनेक प्रकार की कौतूहल पूर्ण क्रियाएं अदृश्य रहकर करते रहते हैं। अनेक भुक्तभोगी व्यक्तियों के अनुभव इनकी उपस्थिति की साक्षी देते हैं।

प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध में मारे गये अनेक विमान पायलटों व सैनिकों की आत्माओं द्वारा परवर्ती युद्ध काल में पायलटों व सैनिक दुकड़ियों का मार्ग दर्शन किये जाने की घटनाएं प्रसिद्ध हैं। वे और कोई नहीं, मृत पूर्व सैनिकों व पायलटों की आत्माएं ही हैं जो मृत्यूपरान्त व्यंतरों (भूत-प्रेतों) के रूप में देवयोनि में उत्पन्न हुई हैं।  

यदि आत्मा न हो तो भूत-प्रेतों द्वारा पूर्व जन्मों के इष्ट-अनिष्ट व्यक्तियों का हित-अहित करना किस प्रकार संभव है, क्योंकि उनके द्वारा पूर्व में धारित शरीर तो बहुत पहले ही नष्ट किया जा चुका होता है।

(7) परकाया प्रवेश की प्राचीन घटनाएं उल्लेख:-

महर्षि पतंजलि प्रणीत ‘योग सूत्र’भारतीय अध्यात्म विद्या में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। उसमें योग साधना पूर्वक उपलब्ध परकाया प्रवेश सम्बन्धी सामर्थ्य  एवं विधियों का भी उल्लेख किया गया है (योग सूत्र, विभूतिपाद, सूत्र-38)। प्राचीन साहित्य में ऐसे योगियों के विवरण मिलते हैं जो परकाया प्रवेश की विद्या में पारंगत थे। आदि शंकराचार्य के सम्बन्ध में भी ऐसा उल्लेख उपलब्ध होता है जिसमें उन्होंने किसी प्रश्न का समाधान पाने के लिये एक सद्यः मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया था और उद्देश्य पूरा होते ही वे अपने पूर्व शरीर में वापस आ गये थे। (संदर्भ-जगतगुरू शंकराचार्य (उपन्यास) लेखक-जनार्दनराय नागर)

जैन धर्म के आचार्य शुभचन्द्र द्वारा रचित ‘ज्ञानार्णव’ नामक ग्रन्थ में भी योगियों के लिये पर-काया प्रवेश की विधि का विवेचन किया गया है। (सर्ग-29, श्लोक क्र. 93 से 102 तक) यह ग्रन्थ जैन योग साधना का प्रतिष्ठापक महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है।

सन् 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ के दिनों में भारत म्यांमार सीमा पर तैनात पश्चिमी कमान के कमाण्डेन्ट श्री एल.पी. फेरेल ने एक वृद्ध साधु द्वारा मृत युवक के शरीर में प्रवेश की प्रत्यक्ष घटना का तथा देह परिवर्तन के बाद नवीन युवा देह धारक उस संन्यासी से बातचीत का वर्णन किया है। जो बाद में नई दिल्ली-भारत से प्रकाशित ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के 17 मई 1959 के अंक में स्वयं श्री फेरेल द्वारा छपवाया गया था। यही घटना बाद में मथुरा (उ.प्र., भारत) से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ के मई 1970 के अंक में भी प्रकाशित हुई थी।

यद्यपि शास्त्रकारों ने आत्म कल्याण की दृष्टि से इस विद्या को महत्वहीन माना है तथा येाग साधकों को इस विद्या के आकर्षण से बचकर मात्र आत्मलीनता पूर्वक उत्पन्न आत्मिक आनन्द की प्राप्ति के लिये ही उद्यमी रहने का निर्देश दिया है। परन्तु इस प्रकार की घटना दो शरीरों से भिन्न उनमें रहने वाले एक सचेतन पदार्थ आत्मा के अस्तित्व को तो सिद्ध करती ही है। इससे शरीर स्वभावतः ही जड़ अचेतन सिद्ध हो जाता है और उससे भिन्न ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव वाला आत्मा भी।

(8) पंच महाभूतों से रचित जड़ शरीर चेतना का आधार नहीं है:- भौतिकता की चकाचौंध से प्रभावित ‘खाओ-पियो और मौज करो’ को ही जीवन का एक मात्र कार्य-उद्देश्य मानने वाले लोग ऐसा मानते हैं कि जीवन मात्र वर्तमान शरीर की अवस्थिति तक ही है, मरने के बाद तो कुछ भी नहीं है, स्वर्ग-नरक सब यहीं है, अलग से ऐसा कोई स्थान व योनि नहीं है। ऐसे लोग आत्मा के अस्तित्व को, अस्तित्व की निरन्तरता को स्वीकार नहीं करते। लेकिन यह मान्यता यथार्थ नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा माना जाये तो भोजन बनाते समय भगोनी, देगची आदि बर्तनों में पांचों ही महाभूतों का समवाय (मिलना, एकत्र होना) हो जाता है तो फिर वहां जीवोत्पत्ति क्यों नहीं होती, बल्कि वहां तो यदि कोई सूक्ष्म जीव खाद्य सामग्री में रह गया हो तो वह भी मर जाता है। यदि शरीर मात्र को ही जीवन का, ज्ञान का आधार माना जाये तो फिर जीव का ध्यान अन्यत्र होने पर भी इन्द्रियां सदैव विद्यमान एवं खुली होने से तथा उनके सम्बन्धित विषयों का संयोग होने पर उन विषयों का ज्ञान हो जाना चाहिये क्योंकि इन्द्रियों का उन विषयों से संयोग तो हुआ है। परन्तु ध्यान अन्यत्र होने पर उन विषयों का ग्रहण नहीं होता, ज्ञान नहीं होता, उनसे सम्बन्धित सुख-दुःख भी नहीं होता, क्योंकि ध्यान अन्यत्र होने पर ज्ञान भी अन्यत्र ही होता है, इन्द्रियों से जुड़ा हुआ नहीं रह जाता।

इससे सिद्ध होता है कि जड़ शरीर के अवयवभूत इन्द्रियां ज्ञान का आधार नहीं हैं, ज्ञान का आधार तो ज्ञान-ध्यानरूप चेतना जिसका स्वभाव है ऐसा आत्मा ही है और वह शरीर से भिन्न ही है।

(9) जीव विज्ञान के अनुसार आत्मा की सिद्धि:- आधुनिक विज्ञान के अनुसार मृत शरीर में जीवन की सहज एवं आवश्यक क्रियाएं जैसे जनन, उत्सर्जन, भोजन ग्रहण, उर्जा उत्पादन (पाचन), पोषक तत्त्वों का विभिन्न अवयवों तक परिवहन, पोषण एवं वृद्धि आदि बन्द हो जाती हैं। जब तक जीवन का अस्तित्व है तब तक ही उक्त क्रियाओं का सद्भाव पाया जाता है और जीवन जीव की उपस्थिति में ही संभव होता है।

जीव विज्ञान (बायोलॉजी) के अनुसार शरीर की कोशिका चाहे वह जन्तु कोशिका हो अथवा वनस्पति कोशिका, शरीर की सबसे छोटी इकाई है। कोशिका में भी जीवन की उक्त सारी क्रियाएं निरन्तर होती रहती हैं और जब कोशिका मर जाती है तब उसका स्थान नई कोशिका ले लेती है। इन कोशिकाओं के समूह से शरीर के ऊतक, कई ऊतकों से मिलकर एक अवयव, कई अवयवों से मिलकर शरीर का एक संस्थान (जैसे पाचन-श्वसन-जनन-उत्सर्जन-रक्त परिवहन-अस्थि संस्थान एवं तंत्रिका तंत्र आदि) बनते हैं और कई संस्थानों से मिलकर एक विकसित प्राणी का शरीर बनता है। यहां भिन्न भिन्न अवयवों की कोशिका रचना भिन्न भिन्न होती है परन्तु उनका मूल स्वरूप समान ही रहता है। सबसे छोटा जीव एक कोशिकीय (प्रोटोजोआ) होता है तथा अन्य विकसित जीवों में क्रमशः अधिक कोशिकाएं व उनसे निर्मित अनेक अंगोपागं होते हैं। परन्तु ये शरीर या इसके सूक्ष्म-स्थूल अवयव तभी तक क्रियाशील रहते हैं जब तक कि उनमें जीव का (आत्मा का) अस्तित्व है। आत्मा द्वारा उस शरीर को छोड़ देने के समय से ही उसमें जीवन की सारी क्रियाएं सदा के लिये समाप्त हो जाती है।

यदि शरीर को ही आत्मा का पर्याय मान लिया जाये तो सारी चिकित्सकीय जांचों में स्वस्थ घोषित व्यक्ति का भी प्राणान्त कैसे संभव होगा? जबकि स्वस्थ घोषित व्यक्ति भी मरते तो देखे जाते हैं और बाद में ऐसे लोगों के अंगो का प्रत्यारोपण अस्वस्थ व्यक्ति के शरीर में किया भी जाता है। जब वह अंग सही है तो उसे पूर्व शरीर में कार्य करना चाहिये, परन्तु वह नहीं करता क्योंकि पूर्व शरीर में जीवन के आधारभूत आत्मा का अभाव हो गया है। वही अवयव नवीन शरीर में आत्मा का अस्तित्व होने से प्रत्यारोपण के बाद सक्रिय हो जाता है।

कई बार न्यायिक मामलों में शवों का पुनः पुनः पोस्टमार्टम अथवा तो उनकी (डी.एन.ए.) जांच भी की जाती है। वहां भी अवयवों की स्थिति अथवा कोशिका की रचना वही की वही रहती है। उसमें क्रोमोसोम व जीन्स के अणु भी यथावस्थित रहते हैं परन्तु जीवन की क्रिया नहीं होती। कारण एक ही है कि वहां आत्मा का सद्भाव नहीं है। साथ ही आत्मा द्वारा शरीर का त्याग करने पर वह शरीर या तो सूखने लगता है अथवा सड़ने लगता है। पेड़ों की लकड़ी तथा खान से निकले पत्थर आदि मूल पेड़ या खान से अलग करने पर सूख जाते है । फल, सब्जियां मूल पौधे से अलग होने पर बढ़ना बन्द कर देते हैं । और कुछ काल बाद ही उसमें विद्यमान पोषक तत्त्वों का आश्रय पाकर नये सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होने लगती है जो उस फल या सब्जी का भक्षण कर उसके मूल स्वरूप को विघटित कर देते हैं। परन्तु पूर्व मूल आत्मा का अभाव हो जाने पर उन मृत कोशिकाओं में वृद्धि या विकास रूप जीवन की क्रियाओं का (पत्र-पुष्प-फल आदि उत्पत्ति रूप) अभाव पाया जाता है। जबकि अभक्ष्य कहे जाने वाले जमीकन्द (आलू आदि) में जीवों का सद्भाव होने से, मूल पौधे से अलग कर देने पर भी श्वसन, पोषण एवं वृद्धि आदि जीवन के लक्षण पाये जाते हैं।

आधुनिक विज्ञान एक कोशिका को जीवन की पूर्ण एवं स्वतन्त्र इकाई मानता है तो उसके आश्रय से एक स्वतन्त्र एक कोशीय जीव भी रहना चाहिये। इसलिये कोशिका में होने वाली जीवन की सारी ही क्रियाऐं अन्य समानजातीय कोशिकाओं के सदृश होने पर भी उनसे स्वतन्त्र ही होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक शरीर अनेक सूक्ष्म जीवों के आश्रय रूप अनेक कोशिकाओं से निर्मित होता है और उस विशाल शरीर के आश्रय से एक भिन्न जीव (मुख्य जीव) रहता है। और इस मुख्य जीव के द्वारा उस शरीर को छोड़ने के साथ ही उसके अवयवभूत कोशिकाएं भी मर जाती हैं अर्थात उनके आश्रय से रहने वाले जीव भी उन कोशिकाओं को त्याग देते हैं। इसके बाद भी कोशिकाओं की मूल रचना वही रहती है, उनमें सूखने की प्रक्रिया के चलते तरलता का अभाव हो जाता है। परन्तु जिनमें नमी बहुत अधिक होती है, वे नये जीवों के द्वारा उन कोशिकाओं को, उनके अवयवों को अथवा उनके समुदाय को अपना आश्रय स्थल बना लेने से, तथा उन्हीं कोशिकाओं में विद्यमान पोषक तत्वों को भोजन के रूप में ग्रहण करने से उनमें सड़ने की-विघटन की एवं नई कोशिकाओं के निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। परन्तु मूल कोशिका की जीवन की क्रियायें तो प्रारम्भ नहीं होती।

प्रश्न:- यहां यह प्रश्न भी उपस्थित हो सकता है कि एक शरीर में अनेक जीवों का अस्तित्व किस प्रकार संभव है?

उत्तर:- इसमें कोई बाधा नहीं है। आधुनिक विज्ञान इस बात को स्वीकार कर चुका है कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में अनेक प्रकार की कोशिकाएं, अनेक प्रकार के सूक्ष्म-स्थूल कृमि, बैक्टीरिया व पाचक रस (एन्जाइम) पाये जाते हैं और उन जीवों के कार्य एवं प्रकृति भी भिन्न-भिन्न पाई गई है। बैक्टीरिया, एन्जाइम व वायरस को जीव माना गया है और रोगोत्पत्ति की दशा में उनको नष्ट करने के लिये एन्टीबायोटिक एवं एन्टीवायरल दवाएं दी जाती हैं। वास्तव में तो आत्मा अमूर्त-इन्द्रियों से अग्राह्य एवं प्रकाश तत्त्व है, जैसे एक कक्ष में अनेक दीपकों का प्रकाश अपने पृथक अस्तित्व सहित सहज निर्बाधरूप से रह सकता है उसी प्रकार एक शरीर के एवं उसके अवयवों के आश्रय से अनेक सूक्ष्म-स्थूल जीव एवं उस पूरे शरीर में व्याप्त एक मुख्य जीव भी रह सकता है।

इस प्रकार जीवन का एक मात्र आधार आत्मा ही सिद्ध होता है, शरीर या उसके अवयवभूत जड़ कोशिकाएं नहीं। इस प्रकार भी शरीर से भिन्न आत्मा के अस्तित्व की सिद्ध होती है।

(10) नवोत्पन्न पशु एवं मानव शिशुओं की क्रियाएं पूर्वार्जित ज्ञान जन्य संस्कारों का परिचय देती हैं :- सामान्यतः यह माना जाता है कि पंचेन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, नासिका, नेत्र, कान-इन्द्रियाँ) एवं मनयुक्त पशु (पालतु पशु) एवं मानव सिखाने पर नया ज्ञान व कौशल अर्जित करते हैं। परन्तु हम देखते हैं कि उत्पन्न होने के साथ ही मानव शिशु अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों के प्रति हंसने व रोने के रूप में अपनी प्रतिक्रिया देना, स्तनपान करना आदि प्रारम्भ कर देते हैं। पशुओं में भी शिशु अपनी माँ के स्तन ढूंढ लेते हैं और स्तनपान कर क्षुधा-तृप्ति कर लेते हैं, वे अपनी माँ को पहचानने में कभी गलती नहीं करते। अन्य सूक्ष्म-स्थूल कीट-पतंगे भी अपनी जरूरत के अनुसार भोजन, आवास आदि की व्यवस्था कर ही लेते हैं।

उक्त सब बातें इस बात की साक्षी हैं कि नवोत्पन्न मानव या पशु शिशु भी कुछ न कुछ आधारभूत ज्ञान जन्म से ही लिये हुये है जिसके बल पर वह अपनी मूलभूत अवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है। वह सुखी अथवा दुखी भी होता है। इससे बिना किसी से सीखे ही उसके इष्ट-अनिष्ट पदार्थों के या स्थितियों के ज्ञान व उनकी प्राप्ति व अप्राप्ति के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की सामर्थ्य की सिद्धि होती है।

यदि आत्मा का अस्तित्व स्वीकार न किया जाये तो प्रश्न यह उठता है कि अचेतन पदार्थों से निर्मित नये जड़ शरीर में यह ज्ञान-सामर्थ्य यह सुख-दुःख आया कहां से? इससे ही यह सिद्ध होता है कि उस अचेतन नव विकसित शरीर में कोई अन्य जानने-देखने वाला, सुख-दुःख का अनुभव करने वाला चेतन पदार्थ (पूर्व शरीर को छोड़कर आया हुआ) विद्यमान होना चाहिये क्योंकि जीवों द्वारा पूर्व जन्मों में अर्जित ज्ञान ही संस्कार रूप में अगले जन्मों में व्यक्त होता है।

इस प्रकार नवोत्पन्न शिशुओं की सहज क्रियाओं से भी पूर्व जीर्ण शरीर को छोड़कर नये शरीर को धारण करने वाले ज्ञान-दर्शन स्वभावी आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व की सिद्धि होती है।

(11) बुद्धि, इच्छा एवं शारीरिक प्रयत्नों में विरोधाभास से आत्मा की सिद्धि:-

यदि जीवित प्राणियों के द्वारा की जाने वाली क्रियाओं का विश्लेषण किया जावे तो उनके किसी भी कार्य को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। उनमें सर्वप्रथम है-ज्ञान अथवा बुद्धि – जो पदार्थों का अथवा अपने लक्ष्यों के औचित्य का, उनकी हेय-उपादेयपने का, इष्ट-अनिष्टपने का अध्ययन, विश्लेषण एवं निर्णय करने के लिये उत्तरदायी है।

दूसरा है-मन, इच्छा अथवा राग-द्वेष। राग इष्ट पदार्थों (हितकर-इच्छित) की प्राप्ति हेतु जीव में उत्पन्न भाव (भावना, विकल्प, विचार) है जो इष्ट पदार्थों के संरक्षण-संवर्धन से भी सम्बन्धित है, तथा द्वेष अनिष्ट (अहितकर-अनिच्छित) पदार्थों की अप्राप्ति एवं उनको दूर करने, नष्ट करने से सम्बन्धित जीव के भावों से सम्बन्धित है। जीव के सभी स्व एवं पर से सम्बन्धित अथवा अहंकार-ममकार से सम्बन्धित भाव, क्रोधादि सभी कषायें, भावनाएं आदि राग-द्वेष में गर्भित हो जाते हैं।

तीसरा है बुद्धि के निर्णयानुसार अथवा राग-द्वेषादि जनित इच्छा अनुसार किये जाने वाले शारीरिक प्रयत्न-इनमें समस्त शाब्दिक एवं शारीरिक प्रयत्न व क्रियाएं सम्मिलित हैं जैसे एक युवक आई.ए.एस. के रूप में नियुक्ति के सुविचारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अध्ययनरत है। तो यहां इस कार्य में उक्त तीनों अवयव स्पष्टतः दिखाई दे जाते हैं:- 1. बौद्धिक निर्णय – इसके अन्तर्गत खूब सोच-विचार कर यह निर्णय लिया जाता है कि आई.ए.एस. के रूप में कार्य करना ही मेरे लिए उपयुक्त है। 2. इच्छा अथवा राग – उसे आई.ए.एस. के पद के प्रति राग या लगाव उत्पन्न हो गया है और वह इसके लिये कुछ भी श्रम करने हेतु तत्पर है और 3. इसके लिये किया जाने वाला निरन्तर अध्ययन रूप परिश्रम।

अब यदि शरीर ही आत्मा हो, आत्मा नाम का कोई भिन्न चेतन द्रव्य न हो तो ये तीनों कार्य – बुद्धि, इच्छा एवं परिश्रम एक शरीर के ही कार्य होने से इनमें पूर्ण समन्वय होना चाहिये, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है।

व्यक्ति आई.ए.एस. बनना चाहता है, इस हेतु दृढ़ संकल्पित है परन्तु बुद्धि-स्मृति, उसकी आँखें व शरीर उसका साथ नहीं देते, वे और अधिक पढ़ने से मना कर देते हैं, वह थक जाता है, पढ़ा हुआ भूल जाता है अथवा तो कदाचित् उसका मन ही पढ़ने में नहीं लगता। ऐसा क्यों होता है? जब बुद्धि, इच्छा व श्रम एक ही शरीर के तीन अवयव हैं तो उनमें यह विरूद्ध प्रवृत्ति नहीं होना चाहिये। बुद्धि के अनुसार इच्छा व श्रम होना चाहिये या इच्छानुसार बुद्धि एवं श्रम होना चाहिये अथवा श्रम की सामर्थ्य  के अनुसार बुद्धि व इच्छा होना चहिये। परन्तु ऐसा होता नहीं है। और भी, जैसे व्यक्ति गपशप में व्यस्त है, उपन्यास या चलचित्र में रमा है वहां बौद्धिक रूप से उसे पता है कि इसमें मेरा समय बर्बाद हो रहा है परन्तु इच्छा-राग बलवान है और वह लम्बा समय व्यर्थ ही गंवा देता है। तथा जैसे एक व्यक्ति को यात्रा करनी है परन्तु व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब हो जाता है।

यदि आत्मा न हो तो फिर बुद्धि, इच्छा व प्रयत्न एक ही शरीर के कार्य होने से इनमें पूर्ण तालमेल होना चाहिये, इन तीनों में कोई विरोध अथवा असहयोग नहीं होना चाहिये। परन्तु वास्तविक जीवन में इनमें विरोध (समन्वय की कमी) पाया जाता है जो यह सिद्ध करता है कि वस्तुतः श्रम या प्रयत्न का साधन शरीर भिन्न है और बुद्धि एवं राग का कर्त्ता कोई अन्य है।

यह भी स्मरणीय है कि जब एक ही व्यक्ति हो तो उसे अपने सारे कार्यों में स्वतन्त्रता होती है, वहां तालमेल या समन्वय की आवश्यकता या कमी का कोई प्रश्न ही नहीं है। परन्तु जैसे ही व्यक्ति अन्य से जुड़ता है जैसे साझेदारी या विवाह में, वहां तालमेल की आवश्यकता होती है क्योंकि जहां दो होते हैं वहां इच्छाओं अथवा हितों का टकराव होता ही है और तब उसको टालने के लिये परस्पर समन्वय व सहयोग की भी आवश्यकता होती है।

दैनिक जीवन में अनुभूत शरीर व मन-बुद्धि के संघर्ष व असहयोग इस बात को सुनिश्चिततया सिद्ध करते हैं कि मन व बुद्धि का धारक कोई ज्ञाता-दृष्टा, रागादि भावों से युक्त कोई चेतन पदार्थ शरीर से भिन्न लेकिन शरीर में ही अवस्थित होता है जो ज्ञान-बुद्धि एवं मन-इच्छा-राग-द्वेष का मूल कारक है तथा शरीर बुद्धि एवं रागादि के अनुरूप प्रयत्नों का कारक है। वह चेतन पदार्थ मन व बुद्धि का, इच्छाओं का धारक द्रव्य ही आत्मा है तथा शरीर जड़-अचेतन है। दो परस्पर विरूद्ध प्रकृति के पदार्थ एक साथ रहने से ही वहां विरोधाभास भी (बुद्धि, मन व शारीरिक श्रम के बीच पाये जाने वाले) स्वाभाविक ही हैं। इस प्रकार भी आत्मा का पृथक अस्तित्व सिद्ध होता है।

(12) मोक्ष की इच्छा आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करती है:- इस विश्व में सभी जीव दुःखी हैं और दुःखों से मुक्ति की इच्छा रखते हैं। पंचेन्द्रिय पशु एवं कीट आदि दुःखों, बन्धनों से मुक्ति के लिये निरन्तर संघर्षशील देखे जाते हैं; मनुष्य की तो बात ही क्या, उसके सारे क्रिया कलाप घर-परिवार, धन-सम्पत्ति एवं शरीर के प्रति अपनी आसक्ति रूप बन्धनों से उत्पन्न दुःख से मुक्ति के लिये ही होते हैं। जब परिवार, व्यवसाय अथवा सामाजिक-राजकीय स्थितियों जनित प्रतिकूलता अथवा शरीर की असाध्य रोग जनित असह्य वेदना सही नहीं जाती तो वह उस प्रतिकूलता से, वेदना से मुक्ति पाने के लिये छटपटा उठता है, यहां तक कि अविवेक की दशा में मृत्यु को भी गले लगा लेता है । विवेकी होने की दशा में व्यक्ति वानप्रस्थ अथवा सन्यस्त जीवन अपना कर ईश्वराराधना अथवा आत्मसाधना द्वारा संसार के दुःखों से मुक्ति का उपक्रम करने लगता है।

यह प्राणियों अथवा मनुष्यों द्वारा संसार एवं दुःखों से मुक्ति का प्रयत्न आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व को सिद्ध करता है, क्योंकि किसी शरीर मात्र का नाम कोई पशु-पक्षी अथवा मनुष्य नहीं है। शरीर की रचना तो जीवन व मृत्यु की अवस्था में समान होने से वह तो अचेतन ही सिद्ध होता है और अचेतन को कोई बन्धन नहीं, कोई दुःख भी नहीं और मुक्ति भी नहीं होती।

इससे सिद्ध होता है कि सुख-दुःख का अनुभव करने वाला, बन्धनों को अनुभव कर उनसे मुक्ति की इच्छा करने वाला कोई सुख स्वभावी, निर्बन्ध, अनुभवशील चेतन पदार्थ आत्मा, शरीर से भिन्न परन्तु शरीर में रहने वाला अवश्य ही होना चाहिये। क्योंकि जो दुखी है वही प्रयत्न पूर्वक सुखी होता है, जो बंधा है वही बन्धनों से मुक्ति का प्रयत्न कर मुक्त होता है वही आत्मा है।

(13) आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करने में विज्ञान की असफलता का कारण:-

आधुनिक विज्ञान भौतिक जड़ पदार्थों से सम्बन्धित है। विज्ञान जड़ पदार्थों के भौतिक, रासायनिक गुणों का तथा सजीव पदार्थों के शरीर की सूक्ष्म-स्थूल रचना व उनके कार्यों-विशेषताओं का अध्ययन, विश्लेषण एवं मूल्यांकन करता है, इसके लिये वह अत्याधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों, मशीनों व प्रविधियों का प्रयोग करता है। यहां मूर्त (इन्द्रिय-ग्राह्य) पदार्थों का अध्ययन-अनुसंधान मूर्त उपकरणों द्वारा किया जाता है। लेकिन आत्मा अमूर्त, ज्ञान-दर्शन-सुख आदि अनन्त गुणों के पुंज रूप चैतन्य पदार्थ है। अमूर्त अर्थात जो इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सके ऐसा पदार्थ। जो सचेतन शरीर के अवयव भूत इन्द्रियों द्वारा भी ग्रहण नहीं किया जा सकता, वह आत्मा पूर्णतः अचेतन जड़ उपकरणों द्वारा किस प्रकार देखा जा सकता है? अर्थात् नहीं देखा जा सकता।

जैसा कि इसकी परिभाषा से स्पष्ट है आत्मा ज्ञान-दर्शन स्वभाव के द्वारा जानने वाला और इस स्वभाव के द्वारा ही जानने में आने वाला पदार्थ है। इसको अनुभव किया जा सकता है परन्तु देखा नहीं जा सकता/इन्द्रिय ग्राह्य न होने से इसका भौतिक प्रयोगशाला में अध्ययन-परीक्षण भी संभव नहीं है।

जिस प्रकार बिजली के तारों में करंट रूप में बहते हुये विद्युत प्रवाह को देखा नहीं जा सकता परन्तु बल्ब, टी.वी. या अन्य विद्युत उपकरणों की क्रियाशीलता द्वारा उसके अस्तित्व का ज्ञान किया जा सकता है। करंट बिजली के तारेां में इलेक्ट्रानों के प्रवाह रूप होने से वोल्टमीटर (विभव मापी), एमीटर (धारामापी) आदि अनेक उपकरणों द्वारा उसके अस्तित्व का ज्ञान एवं परीक्षण-मापन अवश्य किया जा सकता है। करन्ट की सामर्थ्य  अनेक उपकरणों में भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों के रूप में देखी जाती है, परन्तु करन्ट का प्रवाह सर्वत्र समान ही होता है, उसकी तीव्रता (सामर्थ्य ) समय-परिस्थिति एवं उपकरण की प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है। उसी प्रकार आत्मा भी अनुभव में आने वाला एवं अनुभव पूर्वक चेतन-अचेतन सभी पदार्थों को जानने वाला अमूर्त-अतीन्द्रिय (इन्द्रियों की क्षमता-सीमा से बाहर) पदार्थ है। अनेक भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों को धारण करता हुआ यह आत्मा उन शरीरों की प्रकृति के अनुसार ही अपने जानने-देखने के स्वभाव द्वारा स्वयं के अस्तित्व की घोषणा करता है। जानने-देखने, समझने, चिन्तन-मनन आदि एवं शरीरों में पाई जाने वाली जीवन की आवश्यक क्रियाओं द्वारा यह जानने में आता है। इसमें अनुभव होने वाले सुख-दुःख का भी शरीर व मुखाकृति के अनेक रूपों द्वारा अनुमान किया जा सकता है। किसी जीव के अनुभव को कोई दूसरा जीव अनुभव नहीं कर सकता, उसकी अनुभूतियों का (सुख-दुःखादि का) अनुमान अवश्य कर सकता है। शरीर की अवयवभूत इन्द्रियां इसमें सहयोगी होती हैं। आत्मा की पर्यायगत (अवस्थागत) सामर्थ्य उन शरीरों के माध्यम से की जाने वाली मानसिक, शाब्दिक एवं शारीरिक क्रियाओं के रूप में व्यक्त होती है परन्तु यह आत्मा की ही सामर्थ्य  होती है शरीर की नहीं क्योंकि शरीर तो जड़ है, निष्क्रिय है। शरीर की क्रियाशीलता आत्मा की उपस्थिति में ही देखी जाती है, अन्यथा नहीं। साथ ही अनेक शरीरों में पाई जाने वाली क्रियाएं भले ही अनेक प्रकार की हों, परन्तु उनमें रहने वाला आत्मा तो एक ही प्रकार का होता है।

वास्तव में तो जिस प्रकार भौतिक जड़ पदार्थों का अध्ययन करने वाला विज्ञान भौतिक विज्ञान कहलाता है, उसी प्रकार आत्मा का अध्ययन करने वाला विज्ञान अध्यात्म विज्ञान, आत्मा का विज्ञान अथवा तो वीतराग विज्ञान कहा जाता है।

निष्कर्ष:- उक्त विवेचन से यह अत्यन्त स्पष्ट है कि आत्मा एक अमूर्तिक, इन्द्रियों से अग्राह्य, ज्ञान-दर्शन-सुख आदि अनेक गुणों से युक्त चेतन पदार्थ है और यह उसके द्वारा धारित शरीर से भिन्न अस्तित्व वाला है। 

आत्मा के अस्तित्व ज्ञान की जीवन में उपयोगिता :—

(1) आत्मा के अस्तित्व का ज्ञान एवं श्रद्धान होने पर स्वयं की अनादि अनंत सत्ता का बोध होता है फलतः जन्म एवं मृत्यु के भय से व्यक्ति मुक्त हो जाता है.

(2) आत्मा एक चैतन्य (ज्ञाता-दृष्टा ) पदार्थ है वह अचेतन पञ्च महाभूतों से निर्मित नहीं है तथा सत्स्वभावी होने से उसका कोई निर्माता और नियंता भी नहीं है, अतः कोई उसका नाश करने वाला भी नहीं है. फलतः व्यक्ति के जीवन में निर्भयता एवं निःशंकता का जन्म होता है.

(3) आत्मा के स्वतंत्र अस्तित्व का बोध होने से अनंत सूक्ष्म- स्थूल जीवों में भी स्वतंत्र आत्म-सत्ता की प्रतीति होती है, अतः उनके प्रति समानता का भाव उत्पन्न होता है. व्यक्ति यह जान जाता है कि जगत के सभी जीव सुख चाहते हैं  फलतः वह अन्य प्राणियों के प्रति दुःख प्रद क्रियाकलापों से निवृत्त होता है.

(4) इस विश्व में भिन्न-भिन्न जीवों में पाई जाने वाली स्वभाव एवं संयोग जनित विभिन्नताओं का बोध होने पर व्यक्ति को कर्म एवं कर्मफल की अटूट व्यवस्था का भी बोध हो जाता है. फलतः वह अपने द्वारा किये जाने  वाले कार्यों एवं भावों के प्रति उत्तरदायित्व का अनुभव करता हुआ सावधानी से वर्तन करता है. वह यह जान जाता है कि मेरे द्वारा किये गए शुभाशुभ कर्मों का फल अनिवार्यतः मुझे ही मिलने वाला है अतः इस व्यवस्था में किसी के प्रति कृतज्ञ अथवा रुष्ट होने का कोई अवसर भी नहीं रहता. वह अपने कष्टों के लिए किसी अन्य को कारण मानने की विपरीत प्रवृत्ति से मुक्त होकर अपनी कमियों एवं त्रुटियों को दूर करने हेतु अथवा तो आत्म विकास हेतु उद्यमी होता है.

(5) व्यक्ति जानता है कि आत्मा अकेला ही जीर्ण शरीर को छोड़ता है एवं नए शरीर को धारण करता है, वह अपने कर्मों के सिवाय अन्य कुछ न तो लेकर आता है और न ही कुछ लेकर जाता है, अतः उसे आवश्यकता से अधिक धन संग्रह निरर्थक भासित होने लगता है. ऐसा व्यक्ति न्याय नीति से उपार्जित धन में संतुष्ट रहता हुआ भौतिक साधनों-सुविधाओं की चकाचोंध में मुग्ध नहीं होता.

(6) इस प्रकार व्यक्ति के जीवन में पापपूर्ण कार्यों से विरक्ति पूर्वक स्वच्छंदता का अभाव होकर सदाचार एवं उच्च नैतिक आचरण तथा सामान्य दैनिक क्रियाकलापों में जीवों की रक्षार्थ सावधानीपूर्ण कार्य पद्धति का विकास होता है. फलतः समाज में न्याय-नीति, उच्च जीवन आदर्श, जीवों के प्रति दया-रक्षा का भाव सर्वत्र प्रवाहित होने लगता है. ऐसा होने पर आर्थिक असमानता, पर्यावरण विनाश, अपराध एवं पर-पीड़न की प्रवृत्तियां जीवन से सहज ही विलीन होने लगती हैं.

(7) आत्मा के अनादि-अनंत अस्तित्व का विश्वास होने पर आत्मा का कोई निर्माता, रक्षक या विनाशक है यह बात कोरी कल्पना ही सिद्ध होती है, अतः परमात्मा की स्वार्थ प्रेरित भक्ति के स्थान पर गुणों के प्रति अनुराग प्रेरित निष्काम भक्ति सहज ही व्यक्ति के ह्रदय में प्रस्फुटित होने लगती है.

(8) आत्मा का अस्तित्व ज्ञान में सुस्थापित होने से व्यक्ति आधुनिक भौतिक विज्ञान की अनात्मवादी मिथ्या मान्यताओं से अप्रभावित ही रहता है. वह जानता है कि आत्मा एक अमूर्त चैतन्य पदार्थ है वह जड़ वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा ग्रहण  किया (जाना ) नहीं जा सकता.

अध्याय —

आत्मा का सामान्य स्वरुप

आत्मा का सामान्य स्वरुप एवं स्वभाव—सामान्य स्वरुप अर्थात जो सभी द्रव्यों में समान रूप से पाया जाये वह . आत्मा (जीव-चेतन ) नामक वस्तु के अस्तित्व का विश्वास हो जाने पर यह जानना आवश्यक हो जाता है कि उसका स्वरुप एवं स्वभाव कैसा है . प्रत्येक द्रव्य जो विद्यमान है , जिसका अस्तित्व है उसका कोई न कोई स्वभाव -स्वरुप एवं क्षेत्र होना ही चाहिए  क्योंकि स्वभाव एवं क्षेत्र के बिना जगत में कोई भी वस्तु नहीं पाई जाती . स्वभाव वह होता है जो स्व +भाव अर्थात वस्तु का अपना भाव (गुण. शक्तियां एवं पर्यायें ) हो , वह किसी अन्य द्रव्य से प्राप्त नहीं होता , इसी कारण वस्तु का स्वभाव उसके अस्तित्व के साथ ही एकमेक सदा विद्यमान (जानने में आता हुआ ) एवं वर्तमान (कार्यरूप परिणमन करता हुआ , वर्तता हुआ ) रहता है . प्रत्येक वस्तु जो विद्यमान है अस्तित्व रूप है , उसका कोई न कोई क्षेत्र अवश्य ही होता है . आकाश के जितने स्थान में कोई वस्तु रहती है  उतना ही उसका क्षेत्र होता है .

अन्य के निमित्त से अथवा अन्य से उपलब्ध होने वाला भाव परभाव है , वह स्वभाव नहीं हो सकता . स्वभाव सदा परभावों से निरपेक्ष ही होता है .

आत्मा के सामान्य स्वरुप, स्वभाव एवं सामर्थ्य को मुख्यतः निम्न बिंदुओं के आधार पर स्पष्टतः जाना जा सकता है —

(1) आत्मा सत् स्वभावी है –सत् अर्थात अस्तित्व . कोई भी वस्तु जो निकट भूतकाल , वर्तमान काल एवं निकट भविष्यकाल में विद्यमान हो तो उसका त्रैकालिक अस्तित्व अर्थात अनंत भूतकाल ,वर्तमानकाल एवं अनंत भविष्यकाल में अस्तित्व अर्थात सत् होना सिद्ध हो जाता है .और जो सत् होता है उसका कोई निर्माता या कारण नहीं होता . वह किसी अन्य शक्ति या द्रव्य का अंश भी नहीं होता और स्वयं में परिपूर्ण भी होता है . जो परिपूर्ण होता है वह स्वभावतः स्वतंत्र एवं शुद्ध भी होता है .

इस प्रकार आत्मा भी अनेकानेक रूपों में अस्तित्वमय ज्ञात होने से वह भी अनादि -अनंत काल के प्रवाह में सदैव अस्तित्वरूप से रहने वाला सहज स्वतंत्र , शुद्ध एवं परिपूर्ण (सर्व प्रकार से पूर्ण ) पदार्थ है .

(2) आत्मा अनंत गुणों का पिंड है —प्रत्येक पदार्थ जो सत्स्वरूप है , अस्तित्ववान है ,उसे अनेक प्रकार की शक्तियों से परिपूर्ण होना ही चाहिए . शक्तिहीन या निर्बल का जगत में अस्तित्व नहीं पाया जाता,  जो शक्तिहीन होता है वह नियम से नष्ट हो जाता है . आज से पचास -सो वर्ष पूर्व के बुजुर्ग (वृद्ध ) लोग आपस में हाल- चाल पूछने पर कहा करते थे , ‘अब शरीर में सत् नहीं रहा , अब तो चला -चली का मामला है .’ इस प्रकार सत् शब्द शक्ति के रूप में भी प्रयुक्त होता है .

साथ ही अनादि -अनंत काल के प्रवाह में यदि कोई द्रव्य अपने अस्तित्व को सुरक्षित बनाये रखते हुए अक्षुण्ण रूप से अवस्थित है तो यह उसके द्वारा धारित गुण -शक्तियों का ही प्रतिफल है तथा ये गुण – शक्तियां संख्या में अनंत एवं शक्ति अपेक्षा भी अनंत होनी चाहिए. काल के अनंत प्रवाह में अनेक प्रकार की परिस्थितियों का बनना स्वाभाविक होने से उसमे अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए अनेक प्रकार की शक्तियों की आवश्यकता एवं उनका प्रयोग स्वाभाविक ही है. साथ  ही अनादि -अनंत अस्तित्व के लिए प्रत्येक शक्ति की अनंतता भी अनिवार्य है क्योंकि अल्प शक्तिवान होने पर शक्ति के समाप्त होने एवं इस कारण द्रव्य के ही नष्ट होने का प्रसंग आ जाता है . परन्तु द्रव्य सत्स्वभावी होने से कभी नष्ट नहीं होता अतः उसमे अनंत शक्तियां और उन शक्तियों की अनंत सामर्थ्य स्वतः सिद्ध है . ये गुण -शक्तियां द्रव्य के सम्पूर्ण क्षेत्र में एवं उसकी त्रिकालवर्ती सर्व अवस्थाओं  में सदैव पाए जाते हैं .

संसार परिभ्रमण  के इस चार गति रूप (स्वर्ग , नरक , मनुष्य एवं तिर्यंच ) अनादि प्रवाह में भी अपना अस्तित्व बनाये रखने से आत्मा भी अनंत शक्तियों का पिंड एवं प्रत्येक शक्ति की अनंत सामर्थ्य का धनी सिद्ध होता है .

आत्मा एवं अन्य सभी द्रव्यों में पाए जाने वाले गुणों की मुख्य विशेषताएं निम्न प्रकार हैं:—

(1) प्रत्येक द्रव्य में अनंत गुण-धर्म-शक्तियां पाए जाते हैं जो शक्ति-सामर्थ्य अपेक्षा भी अनंत होते हैं.

(2) द्रव्य गुणों का आश्रय-स्थल होता है और गुण द्रव्य के आश्रित होते हैं.

(3) गुणों का द्रव्य से भिन्न कोई अस्तित्व नहीं होता.

(4) द्रव्य के समान ही गुण भी शाश्वत-शुद्ध एवं ध्रुव होते हैं. ये द्रव्य का शाश्वत स्वभाव होते हैं. अतः द्रव्य की सर्व अवस्थाओं में ये गुण सदैव विद्यमान रहते हैं.

(5) द्रव्य अवयवी-अंशी होता है और गुण उसके अवयव-अंश होते हैं.

(6) जैसे अनेक स्वादिष्ट- सुगन्धित द्रव्यों से बनी हुई ठंडाई में सर्वत्र ही प्रत्येक घटक व उसके गुणों का अस्तित्व समान रूप से तथा स्वतन्त्रतया ही पाया जाता है उसी प्रकार द्रव्य के सारे ही गुण एकमेक रूप से द्रव्य के सम्पूर्ण भाग में- सर्व क्षेत्र में पसरे रहते हैं. द्रव्य का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं होता जहां अनंत गुण एक साथ न पाए जावें, फिर भी प्रत्येक गुण का अपने स्वभाव रूप से अस्तित्व साथ रहते हुए अन्य गुणों से निरपेक्ष एवं स्वतंत्र होता है.

(7) द्रव्य के गुण होते हैं, परन्तु गुणों का कोई गुण नहीं होता इसीलिये गुणों में अपने स्वभाव रूप योग्यता-शक्ति तो होती है परन्तु परिणमन की सामर्थ्य गुणों को द्रव्य से ही प्राप्त होती है; ठीक उसीप्रकार जैसे कि एक राज्य में अनेक कर्मचारी होते है और प्रत्येक कर्मचारी अपने काम में निष्णात भी होता है परन्तु उसे कार्य करने की शक्ति राज्य से ही प्राप्त होती है.

(8) द्रव्य के सम्पूर्ण क्षेत्र में सर्वत्र सभी अनंत गुण एक साथ रहने से प्रत्येक गुण का अन्य अनंत गुणों में रूप (प्रभाव) होता है. जैसे आत्मा में अस्तित्व गुण है, इस गुण के कारण आत्मा का द्रव्य रूप में अस्तित्व रहता है साथ ही अन्य अनंत गुणों का अस्तित्व भी इस गुण के प्रभाव से निरंतर बना रहता है. तथा जैसे आत्मा में द्रव्यत्व गुण होता है जिसके कारण प्रत्येक द्रव्य का प्रति समय नई-नई पर्याय रूप परिणमन-कार्य निरंतर होता रहता है, वहीं आत्मा में ज्ञान गुण भी है जानना उसका स्वभाव-शक्ति है परन्तु उसे जानने रूप कार्य करने की शक्ति द्रव्यत्व गुण के योग से मिलती है और यह द्रव्यत्व गुण आत्म -द्रव्य का है , ज्ञान गुण का द्रव्यत्व गुण नहीं है.

तथा जैसे शरीर में अनेक अवयव हैं हृदय का कार्य पूरे शरीर में रक्त-संचार करना है. हृदय के इस कार्य से शरीर के अन्य सभी अंग प्रभावित होते हैं. यदि हृदय का कार्य न हो तो अन्य अवयवों का कार्य भी न हो. इसी प्रकार शरीर के अन्य अवयवों के कार्यों  से भी शेष सभी अवयव प्रभावित होते हैं तथापि प्रत्येक अवयव का अपने स्वभाव रूप कार्य स्वतन्त्रतया ही चलता रहता है.

इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य में प्रत्येक गुण का कार्य (पर्याय रूप परिणमन) अन्य गुणों को भी प्रभावित करता है, यदि एक गुणका भी कार्य न हो तो अन्य गुणों का भी कार्य न हो , फिर भी प्रत्येक गुण स्वतन्त्रतया अपने स्वभावानुसार ही कार्य-पर्याय रूप परिणमित होता रहता है.

(9) चूंकि परिणमन स्वभाव द्रव्य का होता है अतः वास्तव में तो सभी पर्यायें भी द्रव्य की ही होती हैं. परन्तु द्रव्य के स्वभावभूत अनंत गुणों की शक्ति व कार्य का ज्ञान कराने के लिए “यह इस गुण की पर्याय है”, ऐसा भी कहा जाता है. जैसे आत्मा का ज्ञान गुण है अतः जानना आत्मा का स्वभाव है, परन्तु ज्ञान गुण की सामर्थ्य का ज्ञान कराने के लिए कहा जाता है कि आत्मा ज्ञान से जानता है या यह ज्ञान गुण का जानने रूप कार्य है तथा इसीलिये ज्ञान की अनेक प्रकार की जानने की सामर्थ्य की दृष्टि से ही ज्ञान गुण के ही अनेक भेद मति-श्रुत-अवधि ज्ञान आदि किये जाते हैं.

(10) जिस प्रकार किसी देश की समृद्धि व शक्ति उस देश के नागरिकों की समृद्धि व शक्ति का योग होता है उसीप्रकार द्रव्य के अनंत गुणों की पर्यायों का समवेत रूप उस द्रव्य की द्रव्य पर्याय कहा जाता है तथा प्रत्येक गुण की अलग-अलग पर्याय को गुण पर्याय कहा जाता है.

 (3) आत्मा में अनंत गुण –शक्तियों का कार्यरूप परिणमन (अवस्था परिवर्तन )सदा होता रहता है –शक्तियां कभी भी निष्क्रिय नहीं होती , और जो निष्क्रिय हो उसे शक्ति नहीं कहते . शक्तियों में निरंतर कार्य रूप परिणमन होता रहता है , इसी कारण प्रत्येक द्रव्य प्रति समय नया -नया रूप-आकार धारण करता रहता है .कार्य रूप परिणमन  का फल (परिणाम ) ही द्रव्य की नई -नई अवस्थाओं के रूप में देखा जाता है जिसे द्रव्य की अवस्था , पर्याय ,दशा या हालत भी कहते हैं . ये पर्यायें सदैव क्षणिक होती हैं इसीलिये प्रति समय पूर्व पर्याय का व्यय (नाश ) होकर नई -नई अवस्था (पर्याय ) उत्पन्न होती है तथा द्रव्य शाश्वत -ध्रुव (वही का वही ) बना रहता है .

वस्तुओं में होने वाले कार्य रूप परिणमन द्वारा ही उनके अस्तित्व का ज्ञान होता है . निष्क्रिय पदार्थों का विश्व मेंअस्तित्व नहीं पाया जाता है . जैसे योग्य एवं क्रियाशील व्यक्तियों का ही अपने पद पर, अपने समूह में अस्तित्व बना रहता है , अयोग्य व्यक्ति या तो स्वयं ही वहां से हट जाते हैं अथवा उन्हें वहां से हटा दिया जाता है अर्थात अयोग्य -निष्क्रिय व्यक्तियों का अपने पद पर या समूह में अस्तित्व समाप्त हो जाता है . उसी प्रकार आत्मा भी यदि अल्पशक्तिवान या निष्क्रिय पदार्थ हो तो उसका द्रव्यों के समुदाय रूप इस विश्व में अस्तित्व संभव नहीं होता . परन्तु आत्मा सदा सक्रिय रहने वाला पदार्थ है , उसका स्वयं व अन्य पदार्थों को देखना -जानना , सुख -दुःख का अनुभव व अन्य पदार्थों के निमित्त से होने वाला मोह (यथार्थ -वास्तविक वस्तु -स्वरुप का अज्ञान ), राग (पर द्रव्यों को इष्ट – हितकर मानकर उनमें प्रीति , प्राप्ति का भाव )  या द्वेष (परद्रव्यों को अनिष्ट -अहितकर मानकर उनमें अप्रीति , उन्हें दूर करने- नष्ट करने का भाव ) भाव रूप परिणमन (कार्य ) संसार दशा में निरंतर चालू रहता है . जन्म -मृत्यु एवं जीवन की अन्य आवश्यक क्रियाएं भी आत्मा के सक्रिय होने का , उसके नित्य परिणमनशील स्वभाव का ही द्योतन करती हैं .

पर्याय  स्वभाव की  विशेषताएं —

(a) द्रव्य की सभी पर्यायें चाहे वे शुद्ध हों या अशुद्ध हों, द्रव्य के शाश्वत स्वभाव के आधार से तथा द्रव्य को प्रसिद्ध करती हुई ही उत्पन्न होती हैं. वे अपने द्रव्य स्वभाव का कभी भी उल्लंघन नहीं करती.  परन्तु ये पर्यायें द्रव्य के ध्रुव स्वभाव में कभी भी प्रविष्ट नहीं होती; इसीलिये कोई पर्याय शुद्ध हो या अशुद्ध,  द्रव्य स्वभाव उससे अप्रभावित ही रहता है. फलतः पर्यायों का नाश एवं उत्पाद होने पर भी द्रव्य और उसका स्वभाव हीनाधिक नहीं होता, ज्यों का त्यों बना रहता है.

(b) किसी द्रव्य में होने वाली पर्यायों का कोई अन्य द्रव्य कारण नहीं होता.  किसी भी द्रव्य की कोई भी पर्याय द्रव्य के बाहर से नहीं आती तथा द्रव्य में से निकल कर बाहर भी नहीं जाती है.  वह अपने द्रव्य में ही विलीन हो जाती है.  

(c) द्रव्य में अनंत गुण एक साथ होने पर भी उनकी पर्यायें अपने सुनिश्चित क्रम में एक के बाद एक ही होती हैं , उनके क्रम में परिवर्तन करना संभव नहीं है .क्योंकि एक समयवर्ती पर्यायें अत्यंत सूक्ष्म होने से लौकिक जनों के ज्ञान का ज्ञेय ही नहीं होतीं, मात्र सर्वज्ञ परमात्मा ही उनको जानने में समर्थ होते हैं . लौकिक  जन तो असंख्य पर्यायों के समुदायरूप स्थूल परिवर्तन को ही जान पाते हैं .

(d)नई पर्याय के उत्पाद से पूर्व पर्याय के व्यय का , पूर्व पर्याय के व्यय से नई पर्याय के उत्पाद का तथा पर्यायों के उत्पाद तथा व्यय रूप प्रवाह में भी द्रव्य का अस्तित्व बना रहने से उसके ध्रुवत्व (शाश्वत स्वभाव ) का ज्ञान होता है .

(e)प्रत्येक द्रव्य की सभी पर्यायें द्रव्य स्वभाव के अनुरूप होते हुए भी उसके आधीन न होकर स्वतंत्रतया परिणमित होती हैं , इसीलिए द्रव्य स्वभाव पूर्ण, शाश्वत एवं शुद्ध होने पर भी पर्यायें अपूर्ण , क्षणिक एवं अशुद्ध भी होती  हैं . जैसे ज्ञान स्वभाव पूर्ण होने पर भी अल्पज्ञता , निराकुल सुख स्वभाव होने पर भी दुःख का अनुभव , पर द्रव्यों से भिन्न होने पर भी रागादि विकार का होना आदि .

(f)इसीप्रकार परद्रव्यों का संयोग एवं सम्बन्ध होने पर उनके लक्ष्य से होने वाली पर्यायें भी अपनी स्वतंत्र योग्यता से ही उत्पन्न होती हैं , उन परद्रव्यों के कारण नहीं . जैसे एक शिक्षक द्वारा पढ़ाये गए अनेक छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि भिन्न होती है , अनुकूल या प्रतिकूल कहे जाने वाले संयोगों में व्यक्तियों की प्रतिक्रियाएं सदैव समान नहीं होतीं, उनके राग -द्वेष या कषाय रूप परिणाम सदैव एक से नहीं होते .

इससे यह बात सिद्ध होती है कि पर्यायें सदैव स्वद्रव्य एवं संयोग में रहे हुए परद्रव्यों के स्वभाव से निरपेक्ष (अप्रभावित ) अपनी उस समय की स्वयोग्यता के अनुसार ही स्वतंत्रतया उत्पन्न होती हैं , किसी के आधीन नहीं .

उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचन से यह भी सुस्पष्ट है कि प्रत्येक द्रव्य सत्स्वभावी (अस्तित्ववान ) है , और जो सत् होता है वह अनादि -अनंत सत्तास्वरूप , अनंत गुणमय एवं प्रतिसमय नई -नई अवस्थाओं को धारण करने से स्वतंत्र परिणमन स्वभाव (पर्याय स्वभाव )वाला होता है . इस प्रकार विश्व का प्रत्येक द्रव्य एवं उसके अनंत गुण- धर्म शाश्वत सत् तथा उसकी प्रत्येक पर्याय अपने तात्कालिक सुनिश्चित स्वरुप सहित अपने सुनिश्चित समय की सत् होती है .

(4) आत्मा का स्वभाव एवं  विभाव परिणमन —किसी भी द्रव्य का अपने सहज शुद्ध स्वभाव के अनुरूप परिणमन स्वभाव परिणमन है और स्वभाव से विरुद्ध परिणमन विभाव परिणमन है . प्रत्येक द्रव्य शाश्वत ध्रुव स्वभाव (गुण – शक्तियों रूप ) की अपेक्षा सदैव शुद्ध ही होता है , मात्र पर्याय स्वभाव में ही (कार्य रूप परिणमन में ही ) स्वभाव या विभाव परिणमन के भेद किये जाते हैं .जाति अपेक्षा छह द्रव्यमयी इस लोक में जीव तथा जड़ पुद्गल द्रव्य (दृश्यमान पदार्थ समुदाय ) में स्वभाव परिणमन के साथ ही विभाव परिणमन भी पाया जाता है . स्वभाव एवं विभाव परिणमन को ही क्रमशः शुद्ध एवं अशुद्ध परिणमन भी कहा जाता है.

यह आत्मा का विभाव या अशुद्ध परिणमन ही अनादिकालीन संसार परिभ्रमण एवं दुखों का एकमात्र कारण है तथा स्वभाव या शुद्ध परिणमन ही दुखों से मुक्ति का या सुख प्राप्ति का एकमात्र उपाय है . स्वभाव परिणमन में पर पदार्थों की अपेक्षा नहीं होती , वह सदा स्वाधीन ही होता है और विभाव परिणमन सदैव पराधीन ही होता है . विभाव परिणमन आत्मा के कुछ ही गुणों में होता है , शेष अनंत गुणों का परिणमन सदैव शुद्ध स्वभाव रूप ही होता है .

(5)स्वभाव एवं विभाव परिणमन का कारण एवं स्वरुप —जब तक कोई द्रव्य एकरूप या अकेला होता है वह शुद्ध होता है और उसका परिणमन रूप कार्य भी . जब एक द्रव्य दूसरे द्रव्य के साथ मिलता या जुड़ता है तो वह अशुद्ध हो जाता है . दो पदार्थों का आपस में मिलना अर्थात अशुद्ध होना . जैसे शुद्ध स्वर्ण में अन्य धातु का अभाव होने से वह शुद्ध ही होता है तथा उसकी चमक , घनत्व . लचीलापन आदि भी शुद्ध स्वर्ण के स्वभावानुसार ही होते हैं परन्तु वही स्वर्ण जब चांदी -ताम्बा आदि के साथ मिलाया जाता है तो उसकी शुद्ध स्वर्ण वाली चमक, घनत्व , लचीलापन आदि बदल जाते हैं . यह बदलाव युक्त दशा ही स्वर्ण का अशुद्ध परिणमन है . अथवा जैसे स्वच्छ वस्त्र व मैले वस्त्र की दशाओं में दिखाई देने वाला परिवर्तन भी इसीप्रकार समझा जा सकता है . अतः शुद्धता स्वाभाविक एवं अशुद्धता बाह्य पदार्थों के लक्ष्य से या संयोग से होती है .

इसीप्रकार आत्मा जब तक अकेला (आत्मोन्मुख ज्ञान सहित ) है और उसका ज्ञान अपने आत्मा को ही आश्रय बुद्धिपूर्वक अनुभव करने में लगा है तो उसका अपनत्व -ममत्व -स्वामित्व सब कुछ आत्मा में ही स्थापित होने से वह आत्मा द्रव्य रूप से तो शुद्ध है ही , उसका परिणमन भी शुद्ध ही होता है तथा वह आत्मा स्वयं के ज्ञान व अनुभव से उत्पन्न आत्मिक सुख का अनुभव करने से स्वयं को परिपूर्ण ,शुद्ध व स्वतंत्र अनुभव करता हुआ सुखी ही होता है ; परन्तु जब वही आत्मा अपने ज्ञान द्वारा अपने से भिन्न शरीर एवं पांचो इन्द्रियों एवं मन के द्वारा ग्रहण किये जाने वाले पदार्थों से इष्ट -अनिष्ट या आश्रय बुद्धिपूर्वक जुड़ता है अर्थात उनको जानने में , उनका अनुभव करने में रुक जाता है तो यही आत्मा का अशुद्ध परिणमन है . क्योंकि आत्मा अमूर्त होने से जड़ दृश्यमान पदार्थों से मिल नहीं सकता , अतः जब आत्मा पर पदार्थों को जानने में अटकता है तो यही ज्ञान का अर्थात आत्मा का पर पदार्थों से मिलने या जुड़ने जैसा ही है , इसीकारण आत्मा में मोह -राग -द्वेष रूप विभाव (विकार ) या अशुद्ध परिणमन हो जाता है जो आत्मा को दुःख का कारण बनता है .

निष्कर्षतः यह कह सकते है कि जैसा आत्मा परिपूर्ण, शुद्ध, ज्ञान -आनंदमय तत्त्व है वैसा ही जब निज आत्मा को लक्ष्य करती हुई पर्याय अपने को अनुभव करती है तो वह शुद्ध पर्याय है , यह शुद्ध परिणमन है . इसके विपरीत स्वयमेव पर पदार्थों को अपना लक्ष्य बनाती हुई पर्याय राग -द्वेष रूप होती हुई स्वयं को अशुद्ध, अपूर्ण, आकुलित (दुखी ) अनुभव करती है तो वह अशुद्ध परिणमन है .

(6) विभाव परिणमन का आधार –पर्यायगत स्वभाव —आत्मा का स्वभाव जानना -देखना है चाहे वह स्वद्रव्य आत्मा हो अथवा चेतन -अचेतन परद्रव्य हो . अतः पर को जानना मात्र विभाव परिणमन नहीं है , परन्तु इष्ट -अनिष्ट बुद्धिपूर्वक पर को जानने को उत्सुक होना , पर को जानने में अटक जाना अथवा पर को जानते रहना –यह विभाव परिणमन है .इसे ही आत्मा का ज्ञेयार्थ परिणमन अथवा ज्ञेयलुब्ध परिणति भी कहते हैं . इस दशा में आत्मा में उन ज्ञेयों के प्रति इष्ट -अनिष्ट बुद्धि अथवा राग -द्वेष तथा फलतः कर्त्ता -भोक्ता का भाव एवं मंद -तीव्र आकुलता रूप सुख -दुःख उत्पन्न हो जाते हैं , यही आत्मा की अशुद्धता है .

 वास्तव में तो वस्तु में ऐसा कोई गुण ही नहीं होता कि जो विभाव परिणमन के स्वभाव वाला हो , ठीक उसी प्रकार जैसे कि शरीर में कोई भी अवयव रोगोत्पत्ति के स्वभाव वाला नहीं होता . अतः आत्मा या जड़ पदार्थों में भी विभाव परिणमन के स्वभाव वाला कोई गुण नहीं होता .यह विभावरूप परिणमन आत्मा एवं जड़ पुद्गल द्रव्य का पर्यायगत (अवस्थागत ) स्वभाव है . द्रव्य एवं उसके गुण तो सदैव शुद्ध ही होते हैं परन्तु परिणमन स्वभाव में यह स्वतन्त्रता है कि वह शुद्ध या अशुद्ध पर्याय रूप से स्वतः परिणमित हो सकता है . यदि द्रव्य की पर्याय में इस प्रकार की परिणमन की स्वतंत्र योग्यता एवं शक्ति ही न हो तो यह विभाव परिणमन होगा ही  कैसे ? अर्थात नहीं होगा क्योंकि संयोग तो द्रव्य में -उसके स्वभाव में प्रवेश नहीं कर सकते, अतः वे द्रव्य में कुछ भी फेरफार करने में असमर्थ रहते हैं . जैसे शुद्ध स्वर्ण में चांदी -ताम्बा आदि मिलाने पर उसकी अशुद्धता बाहर से दिखाई देने पर भी स्वर्ण परमाणु तो चांदी -ताम्बा आदि विजातीय पदार्थों से अप्रभावित -शुद्ध ही रहता है तथा जैसे वस्त्र का मैल से संयोग होने पर वस्त्र मैला -गंदा दिखाई देता है परन्तु यह मैल वस्त्र के भीतर प्रवेश नहीं पाता, ऊपर -ऊपर ही रहता है , वस्त्र के रेशे तो उस मैल से अप्रभावित ही रहते हैं . इस प्रकार द्रव्य की अशुद्धता उस पर्याय तक ही सीमित रहती है , द्रव्य स्वभाव संयोगजनित  अशुद्धता से अप्रभावित शुद्ध ही रहता है .

अतः आत्मा में होने वाले रागादि विकार आकुलता आदि रूप अशुद्ध परिणमन भी अपनी पर्याय तक ही सीमित रहते हैं , आत्मा के त्रिकाली शुद्ध स्वभाव को किंचित भी स्पर्श नहीं करते . इस प्रकार अशुद्धता आत्मा के शुद्ध स्वभाव से बाहर ही रहती है . अतः जब विकारों -दुखों से मुक्ति की बात आती है तो उसका प्रयत्न भी स्वयं में अपने शुद्ध -शाश्वत स्वभाव के आश्रय से ही किया जाता है , संयोगों में नहीं . संयोगों को विभाव परिणमन का कारण माना जाता है तो यह भ्रम ही है , यथार्थ नहीं .

आत्मा के द्रव्य-गुण-पर्याय स्वभाव को जानने से लाभ :—

(1) द्रव्य के सत्स्वभाव का ज्ञान होने से आत्मा की अमरता का विश्वास उत्पन्न होकर मृत्यु के भय का नाश हो जाता है. 

  (2)  सत्स्वभाव का ज्ञान हो जाने से पदार्थों का स्वतंत्र अनादि-अनंत सहज अस्तित्व सिद्ध होता है, इससे किसी ईश्वर द्वारा विश्व की रचना, रक्षण एवं विनाश की भ्रमपूर्ण मान्यता समाप्त हो जाती है. इसप्रकार आत्मा भी बना-बनाया स्वतंत्र, परिपूर्ण एवं शुद्ध अनंत गुणमय द्रव्य सिद्ध होता है, फलतः ईश्वर द्वारा आत्मा  की रचना, रक्षण एवं विनाश, दंड एवं पुरस्कार आदि की विपरीत मान्यता समाप्त हो कर पूर्ण स्वतंत्र एवं निरपेक्ष कर्म एवं कर्मफल की नैसर्गिक व्यवस्था का विश्वास उत्पन्न होता है. इससे व्यक्ति परावलम्बन से मुक्त हो कर लौकिक एवं पारलौकिक दुखों से मुक्ति हेतु आत्म सुधार एवं विकास की ओर उन्मुख होता है. इससे न केवल आत्मोन्नयन का मार्ग प्रशस्त होता है बल्कि लौकिक व्यवस्था भी सुन्दर बन जाती है.

(3) आत्मा प्रतिसमय अपनी सहज योग्यता से ही अपनी-अपनी पर्याय रूप से परिणमनशील अनंत सामान्य-विशेष गुणों से परिपूर्ण अनंत शक्तिमय द्रव्य है. अतः अपनी अनंत शक्तिमयता एवं सक्रियता का विश्वास होने से स्वयं में कल्पित रिक्तता या दुर्बलता एवं निष्क्रियता की भ्रान्ति का अभाव होकर परिपूर्ण और सक्रिय द्रव्य होने का आत्मविश्वास जागृत होता है.

(4) प्रत्येक पर्याय क्षणिक एक समयवर्ती, सूक्ष्म और स्वतंत्र होने से लौकिक जनों के ज्ञान का विषय नहीं बनती, अतः उसके स्वरुप एवं क्रम में परिवर्तन असंभव होने से स्व एवं पर द्रव्यों की पर्यायों में परिवर्तन का आग्रह और तज्जनित आकुलता भी समाप्त हो जाती है.

(5) द्रव्यों के शाश्वत सत्स्वभाव, उनमें रहने वाले स्वभावभूत सहभावी गुणों एवं क्रमभावी पर्यायों के यथार्थ स्वरुप का ज्ञान हो जाने पर, दो भिन्न द्रव्यों में किंचित भी आदान-प्रदान की संभावना न रहने से अपने कार्यों के लिए परद्रव्यों की तरफ देखने की या परावलम्बन की आवश्यकता ही नहीं रहती. अतः परद्रव्य में कुछ करने सम्बन्धी कर्तृत्व के अहंकार एवं परद्रव्य के द्वारा आत्मा में (स्वयं में ) कुछ (इष्ट-अनिष्ट ) करने सम्बन्धी लोभ एवं भय का अभाव हो जाता है.

(6) परिणमनशील वस्तु स्वभाव का ज्ञान होने पर वर्तमान क्षणिक दुखपूर्ण एवं विकारी अवस्था से मुक्ति का विश्वास पैदा होता है.

(7) पर के आश्रय से आत्मा में विकार पैदा होता है तथा स्वाश्रय से निर्विकारता. अतः पर द्रव्यों का आश्रय छोड़ कर त्रिकाली अनंत गुणात्मक निज चैतन्य आत्म द्रव्य का आश्रय लेने से विकार का अभाव होकर आत्मिक निराकुल सुख और निर्विकारी दशा प्रगट हो सकती है ऐसा विश्वास उत्पन्न होता है. फलतः तत्सम्बन्धी प्रयत्न एवं पुरुषार्थ भी प्रारम्भ होता है.

(8) वीतरागी सर्वज्ञ परमात्माओं के निर्मल ज्ञान में ही ऐसे परम सत्य का उद्घाटन संभव है. विलक्षण एवं शाश्वत वस्तु स्वभाव का ज्ञान होने से सर्वज्ञ परमात्मा की महिमा आती है. सर्वज्ञता निज आत्म स्वभाव के आश्रय से ही उत्पन्न होती है अतः निज ज्ञानानन्दमयी आत्म स्वभाव की भी महिमा आती है. फलतः जीव का उपयोग (दृष्टि) पर द्रव्यों से हटा कर स्व में स्थिर होने / करने की प्रेरणा मिलती है, जो कि जगत के दुखों से छूटने का व मुक्ति (पूर्णता ) प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है.

अध्याय —3

आत्मा के सामान्य स्वभाव (गुण) —-

आत्मा में पाए जाने वाले सामान्य एवं विशेष गुण :—पूर्वोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रत्येक द्रव्य के समान ही आत्मा में भी अनंत गुण पाए जाते हैं और उन गुणों का परिणमन रूप कार्य भी निरंतर उनमे  होता रहता है .उन कार्यों से ही द्रव्य के शक्तिरूप गुणों का व द्रव्य के अस्तित्व का ज्ञान होता है .

ऊपर द्रव्य के सामान्य स्वभाव का विवेचन किया गया है , परन्तु द्रव्य में सामान्य स्वभाव (गुण) के साथ ही विशेष स्वभाव भी पाए जाते हैं . सामान्य गुणों से द्रव्य  के अस्तित्व की सिद्धि होती है और विशेष गुणों से द्रव्यों में भेद (अंतर ) का ज्ञान होता है . यदि विशेष गुण न हों तो द्रव्यों की पहिचान ही नहीं हो सकेगी .

द्रव्यों के जो छह वर्गीकरण हैं उनका आधार उनके विशेष गुण ही हैं .

सामान्य अर्थात साधारण, समान धर्म -गुण -शक्ति जो सभी में एक जैसा हो,और विशेष अर्थात शेष -अन्य से भिन्न,  जो सब में समान न हो .

सामान्य गुण :–जिसमे समानता का भाव पाया जावे उसे सामान्य कहते हैं .अतः इस परिभाषा के अनुसार वे गुण अथवा शक्तियां जो सभी द्रव्यों में सदा पायी जाती हैं उन्हें सामान्य गुण कहते हैं .

प्रत्येक द्रव्य में सामान्य गुण अनंत होते हैं किन्तु उनमें मुख्य गुण छह हैं :–(1)अस्तित्व ,(2)वस्तुत्व , (3) द्रव्यत्व , (4)प्रमेयत्व , (5) अगुरुलघुत्व , (6) प्रदेशत्व .

इन गुणों को समझने का हमारा प्रयोजन मात्र इनको समझना ही नहीं है बल्कि अन्य द्रव्यों से भिन्न अपने आत्मा के स्वरुप को जानकरअपने आत्म स्वरुप की प्राप्ति (आत्मिक आनंद की अनुभूति ) करना -यही हमारा एक मात्र प्रयोजन है .

(1) अस्तित्व गुण:—जिस गुण के कारण द्रव्य का कभी नाश नहीं होता अर्थात द्रव्य सदैव स्थित (विद्यमान ) रहता है उसे अस्तित्व गुण कहते हैं . पूर्वोक्त आत्मा का सत्स्वभाव वह अस्तित्व गुण ही है .

प्रत्येक द्रव्य में अस्तित्व गुण होने से यह विश्व और उसके घटक द्रव्य सभी अनादि -अनंत हैं. अविद्यमान द्रव्य की उत्पत्ति व विद्यमान द्रव्य के नाश का अभाव हो जाने से विश्व के सभी द्रव्यों की संख्या सदैव समान -अपरिवर्तित  ही रहती है . इस गुण के होने से पदार्थ सदा ही अपने अस्तित्व के लिए स्वयं समर्थ एवं स्वाधीन होता है , साथ ही द्रव्यों को अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य द्रव्य के सहयोग या कृपा की आकांक्षा एवं अनिष्ट के भय की संभावना समाप्त हो जाती है . प्रत्येक पदार्थ का स्वतंत्र एवं निरपेक्ष अस्तित्व होने से द्रव्यों के बीच में अस्तित्व का संक्रमण नहीं होता अर्थात एक जड़ दूसरे जड़ अथवा चेतन रूप कभी भी नहीं होता . सबसे बड़ा लाभ इस गुण को जानने से इस आत्मा का होता है कि उसका स्वयं एवं अन्य के प्रति रक्षा , नाश एवं हस्तक्षेप का मिथ्या भय एवं अहंकार सदा किए लिए समाप्त हो जाता है और इस प्रकार आत्मा परलक्षी प्रवृत्ति से मुक्त होकर आत्म केंद्रित होता हुआ स्वाधीन -शांत निराकुल जीवन का आनंद लेने के लिए प्रेरित एवं उद्यमी होता है .

(2) वस्तुत्व  गुण:–जिस शक्ति के कारण द्रव्य में अर्थक्रियाकारित्व हो अर्थात प्रयोजनभूत कार्य निरंतर होता हो उसे वस्तुत्व गुण कहते हैं . इस गुण युक्त होने से ही पदार्थों को वस्तु कहा जाता है .

इस गुण के होने से प्रत्येक पदार्थ अपने योग्य क्रिया –जिससे कि वह अपने रूप सदा बना रहे, सदा जाना जाता रहे ,स्वयं अपने स्वभाव से ही करता रहता है . जैसे आत्मा सदैव अपने जानने -देखने रूप क्रिया करता रहता है , जड़ सदैव स्पर्श -ऱस -गंध -वर्ण (रूप -रंग ) रूप ही परिणमित होता रहता है.  वस्तुत्व गुण के कारण पदार्थ के प्रत्येक गुण की अपनी -अपनी स्वभावानुरूप क्रिया सहज ही होती रहती है, अन्य रूप नहीं . जैसे आत्मा का ज्ञान गुण जानने का ही कार्य करता है , जैसे शक्कर अपने विशिष्ट मिठास रूप से ही परिणमित होती है .इस प्रकार प्रत्येक गुण अन्य गुणों से निरपेक्ष रह कर अपनी -अपनी क्रिया करता रहता है .

इस तरह वस्तुत्व गुण के ज्ञान से यह भ्रान्ति समाप्त हो जाती है कि (1)जानने से व्यक्ति को राग एवं दुःख अथवा सुख होता है , (2) दो भिन्न द्रव्यों या गुणों में पारस्परिक क्रिया होती है या होनी चाहिए . इससे आत्मा की  विभिन्न कार्यों में पारस्परिक समन्वय -संगति अथवा तालमेल के सम्बन्ध में आशंका या आकुलता एवं इसप्रकार का आग्रह समाप्त हो जाता है एवं उसमे प्रति समय परम धैर्य प्रवर्तित होता है .

(3) द्रव्यत्व  गुण :—जिस शक्ति के कारण द्रव्य की पर्याय प्रतिसमय परिणमित होती (बदलती ) रहती है उसे द्रव्यत्व गुण कहते हैं . इस गुण के कारण ही पदार्थ को द्रव्य कहा जाता है .

इस गुण के कारण प्रत्येक द्रव्य में अनंत सामान्य -विशेष गुणों का परिणमन रूप कार्य सहजपने अनवरत चलता रहता है . यदि  विकारी परिणमन है (अज्ञानरूप या आकुलतारूप ) तो उसका  कारण भी उस द्रव्य का अपना सहज परिणमन स्वभाव ही होता है . इस प्रकार स्वयं परिणमनशील होने से एक द्रव्य के कार्यों में दूसरे द्रव्य के सहयोग एवं हस्तक्षेप की संभावना ही समाप्त हो जाती है क्योंकि प्रत्येक द्रव्य जब स्वयं अपने पर्याय रूप से परिणमनशील है तो उसके पास दूसरे द्रव्य की ओर देखने तक का भी अवकाश नहीं होता . यदि कोई द्रव्य अपना कार्य रोक कर दूसरे का कार्य करे तो पहले द्रव्य के अपने कार्य का अभाव होने से उसके नाश का प्रसंग आता है , साथ ही दूसरे द्रव्य में शक्ति का अभाव मानने पर उसे अन्य द्रव्य द्वारा शक्ति -सहयोग दिया जाना संभव ही नहीं होता तथा शक्तिहीन द्रव्य का अस्तित्व निष्क्रिय होने से लोक में किस प्रकार संभव है ?

इस प्रकार द्रव्यत्व गुण को जानने पर पराधीनता का अंत होकर दो भिन्न द्रव्यों में परस्पर कार्य हेतु सहयोग , हस्तक्षेप आदि की संभावना समाप्त हो जाती है . जगत के विभिन्न पदार्थों में होने वाली विभिन्न अवस्थाओं के प्रति इष्ट  -अनिष्ट , क्या -क्यों -कैसे -किसके द्वारा -कहाँ आदि के प्रश्न उत्पन्न ही नहीं होते क्योंकि ये सब पदार्थों का द्रव्यत्व गुण के कारण होने वाला उसका अत्यंत स्वतंत्र और पर -निरपेक्ष परिणमन है . यहां तक कि अपने में होने वाले मोह -राग -द्वेषरूप , ज्ञान -दर्शन रूप , शुभाशुभ भावरूप परिणामों के प्रति भी ज्ञानियों को उदासीन भाव परिणमित होता है और उनकी दृष्टि उन पर्यायों से भी पार अपने सहज अपरिणामी अनंत गुणात्मक ध्रुव स्वभाव पर टिकने लगती है तथा जीवन में परम शान्ति व  निराकुलता का प्रादुर्भाव हो जाता है जिसकी पूर्णता मुक्ति के रूप में होती है .

(4) प्रमेयत्व गुण:–जिस शक्ति के कारण द्रव्य किसी न किसी के ज्ञान का विषय अवश्य हो उसे प्रमेयत्व गुण कहते हैं .

इस विश्व में चेतन एवं अचेतन दो प्रकार के पदार्थ अस्तित्व में हैं. चेतन  वस्तु -आत्मा का कार्य -स्वभाव जानना -देखना है तथा चेतन -अचेतन सभी पदार्थ उसके ज्ञेय होते हैं . अतः जब आत्मा में जानने का गुण हैं तो सभी  पदार्थों में जानने में आने का -प्रमेय होने का गुण अवश्य ही होना चाहिए .यदि पदार्थ में जानने में आने का -ज्ञेय होने का गुण न हो तो उसे किस प्रकार जाना जा सकता है? साथ ही लोक के सभी पदार्थ सूक्ष्म -स्थूल हों या निकटवर्ती -दूरवर्ती हों अथवा भूत -भविष्य काल सम्बंधित हों , वे अपने -अपने स्थान व काल  में होने वाले जीवों के ज्ञान के ज्ञेय तो बनते ही हैं और सर्वज्ञ का अस्तित्व भी विभिन्न दर्शनों में स्वीकार किया ही गया है , इससे सिद्ध होता है कि सभी पदार्थों में जानने में आने का स्वभाव अर्थात प्रमेयत्व गुण होता है . सभी पदार्थों में पाया जाने वाला यह सामान्य गुण है .

प्रत्येक पदार्थ द्रव्य -गुण -पर्यायमय है अतः द्रव्य में प्रमेयत्व गुण होने से वह द्रव्य , उसके अनंत सामान्य -विशेष गुण एवं उसकी त्रिकालवर्ती समस्त गुणों की अनंतानंत पर्यायें ज्ञान का ज्ञेय बन जाती हैं.  इस विश्व में ज्ञान की हीनाधिकता होने से कोई ऐसा व्यक्ति भी होना चाहिए कि जिसका ज्ञान पूर्णता को प्राप्त होने से लोक -अलोक के सर्व पदार्थों को उनके अनंत गुण -पर्यायों सहित एकसाथ जानने की सामर्थ्य वाला हो . इस प्रकार आत्मा के सर्वज्ञ स्वभाव एवं लोक में किसी आत्मा के परमात्म स्वरुप सर्वज्ञ पद को प्राप्त होने की सिद्धि हो जाती है .

हम जानते हैं कि ज्ञान केवल जानता है अतः ऐसे पूर्णज्ञ -सर्वज्ञ परमात्मा के भी मात्र ज्ञायकपने की सिद्धि होती है , कर्त्तापने की नहीं . अतः परमात्मा (ईश्वर ) द्वारा सृष्टि की रचना एवं संचालन की मिथ्या भ्रान्ति का परिहार हो जाने से पराधीनता का अंत हो जाता है तथा परम स्वाधीनता का जन्म होता है . इसका फल यह भी होता है कि अब परमात्मा की भक्ति -पूजा में लौकिक आकांक्षाओं (इच्छाओं) की पूर्ति का अभिप्राय न होकर भगवान के गुणों के प्रति बहुमान एवं उन गुणों की स्वयं में उपलब्धि रूप आत्म विकास का भाव प्रमुख हो जाता है .

इस गुण का ज्ञान हो जाने पर व्यक्ति में छिप कर पाप कार्य करने की वृत्ति का भी शमन हो जाता है . वह जान जाता है कि मेरा यह कार्य किसी न किसी के ज्ञान का ज्ञेय तो बनने ही वाला है और उसका फल वर्तमान में भी भोगना पड़ सकता है , और ऐसे उदाहरण तो समाज में यत्र -तत्र दृष्टिगोचर होते ही रहते हैं . अतः व्यक्ति पाप पूर्ण अपराधी जीवन से विरक्त  होकर न्याय युक्त सदाचारी जीवन जीने की ओर सहज ही प्रवृत्त होता है .

(5) अगुरुलघुत्व  गुण:–जिस शक्ति के कारण द्रव्य का द्रव्यत्व सदा बना रहता है अर्थात एक द्रव्य दूसरे द्रव्य रूप नहीं होता , द्रव्य में रहने वाले अनंत गुण बिखर कर अलग-अलग नहीं होते , एक गुण कभी दूसरे गुण रूप नहीं होता , उस शक्ति को अगुरुलघुत्व गुण कहते हैं .

इस परिभाषा से ही स्पष्ट है कि अगुरुलघुत्व गुण के कारण कोई भी द्रव्य कभी भी गुरु अर्थात बड़ा नहीं होता , न ही कभी लघु अर्थात छोटा ही होता है , वह सदा ही अपनी स्वरुप सीमा में रहते हुए वैसा का वैसा बना रहता है .

किसी भी द्रव्य के बड़ा होने की दो स्थितियां हो सकती हैं  (a)एक द्रव्य दूसरे द्रव्य में मिल जाए अथवा (b) एक द्रव्य का गुण निकल कर दूसरे द्रव्य में चला जाये .

इसी प्रकार द्रव्य के छोटा होने की स्थितियां भी निम्न हो सकती हैं –(a) एक द्रव्य के गुण बिखर कर अलग-अलग हो जावें अथवा (b) एक द्रव्य में ही दो या अधिक गुण आपस में मिल कर एक हो जावें .

अगुरुलघुत्व गुण के कारण उक्त गुरु या लघु होने की स्थितियां कभी भी किसी द्रव्य या द्रव्यों में बनती ही नहीं हैं . यदि ऐसा होने लगे तो द्रव्यों के अभाव की स्थिति बनने लगेगी और या तो विश्व का ही नाश हो जावेगा अथवा सारे ही  द्रव्य मिलकर एकमेक एक द्रव्य रूप हो जावेंगे , परन्तु ऐसा इस लोक में होता दिखाई नहीं देता . आधुनिक विज्ञान एवं कई दर्शनों ने भी असत् के उत्पाद एवं सत् के विनाश को स्वीकार नहीं किया है .

इसके साथ ही अज्ञान दशा में अपनी ज्ञानादि गुणों की पर्यायगत सामर्थ्य में हीनाधिकता होने पर व्यक्ति अपने आप को छोटा या बड़ा मानने लगता है तथा मिथ्या कल्पना द्वारा आकुलित होता है. इस भ्रान्ति एवं आकुलता का निवारण इस गुण के यथार्थ ज्ञान से हो जाता है. तथा व्यक्ति अपनी पर्यायों के कारण या संयोगों के कारण स्वयं को श्रेष्ठ या हीन मानने के विकल्पों से मुक्त  होकर अनादि-अनंत शाश्वत स्वभाव रूप अस्तित्व का विश्वास होने से सदैव निराकुल शान्ति का अनुभव करता है . उसकी दृष्टि अपने शाश्वत अनंत गुणात्मक स्वभाव पर केंद्रित हो जाने से गुण -पर्यायों के विकल्पों से भी मुक्त हो जाती है .

(6)प्रदेशत्व गुण:—जिस शक्ति के कारण द्रव्य का कोई न कोई आकार अवश्य होता है उसे प्रदेशत्व गुण कहते हैं .

हम जानते हैं कि प्रत्येक द्रव्य , जिसका अस्तित्व है वह लोक में कहीं न कहीं रहता है , उसके द्वारा घेरा जाने वाला क्षेत्र भी निश्चित होता है और जितना व जैसा क्षेत्र घेरा जाता है वैसा ही उस द्रव्य का आकार भी निश्चित ही होता है . यह किसी एक समय पर द्रव्य के आकार की सुनिश्चितता प्रदेशत्व गुण का कार्य है और प्रदेशत्व गुण के परिणमन के कारण ही द्रव्यों का आकार प्रतिसमय बदलता भी रहता है , ये आकार भिन्न-भिन्न या सदृश भी हो सकते हैं .

जड़ -इन्द्रियगम्य पदार्थों का आकार तो इस जीव को दिखाई देता है परन्तु आत्मा अमूर्त द्रव्य होने से (इन्द्रियों से दिखाई न देने वाला) इसका आकार जगत के जीवों को दिखाई नहीं नहीं देता. साथ ही आत्मा का संसार दशा में सदा ही शरीर के साथ संयोग पाए जाने से शरीर का आकार सदैव ही दृष्टि का विषय बनता रहता है .फलस्वरूप यह भ्रान्ति  उत्पन्न हो जाती है कि शरीर का आकार ही आत्मा का आकार है और शरीर के कारण ही वह आकार है . इसकारण से जब शरीर के आकार में हीनाधिकता होती है तो उसमे रहा हुआ जीव उस आकार मय ही स्वयं को मानता हुआ तीव्र आकुलता से पीड़ित हो जाता है .

जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि शरीर का आकार उसके प्रदेशत्व गुण के कारण से है और आत्मा का आकार आत्मा के अपने प्रदेशत्व गुण के कारण से होता है . इसीलिये जब शरीर का मृत्युपरांत अथवा किसी अन्य कारण से भी विघटन होता है तो भी आत्मा का आकार तो अपने प्रदेशत्व गुण के परिणमन से ही निर्धारित होता है. इसके साथ साथ यह बात भी महत्त्व पूर्ण है कि प्रदेशत्व गुण के परिणमन के कारण आकार परिवर्तन होने पर भी आत्म द्रव्य तो जैसा का जैसा बना रहता है , उसके असंख्य प्रदेशी क्षेत्र में कोई परिवर्तन नहीं होता .

इस प्रकार प्रदेशत्व गुण का यथार्थ ज्ञान होने पर आत्मा अपने आकारों में होने वाले परिवर्तनों के प्रति उदासीन -अप्रभावित होने लगता है , वह अपने आकारों के प्रति ममत्त्व से मुक्त होकर निज आत्मतत्त्व के प्रति ममत्त्वशील होकर जगत की आकुलता से मुक्त अनुभव करने लगता है .

अध्याय —4

 आत्मा के विशेष स्वभाव-गुण

 सामान्य स्वभाव के विपरीत विशेष स्वभाव प्रत्येक द्रव्य को शेष अन्य द्रव्यों से अलग करते हैं . विशेष स्वभाव केवल अपने -अपने द्रव्यों में ही पाए जाते हैं , जैसे आत्मा में ज्ञान-दर्शन , सुख-वीर्य आदि स्वभाव , जड़ पदार्थों में इन्द्रिय-ग्राह्यता , स्पर्श-रस-गंध-वर्ण आदि .

द्रव्यों के वर्गीकरण का आधार उनमें पाए जाने वाले विशेष स्वभाव -गुण ही होते हैं .इन विशेष स्वभावों में से ही कोई स्वभाव द्रव्य का लक्षण कहा जाता है क्योंकि इस विशेष स्वभाव का कार्य स्पष्ट दृष्टिगोचर होने से वह अपने द्रव्य की पहिचान का माध्यम बनता है और इस प्रकार लक्षण रूप विशेष स्वभाव द्वारा ही लक्ष्य रूप द्रव्य की प्रसिद्धि-पहिचान होती है. जैसे आत्मा के विशेष स्वभाव ज्ञान-दर्शन चारित्र-सुख आदि होने पर भी आत्मा का लक्षण ज्ञान कहा जाता है क्योंकि ज्ञान आत्मा का सर्व प्रसिद्ध स्वभाव है . ज्ञान के द्वारा आत्मा अन्य पदार्थों को तो जानता ही है परन्तु ज्ञान (जानने ) रूप क्रिया के द्वारा ही स्वयं आत्मा भी जानने में आता है .जानने रूप कार्य के द्वारा ही किसी पदार्थ में आत्मा के अस्तित्व का निर्णय किया जाता है . यदि किसी में जानने रूप कार्य का अभाव हो जाता है तो उस (व्यक्ति या प्राणी )को मुर्दा-जड़ घोषित कर दिया जाता है . जानने की इस सामर्थ्य के कारण ही आत्मा को चेतन भी कहा जाता है .

इसी प्रकार सुख भी जीव का विशेष स्वभाव है तथा इसका भी कार्य जीवों के अनुभूतिजनित हर्ष-विषाद , सुख-दुःख आदि के रूप में देखा जाता है . अतः केवल आत्मा में ही इसका सद्भाव होने से तथा अचेतन पदार्थों में सुख-दुःख का अभाव होने से सुख को भी जीव का लक्षण कहा गया है .परन्तु सुख-दुःख ज्ञान के साथ होने से , ज्ञान पूर्वक होने से ज्ञान ही आत्मा का मुख्य लक्षण है .

सामान्य गुणों -स्वभावों के समान ही विशेष गुण-स्वभाव भी प्रत्येक द्रव्य में अनंत होते हैं , अतः आत्मा में भी अनंत विशेष गुण पाए जाते हैं .

आत्मा के स्वरुप को समझने के लिए आत्मा के विशेष गुणों का यथार्थ ज्ञान अत्यावश्यक है . उन में से मुख्य-मुख्य गुणों का विवेचन आगे किया जा रहा है :–

(1) आत्मा का ज्ञान स्वभाव (ज्ञान गुण) :–ज्ञान करना अर्थात जानना . ज्ञान गुण अर्थात जानने की शक्ति -सामर्थ्य-स्वभाव. ज्ञान आत्मा का लक्षण है क्योंकि यह आत्मा का असाधारण स्वभाव है. जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया गया है –आत्मा की प्रत्येक शक्ति या स्वभाव की सामर्थ्य अनंत है, अतः ज्ञान गुण भी स्वभावतः जगत के सर्व ही पदार्थों को उनके सर्व गुणों एवं भूत -वर्तमान- भविष्य कालीन समस्त पर्यायों -अवस्थाओं सहित एक साथ जानने के स्वभाव / सामर्थ्य वाला है , इसीलिये आत्मज्ञानी संतों द्वारा इसे आत्मा की अचिन्त्य चिन्मात्र शक्ति भी कहा गया है .

ज्ञान से ही पदार्थों के अस्तित्व की सिद्धि :–विविध पदार्थों का अस्तित्व एवं प्रत्येक पदार्थ की अनेकरूपता (अनन्त गुण-पर्यायमयता ) की सिद्धि ज्ञान की अनेकरूपता से ही होती है . इसप्रकार पदार्थों के अस्तित्व का आधार ज्ञान ही है, यदि पदार्थों का ज्ञान न हो तो वे पदार्थ भी न हों .

जब ज्ञान में पदार्थों का अस्तित्व एवं उनका स्वभाव जानने में आता है तो ही उस पदार्थ का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है . आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों का अस्तित्व उन उपकरणों से सम्बंधित सिद्धांत-तकनीकी एवं पदार्थों के गुण-स्वभाव के ज्ञान का ही प्रतिफल है , अथवा जैसे घर में रखे हुए परन्तु ज्ञान में विस्मृत पदार्थ का अस्तित्व स्वीकार नहीं किया जाता तथा स्मृति में आने पर उसका ही अस्तित्व स्वीकृत हो जाता है .

आत्मा के इस ज्ञान गुण की विशेषताएं निम्न प्रकार हैं :–

 (1)  ज्ञान विश्व के समस्त सूक्ष्म-स्थूल , दूरवर्ती-निकटवर्ती , तीनों लोकवर्ती समस्त पदार्थों को एवं उनकी त्रिकालवर्ती समस्त पर्यायों (अवस्थाओं )को एकसाथ जानने के स्वभाव -सामर्थ्य वाला है .

(2) आत्मा पदार्थों को अपने ज्ञान से जानता भी है और स्वयं भी अपने ज्ञान से जानने में भी आता है अतः ज्ञान स्वभावतः स्व-पर प्रकाशक है .

(3) अल्पज्ञ सांसारिक दशा में आत्मा से भिन्न बाह्य ज्ञेयों को जानने में शरीर के अवयवभूत इन्द्रियाँ एवं मन निमित्त होते हैं परन्तु आत्मा को जानने में आत्मोन्मुख ज्ञान स्वयं समर्थ होता है .स्व ( निज आत्मा ) को जानने में इन्द्रियों की या मन की निमित्तता / सक्रियता की आवश्यकता नहीं होती .

(4) जानने की प्रक्रिया में ज्ञान कभी आत्मा से बाहर नहीं जाता और ज्ञेय पदार्थ भी ज्ञान (आत्मा ) में आते नहीं हैं . ठीक वैसे ही जैसे नेत्र अपने स्थान पर रह कर ही पदार्थ को देखते हैं तथा पदार्थ भी नेत्रों में नहीं आते .

(5) ज्ञान ज्ञेयों से निरपेक्ष (अप्रभावित ) रह कर उनको जानता है अर्थात ज्ञेय दृश्य हों या अदृश्य , इससे ज्ञान की जानने की शक्ति अप्रभावित रहती है .हमारे ज्ञान में चलने वाले रात-दिन के विकल्प एवं पुरानी स्मृतियाँ , घर-परिवार , कार्यालय -व्यवसाय आदि सम्बन्धी विचार एवं आकृतियां , रात्रि में गहरी नींद में दिखाई देने वाले स्वप्नों के विविध दृश्य एवं अनुभव , ये सब बाह्य पदार्थों के प्रत्यक्ष संयोग के बिना ही होते हैं ; जो यह सिद्ध करते हैं कि ज्ञान के जानने रूप कार्य के लिए बाह्य पदार्थों (ज्ञेयों ) का निकट संयोग आवश्यक नहीं है . इससे ज्ञान की ज्ञेय निरपेक्षता स्वतः सिद्ध हो जाती है .

(6) जिस प्रकार सम्मुख रखे पदार्थ दर्पण में सहज ही प्रतिबिंबित होते हैं , दर्पण उनसे सदा अप्रभावित ही रहता है ; उसी प्रकार ज्ञान में भी ज्ञेयों के आकार बनते हैं . अंतर इतना है कि दर्पण में प्रतिबिंबित आकारों को दर्पण नहीं जानता , जबकि ज्ञान अपने में प्रतिबिंबित आकारों को जानता है और इसे ही ज्ञेयों का जानना कहा जाता है .

(7) ज्ञान में बनने वाले ज्ञेयों के आकार वास्तव में तो ज्ञान के ही आकार हैं क्योंकि ज्ञान में ज्ञेयों का प्रवेश असंभव है , अतः ज्ञान वास्तव में तो अपने में बने ज्ञेय सदृश अपने आकारों को ही जानता हुआ होने से स्वयं को ही जानता है अर्थात ज्ञान ज्ञान को ही जानता है . हाँ ! उसी समय ज्ञान में बने उन आकारों के सदृश आकार वाले ज्ञेय (अन्य ) पदार्थ ज्ञान के बाहर विद्यमान होने से ज्ञान अन्य पदार्थों को जानता है ऐसा भी स्वीकार किया जाता है . यही ज्ञान की प्रामाणिकता भी है .

जिस प्रकार सरोवर के शांत जल में उसके किनारों पर स्थित वृक्ष , मकान आदि या सूर्य-चन्द्रमा आदि के आकार (प्रतिबिम्ब ) जल के ऐसे स्वभाववश ही बनते हैं . उन आकारों में सूर्य -चन्द्रमा , वृक्षादि का किंचित भी योगदान नहीं होता, वे तो जल में बने अपने आकारों से भी सर्वथा अनभिज्ञ एवं निरपेक्ष ही अपने स्थानों पर विद्यमान रहते हैं . वह सरोवर का जल भी उन पदार्थों से सर्वथा निरपेक्ष सरोवर की सीमा में ही विद्यमान रहता है . उसी प्रकार ज्ञान भी अपने आत्मा की सीमा में रहता हुआ ही उन बाहर स्थित ज्ञेयों से निरपेक्ष रहता हुआ अपने में ज्ञेयों के आकारों रूप परिणमित होता है और उन्हें जानता है. तथा बाहर स्थित ज्ञेय भी उस ज्ञान से निरपेक्ष (उदासीन ) अपने स्थानों पर सहज विद्यमान रहते हैं . ऐसी ज्ञान एवं ज्ञेयों की पारस्परिक सर्व प्रकार से निरपेक्षता ज्ञान एवं ज्ञेयों का सहज स्वभाव ही है .

(8) स्वाश्रित एवं पराश्रित ज्ञान :–शाश्वत, शुद्ध एवं पूर्ण निज आत्मा के उपलब्ध होने से निज आत्मा को जानने में लगा हुआ ज्ञान रागादि विकारों एवं इन्द्रिय -मन की  आधीनता  से मुक्त होने से स्थिर ,स्वाधीन ,शुद्ध एवं निराकुल (सुखानुभव युक्त ) होता है , जबकि अल्प स्थाई अथवा क्षणिक शरीरादि आत्मा से भिन्न पदार्थों को जानने में लगा हुआ ज्ञान इन्द्रियों एवं मन के अवलम्बन से जानता हुआ तथा राग-द्वेष अथवा क्रोधादि विकारों से युक्त होने से अपूर्ण ,अशुद्ध ,अस्थिर ,पराधीन एवं आकुलित (दुखानुभव युक्त ) होता है .

स्वद्रव्य में प्रवृत्ति सदैव निर्बाध होती है तथा परद्रव्यों में प्रवृत्ति सदैव बाधा सहित फलतः मर्यादित होती है . इसीलिये पर पदार्थों को जानने में लगा हुआ ज्ञान कभी भी पूर्ण नहीं होता , वह पर द्रव्यों को कभी भी पूरी तरह नहीं जान पाता, जबकि आत्मोन्मुख ज्ञान स्वतंत्रतः निरंतर पुरुषार्थ पूर्वक अपनी परलक्षी प्रवृत्ति का अभाव करता हुआ , आत्म लीनता को बढ़ाता हुआ तथा रागादि विकारों को नष्ट करते हुए अपने आत्मिक आनंद में वृद्धि करता हुआ कालान्तर में पूर्णता (सर्वज्ञता ) को  उपलब्ध कर लेता है .जैसे प्रत्येक व्यक्ति अपने घर में अपना कार्य करने में पूर्ण स्वतंत्र एवं समर्थ होता है परन्तु घर से बाहर निकलते ही उसकी कार्य करने की स्वतन्त्रता एवं सामर्थ्य बाधित -मर्यादित हो जाती है .

(9)ज्ञान अपनी अनंत सामर्थ्य होते हुए भी तथा ज्ञेयों के अनंत गुण-पर्याय युक्त होने पर भी अपनी शुद्ध -अशुद्ध पर्यायगत योग्यता के अनुसार ही ज्ञेय पदार्थों को न्यूनाधिक जानता है . जैसे शुद्ध -स्वच्छ दर्पण में सामने रखे ज्ञेय उनके यथार्थ रूप में ही प्रतिबिंबित होते हैं तथा अस्वच्छ , उत्तल-अवतल या आभासी (घिसा हुआ ) दर्पण में वे ही ज्ञेय पदार्थ दर्पण की दशा-स्थिति के अनुसार हीनाधिक या अस्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होते हैं .

(10) यथार्थ स्वरुप के विपरीत (a) संशयात्मक ज्ञान , (b) विपरीत ज्ञान तथा (c) जानने में अनुत्साह , ये ज्ञान के दोष हैं . इन दोषों एवं इष्ट-अनिष्ट बुद्धि सहित पर- द्रव्योन्मुख ज्ञान तथा निज शुद्धात्म तत्त्व के निर्विकल्प स्वसंवेदन से रहित ज्ञान मिथ्या ज्ञान है और निज शुद्धात्मा के निर्विकल्प स्वसंवेदन सहित अतीन्द्रिय आत्मिक निराकुल सुख के अनुभव युक्त ज्ञान सम्यक् ज्ञान है .

 (11) भेद ज्ञान —ज्ञान गुण के विषय एक ही समय में अनेक होते हैं, जैसे–स्व-पर, मूर्त-अमूर्त, कर्तव्य-अकर्तव्य, हित-अहित, द्रव्य-गुण-पर्याय आदि. ज्ञान न केवल पदार्थों को जानता है, वह जाने हुए पदार्थों का हेय-उपादेय रूप से वर्गीकरण भी करता जाता है. ज्ञान की इस सामर्थ्य को भेद ज्ञान या सामान्य शब्दों में विवेक कहा जाता है. जीव का श्रद्धा गुण इस भेद ज्ञान का ही अनुसरण कर हितकर पदार्थ में रूचि-प्रतीति-विश्वास रूप से प्रवर्तित (परिणमित) होता है.

उक्त सम्पूर्ण विवेचन से यह बात अत्यंत स्पष्ट है कि ज्ञान आत्मा का आश्चर्य जनक एवं असाधारण स्वभाव है. “ज्ञान सर्व समाधान कारक है,” यह प्रसिद्ध उक्ति ज्ञान की सामर्थ्य एवं उपयोगिता को देखते हुए सत्य ही है. अर्थात जीवन की लौकिक या पारलौकिक सारी ही समस्याओं का-दुखों का निवारण ज्ञान द्वारा ही होता है. ज्ञानपूर्वक ही हितकर (सुखकर) पदार्थों में श्रद्धा-रूचि- विश्वास उत्पन्न होता है तथा तदनुसार ही हित की उपलब्धि के लिए प्रयत्नरूप आचरण (पुरुषार्थ) भी प्रारम्भ होता है. अतः ज्ञान के विस्तार के स्थान पर भी ज्ञान का किसी पदार्थ या पदार्थों के सम्बन्ध में यथार्थ एवं पूर्ण होना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि पदार्थों के यथार्थ ज्ञान के आधार पर किये गए हित-अहित रूप पदार्थों के निर्णय ही सत्य हो सकते हैं. सही निर्णयों के आधार पर ही श्रद्धा एवं पुरुषार्थ सम्यक् होने से वास्तविक एवं स्थाई सुख का मार्ग प्रशस्त होता है.

(2)आत्मा का सुख स्वभाव:—इस विश्व में सभी जीव सुख चाहते हैं तथा दुःख से डरते हैं . परन्तु वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि सुख क्या है तथा कैसे उसे उपलब्ध किया जा सकता है .

वास्तव में सुख आत्मा का विशेष स्वभाव है जो अचेतन पदार्थों में नहीं पाया जाता . सुख अर्थात सु +ख. सु का अर्थ है अच्छा या श्रेष्ठ एवं ख अर्थात अनुभूति , ख का एक अर्थ आकाश भी होता है . इस प्रकार यहां सुख का अर्थ हुआ –एक अच्छा अनुभव -जो व्यक्ति को इष्ट होता है, अच्छा लगता है . इसके विपरीत दुःख का अर्थ हुआ –ऐसा अनुभव जो व्यक्ति को इष्ट नहीं है अर्थात अच्छा नहीं लगता . यह अनुभव चाहे किसी भी प्रकार का हो , आत्मा में ही होता है , जड़ पदार्थों   में नहीं होता क्योंकि अनुभव ज्ञानपूर्वक ही होता है , ज्ञानमय होता है और ज्ञान आत्मा का असाधारण स्वभाव है .

आत्मा के सुख स्वभाव को निम्न बिंदुओं  द्वारा समझा जा सकता है :—

(1) सुख आत्मा का विशेष स्वभाव है जिसका लक्षण निराकुलता है .

(२) सुख आत्मा का स्वभाव होने से इन्द्रिय एवं मन के विषयों के आधीन नहीं होता क्योंकि जड़ होने से इनमें सुख का सर्वथा अभाव होता है . इन्द्रिय विषयों के सेवन से भी सुख नहीं होता . वास्तव में तो जब यह जीव स्वयं ही अपनी सहज योग्यता से ही सुखी होता है तो उस समय संयोग प्राप्त इन्द्रिय विषयों में भी भ्रमवश सुख प्रतीत होता है और जब स्वयं ही अपनी सहज योग्यता से ही दुखी होता है तो इष्टतम इन्द्रिय विषय (इन्द्रियों द्वारा सेवन किये जाने  वाले पदार्थ ) भी उसे सुखरूप प्रतीत नहीं होता .

कई बार व्यक्ति इन्द्रिय विषयों के सेवन से मुक्त एकाकी शांत चित्त अपनी ही धुन में मस्त बैठा रहता है , जब उससे पूछा जाता है तो वह कहता है ,’बस शान्ति है -आनंद है , कोइ टेंशन नहीं ‘. इससे सिद्ध होता है कि सुख-दुःख आत्मा की स्वभावगत अवस्थाएं हैं जो इन्द्रिय विषयों से निरपेक्ष स्वाधीनतया वर्तती रहती हैं .

(3) इष्ट इन्द्रिय विषयों के सेवन के साथ-साथ अनुभूत सुख वास्तव में सुख नहीं है , वह सुख का आभास मात्र है जैसे मृगमरीचिका में जल का आभास .

वास्तव में आत्मा एक परिपूर्ण ज्ञायक तत्त्व है . लेकिन अपने उस पूर्ण , स्वाधीन , परनिरपेक्ष ज्ञायक स्वभाव को न जानने के कारण अनादि संस्कारवश स्वयं को अपूर्ण अनुभव करता हुआ शरीर के अवयवभूत इन्द्रियों के विषयों के सेवन की इच्छाजनित आकुलता से पीड़ित होता है और इच्छित विषयों के प्राप्त होने पर उनसे संतुष्ट होता हुआ इच्छाजनित तीव्र आकुलता का शमन होने से सुख जैसा अनुभव करता है. परन्तु अगले ही क्षण में एक विषय (वस्तु) का सेवन करते -करते ही दूसरी इन्द्रिय के अनुकूल वस्तु की इच्छा का उत्पन्न होना अथवा पहली वस्तु में अरुचि का उत्पन्न होना इन इन्द्रिय विषयों में सुख के अभाव का स्पष्ट द्योतक है .

(4) जब भी किसी इन्द्रिय विषय का सेवन किया जाता है तो प्रथमतः उसके इच्छित स्पर्श, रस, गंध, वर्ण (रूप-रंग ) अथवा शब्द (ध्वनि ) का ज्ञान होता है तब उसमें इष्ट बुद्धि (यह अच्छा है ऐसी मान्यता ) होने से आत्मा में सुख का वेदन (अनुभव) होता है ; इसके विपरीत विषय का इन्द्रियों द्वारा सेवन होने पर उस विषय के स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द आदि के ज्ञानपूर्वक ‘यह बुरा है ‘ ऐसी अनिष्ट बुद्धि होने से दुःख का अनुभव होता है .

इससे सिद्ध है कि सुख-दुःख ज्ञान पूर्वक ही होते हैं . सुख या दुःख आत्मा की अनुभूतियाँ हैं अतः ये आत्मा का स्वभाव ही हैं . वास्तव में तो इन्द्रिय विषयों के सेवन काल में तीव्र-मंद आकुलता का सद्भाव होने से विषय सेवन जनित सुख आकुलता रूप ही है , उसमें सुख मानना भ्रम है . जगत में इष्ट सामग्री की प्रचुरता के मध्य  जीवन जीने वाले धनी व्यक्ति भी दुखी देखे जाते हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि बाह्य पदार्थों -संयोगों में सुख नहीं है .

(5) वास्तव में इस जीव को  स्वयं द्वारा दृष्ट (देखे हुए ), श्रुत (सुने हुए ) एवं अनुभूत (अनुभव किये हुए ) इष्ट विषयों के सेवन पूर्वक प्राप्त आनंद के पुनः वेदन की या अन्य को दृष्ट-श्रुत या अनुभूत आनंद के प्रथम बार वेदन की  इच्छा होती है अर्थात उस समय ज्ञान की वेदन रूप पर्याय उत्पन्न होकर उस इष्ट स्वाद  का वेदन हो -इसकी इच्छा होती है अर्थात अपनी ही विशिष्ट ज्ञान पर्याय का वेदन करने की इच्छा होती  है . परन्तु वह वेदन ज्ञानमय एवं अपने आत्मा से ही उत्पन्न होने पर भी अपने ज्ञान स्वभाव पर दृष्टि न होने से तथा उस समय सेवन किये गए इष्ट विषय पर दृष्टि होने से (ज्ञान का केंद्र बिंदु होने से) एवं उस इष्ट विषय के सेवन से सुख होने की भ्रमपूर्ण मान्यता होने से इस जीव को अज्ञान दशा में इष्ट विषय के सेवन की इच्छा होती है . संसार (अज्ञान ) दशा में यह क्रम निरंतर चलता रहता है .

(6) इन्द्रिय विषय से प्राप्त सुख का प्रारम्भ उसके सेवन की इच्छा जनित आकुलता से होता है और उसका अंत भी आकुलता से होता है , जबकि आत्मिक सुख का प्रारम्भ सुख से ही होता है तथा आत्मा का स्वभाव होने से उस सुख का कभी अंत नहीं होता .

(7) स्वाश्रित आत्मिक सुख स्वाधीन , बाधा रहित , निराकुल , हीनाधिकता रहित तथा अनंत होता है ; जबकि पराश्रित इन्द्रिय विषय जनित सुख पराधीन, बाधासहित , आकुलता सहित , हीनाधिक (कभी कम कभी अधिक ) तथा अल्पकालिक होता है .

(8) सुख आत्मा का स्वभाव है. इन्द्रिय विषयों के सेवन या ज्ञान पूर्वक अनुभूत इन्द्रिय सुख-दुःख आकुलतामय होने से सुख गुण का विकारी परिणमन है तथा निज-ध्रुव शुद्धात्मा के निर्विकल्प स्वसंवेदन पूर्वक अनुभूत अतीन्द्रिय निराकुल आनंद सुख गुण का शुद्ध परिणमन है .

वास्तविक आत्माश्रित सुख का अनुभव होने पर आत्मेतर बाह्य पदार्थों में इष्ट-अनिष्ट बुद्धि समाप्त हो जाती है , फलतः उनके प्रति होने वाले राग-द्वेष एवं तज्जनित संयोग-वियोग की इच्छा एवं प्रयत्नों से भी व्यक्ति मुक्त हो जाता है तथा ऐसे व्यक्ति का ज्ञान बाह्य पदार्थों से हट कर आत्म-केंद्रित होकर आत्माश्रित निराकुल सुख की उपलब्धि -अनुभूति हेतु निरंतर उद्यमी रहता है .

आत्मा के ज्ञान एवं सुख स्वभाव के ज्ञान की उपयोगिता :—

(1) ज्ञान एवं सुख आत्मा के विशेष स्वभाव हैं. इन गुणों के पूर्वोक्त विस्तृत विवेचन से यह बात स्पष्ट है किज्ञान और सुख आत्मा में, आत्मा के आश्रय से आत्मा के लिए ही होते हैं. अतः ज्ञान और सुख की प्राप्ति के लिए आत्मा से भिन्न पंचेन्द्रिय विषयों से ज्ञान और सुख होता है ऐसी विपरीत मान्यता समाप्त हो जाती है. इस प्रकार ज्ञान और सुख की प्राप्ति के लिए आत्मा की बाह्य पदार्थों पर आश्रितता समाप्त होकर परम स्वाधीनता का जन्म होता है.

(2) इसप्रकार बाह्य इष्ट-अनिष्ट पदार्थों को क्रमशः जुटाने एवं हटाने के निरर्थक प्रयत्नों से एवं तज्जनित राग-द्वेष रूप बुद्धि से व्यक्ति विरत होता है. वह पदार्थों के सहज संयोग एवं वियोग का मात्र ज्ञाता रह जाता है, फलतः उसकी पर द्रव्यों में कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व बुद्धि एवं तज्जनित आकुलता का भी शमन होता है.

(3) व्यक्ति यह जान जाता है कि ज्ञान एवं सुख रूप आत्मा का परिणमन ज्ञेय पदार्थों-इन्द्रिय विषयों से निरपेक्ष अपनी सहज योग्यता से ही होता है. अतः वह आत्मा में होने वाली ज्ञान एवं सुख की अनेक अवस्थाओं से विचलित नहीं होता, “ये सब मेरे ज्ञान में सहज परिणमित ज्ञानाकार एवं सुख गुण की सहज वेदन रूप परिणतियाँ ही हैं इनमें पर द्रव्यों का कुछ भी कर्तृत्व नहीं है,” इस ज्ञान-श्रद्धान के बल से वह उन ज्ञानाकारों एवं सुख-दुखानुभूतियों से विचलित नहीं होता. अपने सहज ज्ञान एवं सुख स्वभाव के आश्रय से निराकुल-शांत ही रहता है.

(4) आत्माश्रित ज्ञान एवं सुख ही निर्दोष होने से सच्चा ज्ञान और सुख है तथा इन्द्रिय ज्ञान और सुख अनेक दोषों से युक्त होने से उपादेय नहीं है. अतः व्यक्ति बाह्य पदार्थों और इन्द्रिय विषयों में ज्ञान और सुख की खोज से विरत होता हुआ अपने निज ज्ञायक आनंदमय आत्मा का (आत्म-स्वभाव का) आश्रय लेता हुआ उसमें अपने ज्ञान को केंद्रित कर वास्तविक सहज ज्ञान और सुख का अनुभव करने हेतु प्रेरित एवं उद्यमी होता है.

(5) इन गुणों के स्वरुप को जान लेने पर ज्ञान के लिए बाह्य ज्ञेय पदार्थों को जानने एवं इन्द्रिय विषयों के सेवन पूर्वक सुख प्राप्ति के लिए होने वाले आकुलताजनक प्रयत्न विराम को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात ज्ञेयलुब्ध परिणति एवं ज्ञेयों में सुख बुद्धि (इष्ट-अनिष्ट बुद्धि) समाप्त हो जाती है. फलतः व्यक्ति का वास्तविक ज्ञान एवं सुख (निजात्माश्रित ज्ञान एवं सुख) की उपलब्धि के लिए प्रयत्न प्रारम्भ होता है जिसकी पूर्णता ही मोक्ष की उपलब्धि अर्थात सिद्धत्व की प्राप्ति है.

उक्त आत्मा के लक्षण रूप ज्ञान एवं सुख स्वभाव के अतिरिक्त भी आत्मा में अनेक विशेष गुण पाए जाते हैं जिनमें दर्शन, श्रद्धा, चारित्र, कर्तृत्व-भोक्तृत्व, स्व क्षेत्रत्व-असंख्य प्रदेशत्व, संकोच विस्तार शक्ति एवं अमूर्तिकत्व आदि प्रमुख हैं . इन प्रमुख विशेष गुणों का विवेचन आगे किया जा रहा है .

(3) दर्शन गुण:—आत्मा चैतन्य स्वभावी है, चेतना उसका लक्षण है. इस चेतना नामक स्वभाव के ही दो भेद हैं :–१. ज्ञान एवं २. दर्शन. ज्ञान एवं दर्शन गुण की पर्यायों को क्रमशः ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग कहा जाता है. ज्ञान आत्मा का असाधारण एवं सर्वज्ञात लक्षण है जिसका विस्तृत विवेचन पूर्व में किया जा चुका है. दर्शन गुण का विषय सूक्ष्म होने से तथा प्रसिद्ध न होने से इसका संक्षिप्त विवेचन यहां किया जा रहा है.

दर्शन गुण की परिभाषा  :—पदार्थों में भेद किये बिना आकार अर्थात विकल्प (यह मकान है ,वृक्ष है, नीला-पीला है आदि ) बिना पदार्थों का जो सामान्य रूप से (सत्ता-अस्तित्व मात्र के अवलोकन रूप से ) आत्मा द्वारा  ग्रहण दर्शन कहा जाता है . तत्पश्चात यह मकान है, वृक्ष है आदि रूप से विकल्प (पदार्थों के स्वभाव रूप द्रव्य-गुण-पर्यायमय ज्ञेयाकारों का ज्ञान ) होने पर ज्ञान कहलाता है.

दर्शन परपदार्थों में तो भेद नहीं करता परन्तु अपने (आत्मा ) में भी भेद नहीं करता , सभी ‘सत् हैं ‘ उन्हें भेद किये बिना देखता है . महासत्ता अर्थात पदार्थों का अस्तित्व – वह दर्शन का विषय है .

यह दर्शन आत्मा में प्रयत्न रूप है . अतः सैद्धांतिक परिभाषा के अनुसार —ज्ञान का उत्पादन करने वाले प्रयत्न से सम्बद्ध स्व-संवेदन अर्थात आत्म विषयक उपयोग (आत्मोन्मुख व्यापार-प्रयत्न ) को दर्शन कहते हैं. इसप्रकार किसी विषय के ज्ञान के पूर्ण हो जाने के बाद के क्षण से लेकर नवीन विषय का ज्ञान प्रारम्भ होने के पूर्व क्षण तक आत्मा में जो प्रयत्न होता है वह दर्शन है.

जैसे कोई व्यक्ति पहले क्षण में मकान को जान रहा है बाद में दूसरे क्षण में उसका लक्ष्य शरीर पर गया, तब उसका ज्ञान मकान से हट गया और शरीर  पर पहुंचा नहीं  है -यहां शरीर का ज्ञान होने से पहले होने वाला आत्मा का शरीर की ओर झुकाव रूप प्रयत्न -वह दर्शन है. और यह शरीर है ऐसा जानना -यह ज्ञान है. इसी प्रकार आत्मा का जानने के पूर्व क्रमिक रूप से भिन्न-भिन्न इन्द्रिय व मन के विषयों की ओर झुकाव होना यह दर्शन है.

संसारी जीवों को अल्पज्ञ दशा में दर्शन पूर्वक ज्ञान होता है तथा सर्वज्ञ परमात्माओं को दर्शनोपयोग एवं ज्ञानोपयोग एक साथ होते हैं.

(4) श्रद्धा गुण:—श्रद्धा अर्थात विश्वास, प्रतीति, आस्था, मान्यता आदि. यह आत्मा का विशेष गुण है. श्रद्धा ज्ञान पूर्वक होती है. ज्ञान के द्वारा यथार्थतः जाने हुए पदार्थों में से किसी एक में ‘यही वस्तु मेरे लिए हितकर -उपादेय है’ अथवा ‘यह ही मेरा स्वरुप है ‘और इसके सेवन से ही अथवा आश्रय करने से ही मुझे अवश्य सच्चे सुख की अथवा सुखमय लक्ष्य (निज शुद्धात्मा ) की प्राप्ति होगी , ऐसा मानकर उस उपादेय वस्तु का विश्वास करना अथवा उसमें ” अहम् ” करना (मैं पना करना-यही मैं हूँ ) यह श्रद्धा का कार्य है. एक समय में श्रद्धा का श्रद्धेय एक ही होता है. एक बार निर्णय होने पर उसकी (श्रद्धेय की) प्रतीति एवं रूचि बनी रहे यह श्रद्धा का कार्य है.

श्रद्धा एक ही समय में दो विरुद्ध भावों का अहम् नहीं कर सकती जैसे -शरीर एवं आत्मा, स्वभाव एवं विकार, क्षणिक एवं ध्रुव आदि. ज्ञान के विषय तो एक ही समय में स्व-पर एवं उनके द्रव्य-गुण-पर्याय , हेय-उपादेय , हित-अहित आदि सभी होते हैं तथा ज्ञान उन सभी ज्ञेयों को जान कर उनमें हेय-उपादेय की कक्षा बनाता है. लेकिन श्रद्धा का विषय इन सबमें से मात्र हितरूप तत्त्व ही होता है क्योंकि श्रद्धा सदैव हितरूप तत्त्व का ही अवलम्बन करती है.

यदि श्रद्धा विपरीत अर्थात गलत होती है तो श्रद्धा के अनुरूप आचरण करने पर सुख की (लक्ष्य की ) प्राप्ति नहीं होती और तब ज्ञान में हुए नवीन निर्णय के अनुसार श्रद्धा किसी अन्य पदार्थ में हितरूप विश्वास करती हुई ‘अहम् ‘ करने लगती है. यह क्रम जीव की अज्ञान दशा में निरंतर चलता है.

यथार्थ वस्तु स्वरुप के विपरीत मान्यता- विश्वास- प्रतीति मिथ्या श्रद्धा है और यथार्थ वस्तु स्वरुप के अनुरूप मान्यता सम्यक् श्रद्धा है. जैसे आत्मा से भिन्न पदार्थों में इष्ट-अनिष्ट बुद्धि मिथ्या श्रद्धा है और अपनी आत्मा में ही आत्म बुद्धि एवं उसे ही शाश्वत निराकुल सुख व ज्ञान का आधार मानना यह सम्यक् श्रद्धा है, इसे ही सम्यक्त्व भी कहते हैं.

सुखी होने के लिए श्रद्धा का सम्यक् (सही-सच्चा) होना अनिवार्य है क्योंकि आचरणरूप चारित्र एवं तत्सम्बन्धी प्रयत्न श्रद्धा के अनुसार ही होते हैं. यदि श्रद्धा मिथ्या हो तो इष्ट (सुख ) की उपलब्धि के लिए किये जाने वाले सारे ही प्रयत्न मिथ्या होते हैं और इस प्रकार श्रद्धा के खंडित होने पर जीव बहुत दुखी होता है. यदि श्रद्धा सम्यक् हो तो इष्ट (सुख ) की प्राप्ति के सारे प्रयत्न सफल होते हैं और जीव सदा के लिए सुखी हो जाता है .

 संसार के दुखों से मुक्ति के मार्ग में श्रद्धा का बहुत महत्त्व है. मिथ्या श्रद्धा को संसार का एवं सम्यक् श्रद्धा को मोक्ष-मार्ग (सुख का ) का मूल कहा गया है .

श्रद्धा का श्रद्धेय :—हमने देखा कि श्रद्धा हितरूप वस्तु की होती है और  जो हितरूप वस्तु है उसमें श्रद्धा ‘अहम् ‘ करती हुई समर्पित हो जाती है. अतः यह जानना आवश्यक है कि श्रद्धा का श्रद्धेय कौन होता है. इसके लिए यह निर्णय करना आवश्यक है कि आत्म-हितकर वस्तु कौन हो सकती है. हम देखते हैं कि जब किसी विवाह योग्य कन्या के लिए वर की खोज की जाती है तो वर में उसकी दीर्घायु, स्वास्थ्य एवं सामर्थ्य, शुद्धाचरण ( निर्दोषपना-सदाचार ) एवं कन्या को अनुकूल होकर हितकर-सुखकर हो , ऐसे अनेक गुण देखे जाते हैं. और ऐसे वर को पाकर वह कन्या भी अपना जीवन धन्य समझती हुई उसके प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाती है.

इसीप्रकार श्रद्धा गुण का श्रद्धेय भी होना चाहिए. किसी भी व्यक्ति-वस्तु का विशवास करते समय उसमें तीन बातें अनिवार्यतः देखी जाती हैं–स्थायित्व , निर्दोषता-शुद्धता एवं आनन्दप्रदता (हितकर ). हमने देखा है कि आत्मा त्रिकाल ध्रुव, शुद्ध एवं ज्ञान-दर्शन स्वभावी आनंदमय वस्तु है क्योंकि ये गुण आत्मा के स्वभाव ही हैं. आत्मा के साथ अनादि काल से संयोग में रहने वाले शरीर, कर्म, इन्द्रियाँ न तो ध्रुव हैं , न ही शुद्ध-पवित्र हैं, ये सुख के साधन न होकर मात्र दुःख के कारण हैं क्योंकि इनमें ज्ञान एवं सुख का अभाव है. इन शरीर- परिवार-धन-वैभव आदि बाह्य पदार्थों के अवलम्बन से होने वाले मोह-राग-द्वेषरूप आत्म विकार भी दुःख के कारण ही हैं क्योंकि यह स्पष्ट अनुभूत तथ्य है आत्मा के दुखों का कारण बाह्य पदार्थ न होकर उनमें इष्ट-अनिष्ट बुद्धि पूर्वक होने वाले मोह-राग-द्वेषादि परिणाम ही हैं. अतः बाह्य पदार्थ तो ज्ञान व सुख से शून्य होने से आत्मा की श्रद्धा के केंद्र हो ही नहीं सकते, वरन आत्मा में उत्पन्न विकार रूप क्षणिक परिणाम भी श्रद्धास्पद नहीं होते.

इसप्रकार सम्पूर्ण संयोगी पदार्थ एवं बाह्य जगत तथा उनके निमित्त से होने वाले रागादि भाव श्रद्धेय की श्रेणी से बाहर हो जाते हैं. तब केवल एक निज ध्रुव चैतन्य आत्म-वस्तु ज्ञान व आनन्दादि अनंत गुणमय अभेद-अखंड पदार्थ बचता है जो श्रद्धा का केंद्र बिंदु बन सकता है. क्योंकि श्रद्धा आत्मा का ही गुण होने से उसके लिए (1) निज आत्मा ही सदा सुलभ वस्तु है, (2) ध्रुव आत्मा त्रिकाल शुद्ध-निर्दोष  पदार्थ है,  (3) हितरूप सुख-आनंद का घन पिंड होने से हितकर-आनंदकर है और (4) संयोगों में रहते हुए भी तथा संयोगी भाव–रागादि रूप परिणमित होते हुए भी उनसे प्रभावित नहीं होता क्योंकि ये क्षणिक संयोग एवं संयोगी भाव ध्रुव चैतन्य में प्रवेश नहीं पाते.

इसप्रकार निज ध्रुव ज्ञान-आनंदमय शुद्ध चैतन्य ही श्रद्धा का श्रद्धेय हो सकता है अन्य नहीं. अतः निजात्मा में आत्मबुद्धि पूर्वक ‘अहम्’ ( यही मैं हूँ -यही मेरे लिए हितकर है  ऐसी परिणति ) वास्तविक श्रद्धा है, सम्यक् श्रद्धा है, सम्यक्त्व है. यह सम्यक् श्रद्धा ही मोक्ष-सुख का मूल है, धर्म का मूल है.

श्रद्धा गुण —उपसंहार —उक्त सम्पूर्ण विवेचन से यह स्पष्ट है कि श्रद्धा-आस्था या विश्वास आत्मा का एक महत्त्वपूर्ण गुण है,जिसकी विपरीतता दुःख  का एवं यथार्थता सुख का कारण होती है.

अतः श्रद्धा या विश्वास करने के पूर्व वस्तु अथवा व्यक्ति के सम्बन्ध में गहन अध्ययन, चिंतन-मनन और स्वयं तथा अन्य प्रबुद्ध जनों के अनुभवों के आधार से हितकर अथवा अहितकरपने का निर्णय किया जाना चाहिए. यदि व्यक्तियों के सम्बन्ध में श्रद्धा भंग होती है तब तो ऐसे व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध सदा के लिए भी समाप्त हो जाते हैं तथा आत्मीयता के स्थान पर कटुता चित्त में घर कर जाती है.

दूसरी ओर आत्महित की दृष्टि से विचार किया जाये तो पूर्व में यह स्पष्टतया सिद्ध किया ही गया है कि बाह्य पदार्थ कभी भी आत्मा के लिए हितकर-सुखकर नहीं हो सकते क्योंकि ज्ञान एवं सुख आत्मा में, आत्मा के आश्रय से निज आत्मा के लिए ही होते हैं तथा बाह्य पदार्थ इस दृष्टि से सर्वथा अकिंचित्कर हैं. साथ ही सभी पदार्थों का परिणमन स्वभावतः स्वतंत्र होने से किसी वस्तु या व्यक्ति की किसी अवस्था के प्रति किया गया हितपने का विश्वास कभी भी पूर्ण नहीं होता तथा स्वयं इस व्यक्ति की भी रागरूप परिणति में परिवर्तन होते रहने से इसकी भी अन्य वस्तु या व्यक्ति के प्रति हितरूप मान्यता सहज ही बदल जाती है. अतः पर पदार्थों में हितरूप मान्यता या श्रद्धा निरर्थक ही है.

इसप्रकार एकमात्र अपना आत्मा ही जो त्रिकाल शाश्वत. सदैव उपलब्ध. ज्ञान एवं आनंद आदि अनंत गुणों का घन पिंड होने से सदैव हितकर-आनंदप्रद तथा अन्य अनेक पर द्रव्यों के बीच या उनके साथ रहने पर भी सदैव उनसे अप्रभावित अतः शुद्ध होने से परम श्रद्धेय सिद्ध होता है. अतः उस निज ध्रुव ज्ञायक आनंदमय आत्मा की श्रद्धा ही एकमात्र कर्तव्य है, वही सुख की प्राप्ति एवं दुःख के निवारणरूप सार्थक-सफल प्रयत्नों का (आचरणरूप चारित्र का) एकमात्र आधार है. 

(5) चारित्र गुण—चारित्र आत्मा का विशेष गुण है . वह आचरण या प्रयत्न जिससे हित को प्राप्त करते हैं और अहित का निवारण करते हैं उसको चारित्र कहते हैं.

इस विश्व में सभी जीव दुःख से निवृत्ति एवं सुख में प्रवृत्ति चाहते हैं क्योंकि आत्मा का हित सुख है, सुखी होने में है. इसीलिये जीव मात्र के द्वारा सुखी होने के लिए के लिए ही सारे प्रयत्न किये जाते हैं. प्राणी मात्र अपनी-अपनी बुद्धि व समझ के अनुसार शक्तिभर प्रयत्न सुखी होने के लिए करता रहता है. इससे स्पष्ट होता है कि हित की आकांक्षा एवं उसके लिए प्रयत्न जीवमात्र का स्वभाव है अर्थात चारित्र जीवों का- आत्मा का स्वभाव है. अचेतन पदार्थों में हित-अहित का बोध नहीं होने से प्रयत्न रूप आचरण  का अभाव प्रत्यक्ष ही देखा जाता है.

वास्तव में तो जीवों को ऐसा सुख चाहिए जो स्वाधीन हो, जिसके आदि-मध्य-अंत में आकुलता न हो , जो अनंत हो, बाधा रहित हो. सुख गुण के पूर्व में किये गए विस्तृत विवेचन से स्पष्ट  है कि सुख आत्मा का स्वभाव है, अन्य अचेतन पदार्थों में -इन्द्रिय विषयों में सुख का अभाव है तथा अन्य चेतन पदार्थों के स्वभावभूत सुख की उपलब्धि भी किसी जीव के लिए असंभव है. अतः निजात्मा से भिन्न इष्ट-अनिष्ट चेतन-अचेतन पदार्थों के संयोग-वियोग में सुख की प्राप्ति के प्रयत्न निष्फल होते हैं. यदि सुख की उपलब्धि मानी भी जाती है तो वह भ्रम मात्र है क्योंकि सुख के प्रयत्नों को प्रचुर भोग सामग्री के बीच भी विराम नहीं मिलता, अतृप्ति एवं आकुलता निरंतर बनी रहती है.

चूंकि सुख आत्मा का स्वभाव है और उसकी इच्छा भी आत्मा को ही होती है अतः उसका प्रयत्न भी बाह्य पदार्थों के स्थान पर अपनी आत्मा में ही होना चाहिए. निष्कर्षतः केवल निजात्मा के आश्रय से ही आत्मा के स्वभावभूत सुख की प्राप्ति का प्रयत्न निजात्मा में ही होने पर आत्मिक सुख की प्राप्ति संभव है. वह सुख स्वभावभूत होने से स्वाधीन, पर की अपेक्षा व हस्तक्षेप से मुक्त होने से बाधारहित, स्वभाव की अनंतता के कारण अनंत होता है. अतः उस निज आत्माश्रित सुखरूप हित की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला आचरण / प्रयत्न ही चारित्र है.

सुख ज्ञान पूर्वक  होता है, यह अनुभूत तथ्य है. अतः सुखरूप हित की निरंतरता के लिए हितरूप वस्तु को जानना ही नहीं वरन निरंतर जानते रहना आवश्यक है. इसप्रकार निजात्मा को जानते रहना, निजात्मानुभूति में रत रहना, आत्मा में लीन या स्थिर होना –यह ही आचरण है चारित्र है.

बाह्य पदार्थों में कल्पित इष्ट-अनिष्ट बुद्धि पूर्वक हितरूप (इष्ट ) पदार्थों की प्राप्ति एवं उनके सेवन के लिए तथा अहितरूप (अनिष्ट ) पदार्थों से मुक्ति के लिए बाहर में दिखाई देने वाली शरीर-मन-वाणी की प्रवृत्ति यह स्थूल आचरण है जो आत्मा के भीतर चलने वाले अज्ञानजनित मोह-राग-द्वेष रूप आन्तरिक अशुद्ध आचरण का प्रतिफलन है जो दुःखरूप है. इसके विपरीत आत्मा का आत्मा में हित -बुद्धि पूर्वक आत्मिक अतीन्द्रिय निराकुल सुख की प्राप्ति के लिए होने वाला प्रयत्न शुद्ध आचरण (शुद्ध चारित्र ) है , यह आत्मलीनता पूर्वक आत्मानुभूति रूप है. यह ही संसार के दुखों से मुक्ति का एक मात्र साधन है. 

ज्ञान श्रद्धा पूर्वक ही चारित्र होता है :—प्रथमतः वीतरागी-सर्वज्ञ परमात्माओं  अथवा उनकी परम्परा के अनुवर्ती आत्मज्ञानी संतों के उपदेश से या उनके द्वारा रचित शास्त्र / आगम के गहन अध्ययन -अभ्यास पूर्वक यथार्थ वस्तु स्वरुप का ज्ञान होता है. तत्पश्चात उसके गंभीर चिंतन-मनन  पूर्वक तथा अपने व ज्ञानियों के अनुभवों से मिलान करते हुए हित-अहित या हेय-उपादेय का निर्णय किया जाता है. इस निर्णय के अनुसार हितकर पदार्थ की श्रद्धा या विश्वास होता है और फिर उस निर्णय एवं विश्वास के अनुसार आचरण किया जाता है. आचरण  पुरुषार्थ पूर्वक होता है.  आचरण पूर्वक लक्ष्य (स्वाधीन निराकुल सुख ) की उपलब्धि होने पर ही श्रद्धा, ज्ञान व चारित्र की सत्यता का परीक्षण होता है. यदि वास्तविक आत्मिक सुख की उपलब्धि   होती है तो ये तीनों सम्यक् होते हैं अन्यथा तीनों मिथ्या होते हैं और तब सुखरूप लक्ष्य के लिए आत्मा का पुनः प्रयत्न प्रारम्भ हो जाता है.  और यह क्रम लक्ष्य सिद्धि होने तक अनवरत चलता रहता है.

जैसे एक कछुआ जंगल में खतरा होने पर अपने सारे अंगों को समेट कर पीठ के मजबूत कवच के अंदर सुरक्षित हो जाता है. कुछ काल बाद वह अपना थोड़ा सा मुंह बाहर निकाल कर आसपास देखता है, खतरा न होने पर वह थोड़ा दूर देख तक कर निश्चिन्त होने पर ही अपने पैर कवच में से बाहर निकाल कर चलना प्रारम्भ करता है.यदि खतरा हो तो वह पुनः अपने में सिमट कर सुरक्षित हो जाता है. इसीप्रकार ज्ञान पूर्वक श्रद्धा एवं श्रद्धा पूर्वक ही चारित्र होता है. बिना यथार्थ ज्ञान व श्रद्धा के किया गया आचरण गहन दुखों की परम्परा का कारण बनता है . इसप्रकार ज्ञान व श्रद्धा के सम्यक् होने पर चारित्र भी सम्यक् होता है और वह सुख का साधन होता है. श्रद्धा सम्यक् होने पर भी पुरुषार्थ की कमी के कारण साधक दशा में आत्मा का बाह्य पदार्थों में आचरण (प्रवृत्ति ) संभव है और वह जीव के दुःख का कारण बनता है. मोक्ष मार्ग की साधना में सम्यक् चारित्र का महत्त्व पूर्ण स्थान है, यह ही मोक्ष का वास्तविक साधन है. वास्तविक आत्मिक निराकुल सुख यह सम्यक् चारित्र का फल है.

मिथ्या एवं सम्यक्-चारित्र —मिथ्या अर्थात असत्य अथवा विपरीत ; सम्यक् अर्थात सत्य अथवा यथार्थ -वास्तविक. अतः मिथ्या-चारित्रअर्थात असत्य-विपरीत आचरण एवं सम्यक्-चारित्र  अर्थात सही-वास्तविक आचरण. हम जानते हैं कि आचरण या प्रयत्न का उद्देश्य सुखरूप लक्ष्य की प्राप्ति करना है और दुःख से निवृत्त होना है. अतः यह कहा जा सकता है कि ऐसा प्रयत्न या आचरण जो दुःख रूप हो या जिसका फल दुःख हो वह मिथ्या-चारित्र है ;और ऐसा आचरण जो सुखमय हो या जिसका फल वास्तविक सुख हो वह सम्यक् चारित्र है.

यह एक सर्व विदित तथ्य है कि संसार दुखमय है ,निरंतर आकुलता रूप है तथा उससे मुक्ति रूप दशा -पूर्ण आत्मलीनता पूर्वक आत्मविकास की दशा -मोक्ष सुखरूप है. यदि ऐसा न होता तो धनिक. समर्थ पुण्यवान पुरुष -यहां तक कि बड़े-बड़े सम्राट भी राज-पाट त्याग कर  आत्म-साधनार्थ उद्यमी क्यों होते ? संसार से मुक्ति के लिए सन्यस्त क्यों होते?  इससे सिद्ध होता है  कि संसार-शरीर व भोगों की अर्थात सांसारिक लक्ष्यों की  पूर्ति के लिए किये जाने वाले प्रयत्न दुखमय एवं दुःख के कारणभूत होने से मिथ्या चारित्र हैं, क्योंकि यह सिद्धांत है कि प्रत्येक द्रव्य अपने में परिपूर्ण, अपने स्वचतुष्टय में सुस्थित एवं पर पदार्थों से सर्वथा अप्रभावित होता है ; अतः उनमें और उनसे सुख की कल्पना व प्रयत्न असफल होने से सदैव आकुलता के ही कारण होते हैं अतः मिथ्या-चारित्र हैं. उनमें अनुभव होने वाला किंचित अनुकूलतारूप इन्द्रिय सुख वास्तव में मृगमरीचिका के समान सुखाभास है- आकुलतामय है.

संसार एवं उसके दुखों से मुक्ति के लिए -आत्मिक-स्वाधीन -निराकुल सुख के लिए किये जाने   वाले  आत्माश्रित आत्मानुभूति रूप पुरुषार्थ एवं प्रयत्न सम्यक्-चारित्र हैं; क्योंकि सुख आत्मा का स्वभाव है अतः उसकी प्राप्ति के लिए निज आत्मा में आत्मा द्वारा किया जाने वाला प्रयत्न  निष्फल नहीं हो सकता , सदैव सफल-सुखमय ही होता है.

अतः मिथ्या एवं सम्यक्-चारित्र की एक परिपूर्ण परिभाषा निम्न प्रकार हो सकती  है;—

मिथ्या-चारित्र:–बाह्य पदार्थों में भ्रम-पूर्ण इष्ट-अनिष्ट बुद्धि पूर्वक हितरूप (इष्ट ) पदार्थों की प्राप्ति और उनके सेवन के लिए तथा अहितरूप (अनिष्ट ) पदार्थों से मुक्ति के लिए बाहर में दिखाई देने वाली शरीर-मन-वाणी की प्रवृत्ति रूप स्थूल आचरण है, जो आत्मा की यथार्थ वस्तु स्वरुप के अज्ञान जनित मोह-राग-द्वेषरूप आंतरिक प्रवृत्ति का प्रतिफल है. यह अनात्मा में आत्म बुद्धि पूर्वक मोह-राग-द्वेषादि भावों में प्रवृत्ति -लीनता – स्थिरता ही मिथ्या-चारित्र है.

सम्यक्-चारित्र :—आत्मा का निज शुद्ध आत्मा में आत्म बुद्धि-हितबुद्धि पूर्वक आत्माश्रित निराकुल सुख की प्राप्ति के लिए होने वाला आत्मलीनता पूर्वक आत्मानुभूति रूप प्रयत्न-आचरण सम्यक्-चारित्र है. यह ही संसार के दुखों से छूटने का-मुक्ति का एक मात्र उपाय है.

कहा भी है “शुद्ध चित स्वरूपे चरणम चारित्रम ” अर्थात निज शुद्ध चैतन्य स्वरुप में आचरण -लीनता चारित्र है , यह अतीन्द्रिय आनंदमय मोह-क्षोभ (कषायों की चंचलता ) रहित दशा है. “चारित्तं खलु धम्मो ” इस सूत्र के अनुसार यह ही वास्तविक धर्म है. इसमें आत्मा का उग्र पुरुषार्थ प्रतिफलित होता है.

(6) कर्तृत्व (कर्त्तापना )एवं भोक्तृत्व (भोक्तापना ):—कर्त्ता अर्थात कार्य करने वाला, क्रिया के फल को प्राप्त करने वाला. भोक्ता अर्थात भोगने वाला –क्रिया के फल रूप सुख-दुःख को भोगने वाला -अनुभव करने वाला ; इसलिए जो कर्त्ता होता है वही भोक्ता होता है.

कर्त्ता की परिभाषा शास्त्रकारों ने इस प्रकार दी है–“यः परिणमति स कर्त्ता”, अर्थात जो परिणमन करता है वही कर्त्ता है. एक अन्य सूत्र के अनुसार ” स्वतंत्रः कर्त्ता “, अर्थात कर्त्ता स्वतंत्र होता है.

प्रथम परिभाषा के अनुसार जो परिणमित होता है वह कर्त्ता होता है. परिणमन पर्याय रूप होता है और द्रव्य ही स्वयं अपनी पर्याय रूप परिणमित होता है, अतः द्रव्य स्वयं अपनी पर्याय का कर्त्ता होता है और पर्याय उसका कार्य होती है. दूसरी परिभाषा के अनुसार कर्त्ता स्वतंत्र होता है अर्थात कार्य की आवश्यक उत्पादक शक्तियां कर्त्ता में निहित होती हैं अथवा वह उन शक्तियों से संपन्न होता है, यदि कर्त्ता के पास कार्योत्पादक शक्तियां न हों तो वह कार्य स्वतंत्रतया नहीं कर सकेगा. पराधीन व्यक्ति या द्रव्य कर्त्ता नहीं हो सकते.

उक्त दोनों परिभाषाओं को एक साथ देखने पर निष्कर्षतः कर्त्ता वह द्रव्य होता है जो कार्य (पर्याय ) की  उत्पादक अनंत गुण-शक्तियों से एवं सहज परिणमन स्वभाव से युक्त होता है और यह परिणमन रूप (पर्यायरूप ) कार्य उस द्रव्य में ही स्वतन्त्रतया होता है. निष्कर्षतः एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कार्य करने में अर्थात उसको परिणमित कराने में – उसमें अभीष्ट पर्याय का उत्पाद करने में असमर्थ ही होता है क्योंकि १. प्रत्येक द्रव्य अपने स्वक्षेत्र में ही रहता है, दूसरे द्रव्य के क्षेत्र में प्रवेश नहीं पाता, २. दूसरे द्रव्य की कार्य रूप पर्याय की उत्पादक शक्तियों का पहले द्रव्य में सर्वथा अभाव होता है तथा ३. दूसरे द्रव्य में कार्य  करने वाला द्रव्य स्वतंत्र भी नहीं हो सकता क्योंकि कार्य तो उसमें अपनी शक्ति-स्वभाव के अनुसार ही हो सकेगा न कि अन्य द्रव्य के अनुसार.

यहां यह प्रश्न संभव है कि लौकिक व्यवस्था में तो  व्यक्तियों को अनेक प्रकार के पारिवारिक-सामाजिक-व्यावसायिक कार्य करते हुए देखा जाता है और वे अपने कार्यों के अनुसार यथेष्ट धन-संपत्ति, दंड अथवा पुरस्कार, निंदा या प्रशंसा के रूप में  इष्ट-अनिष्ट फल को  प्राप्त करते या भोगते भी देखे जाते हैं. यदि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य के कार्यों का अकर्त्ता एवं अभोक्ता है तो फिर यह सब कैसे सम्भव है?

समाधान:–इस लोक में सीमित क्षेत्र में अनंत चेतन-अचेतन द्रव्य एक साथ रहते हैं तथा उनमें अपनी-अपनी स्वभाव-शक्तियों के अनुसार  सहजपने परिणमन भी होता रहता है. संसार दशा में जीव का शरीर और इन्द्रियों के साथ अनादिकालीन संयोग एवं उनके प्रति राग-द्वेषरूप विकारी परिणमन यथार्थ वस्तु स्वरुप के अज्ञान के कारण सहज ही पाया जाता है. दूसरी ओर संयोग में आये हुए चेतन-अचेतन पदार्थों का भी सहज ही अपनी स्वभावगत योग्यता से ही अनेक प्रकार का पर्याय रूप परिणमन पाया जाता है. 

शरीर, इन्द्रियों एवं उनके विषयभूत इष्ट-अनिष्ट पदार्थों  में इस जीव की अज्ञानजनित अनुकूल-प्रतिकूल परिणमन कराने की बुद्धि पाई जाती है तथा तत्सम्बन्धी राग-द्वेष प्रेरित प्रयत्न भी देखे जाते हैं; दूसरी ओर सम्बंधित पदार्थों में अपनी सहज योग्यता से ही कदाचित जीव के उक्त परिणामों के अनुकूल परिणमन का योग होने से इष्ट परिणमन देखे जाते हैं, तो  व्यक्ति को यह अज्ञानजनित भ्रम हो जाता है कि मेरे कारण से अन्य पदार्थ में यह कार्य हुआ है और वह स्वयं को उन पदार्थों के पर्याय रूप कार्य का कर्त्ता-भोक्ता मानने लगता है. लोक व्यवस्था तो उस व्यक्ति का राग एवं ज्ञान तथा शक्ति उस कार्य के प्रति उन्मुख होने से व्यक्ति के कर्तृत्व को स्वीकार करती है तथा उसका फल भी उसे मिलता है . यह लौकिक व्यवस्था की अनिवार्यता ही है. परन्तु यथार्थ वस्तु स्वरुप की कसौटी पर देखा जाए तो यह मान्यता वस्तु- स्वातंत्र्य की विरोधी ही है.

क्योंकि यदि एक द्रव्य को दूसरे द्रव्य का कर्त्ता स्वीकार किया जाये तो दूसरे द्रव्य में परिणमन स्वभाव एवं शक्ति का अभाव स्वीकार करना होगा और उसमें शक्ति का अभाव माना जाये तो अन्य द्रव्य भी उसमें कार्य किस प्रकार कर सकेगा?  तथा शक्तिहीन द्रव्य के तो अभाव का प्रसंग आता है. और यदि प्रथम द्रव्य अन्य द्रव्य का कार्य करे तो वह अपना कार्य कब व कैसे करेगा, यदि वह अपने परिणमन कार्य में निष्क्रिय होता है तो उसके अभाव का प्रसंग आता है. फिर यह भी एक तथ्य है कि एक द्रव्य को दूसरे द्रव्य का स्वतन्त्रतया कर्त्ता मानने पर कमियां- त्रुटियाँ या असफलताएं होंगी ही नहीं. परन्तु ये सब तो लोक में देखी जाती हैं, जो वस्तु स्वभाव की स्वतन्त्रता की द्योतक हैं.

अपने शरीर-समाज एवं प्रकृति में चेतन-अचेतन पदार्थों में होने वाले सूक्ष्म- स्थूल परिवर्तन , आत्मा में सहज चलने वाले अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प एवं कषाय-पापरूप शुभाशुभ परिणाम परिणमन की स्वतन्त्रता को ही व्यक्त करते हैं. इससे सिद्ध होता है कि सभी द्रव्य अपने-अपने परिणामों  के स्वतंत्र कर्त्ता होते हैं. भोक्ता होना -यह मात्र आत्मा का विशेष स्वभाव है. इस प्रकार आत्मा में अपने शुद्ध-अशुद्ध परिणामों की अपेक्षा कर्तृत्व एवं उनके सुख-दुःखरूप फलानुभूति की अपेक्षा भोक्तृत्व है.

इस प्रकार एक द्रव्य जब दूसरे द्रव्य का कर्त्ता नहीं होता तो वह दूसरे द्रव्य का भोक्ता भी नहीं होता. प्रत्येक द्रव्य का अपना सहज स्वतंत्र परिणमन स्वभाव होने से उसे अन्य द्रव्य के सहयोग की अपेक्षा भी नहीं होती, न ही किसी एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के परिणमन में हस्तक्षेप का भय ही रहता है.

अतः आत्मा भी एक द्रव्य होने से, अनंत सामान्य – विशेष गुणों से युक्त होने से, अपने स्वक्षेत्र एवं अपने स्वभाव में ही सुस्थित होने से अपने ज्ञान-दर्शन-सुखादि गुणों की जानने-देखने-सुखादि का अनुभव करने रूप अनंत पर्यायों का अथवा अज्ञानजनित मोह-राग-द्वेषादि रूप शुभाशुभ भावों (पर्यायों ) का स्वतन्त्रतया कर्त्ता होता है तथा उनके फलरूप तीव्र-मंद आकुलतामय फल का भोक्ता होता है अथवा सम्यक् (यथार्थ ) श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र रूप परिणमित होने पर  आत्मिक निराकुल सुख का भोक्ता होता है. परन्तु आत्मा से भिन्न शरीर-परिवार-धन-संपत्ति आदि पदार्थों का – उनके परिणामों का कर्त्ता एवं भोक्ता किंचित भी नहीं होता.

आत्मा के कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व स्वभाव को जानने से लाभ :—

 (1) आत्मा के उक्त स्वभाव के सम्यक् परिज्ञान से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक द्रव्य अपनी-अपनी कार्योत्पादक शक्तियों से पूर्णतः समृद्ध होने से प्रति-समय उत्पन्न होती हुई नित-नवीन पर्यायों का स्वतंत्रतः कर्त्ता होता है परन्तु एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के क्षेत्र में प्रवेश भी असंभव होने से एक द्रव्य किसी अन्य द्रव्य की पर्याय का कर्त्ता कभी भी नहीं होता. अतः दो द्रव्यों में परस्पर हस्तक्षेप या सहयोग की बात भी निरर्थक हो जाती है

(2) इसप्रकार अनादि अज्ञानजनित पर में कर्त्तापनेकी भ्रान्ति का निवारण हो जाता है तथा उस सम्बन्धी आकुलता का भी अभाव हो जाता है. फलतः व्यक्ति पदार्थों में होने वाले इष्ट-अनिष्ट परिवर्तनों में, राग पूर्वक प्रयत्नों की सफलता-असफलता में हर्षित अथवा खेद-खिन्न नहीं होता.

(3) इसप्रकार आत्मा अज्ञान दशा में केवल अपने रागादि विकारी भावों का कर्त्ता तथा तज्जनित मंद-तीव्र आकुलता रूप सुख-दुःख का भोक्ता रह जाता है. जीव साधक दशा में अपने शुद्ध वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदन रूप शुद्ध पर्याय का एवं पुरुषार्थ की हीनता होने पर अपने परलक्षी शुभाशुभ परिणामों का कर्त्ता होता है और वही जीव स्वसंवेदन की दशा में निराकुल आत्मिक आनंद का तथा शुभाशुभ परिणाम होने पर उनके फलरूप आकुलता का भोक्ता रह जाता है.

(4) परकर्तृत्व एवं परभोक्तृत्व की मिथ्या मान्यता का अभाव हो जाने से अब उसकी दृष्टि सर्व पर पदार्थों से हट कर अपने सहज परिणमनशील शुद्ध-बुद्ध आनंदमय स्वभाव पर केंद्रित  हो जाती है. फलतः वह अपने शुद्धात्म स्वरुप में स्थिर होता हुआ मात्र अपने अतीन्द्रिय आत्मिक आनंद का भोक्ता रह जाता है.

(7)   स्वक्षेत्रत्व (असंख्य प्रदेशत्व ) एवं संकोच –विस्तार शक्ति :—प्रत्येक द्रव्य जो विद्यमान होता है वह किसी न किसी क्षेत्र में अवश्य ही रहता है तथा उसका कोई न कोई आकार भी अवश्य होता है, जितने क्षेत्र में वह द्रव्य रहता है अथवा जितना क्षेत्र (स्थान ) उस द्रव्य के द्वारा घेरा जाता है वही क्षेत्र उस द्रव्य का स्वक्षेत्र होता है और वह सुनिश्चित होता है. साथ ही समय विशेष पर प्रत्येक द्रव्य का आकार भी सुनिश्चित होता है.

एक द्रव्य होने के कारण प्रत्येक आत्मा का भी सुनिश्चित क्षेत्र एवं आकार अवश्य होता है. आत्मा को निराकार भी कहा जाता है उसका कारण आत्मा के आकार का चर्म चक्षुओं से दिखाई न देना मात्र है क्योंकि अमूर्तिक होने से आत्मा इन्द्रिय ग्राह्य नहीं होता. हमें जो दिखाई देता है वह शरीर का आकार है आत्मा का नहीं.

सभी आत्माएं वास्तव में तो समान क्षेत्र वाली ही हैं और वह क्षेत्र आकाश के असंख्य प्रदेशों जितना अर्थात जितने क्षेत्र में छह द्रव्य (जीव, पुद्गल, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश एवं काल द्रव्य ) एक साथ रहते हैं -जिसे लोकाकाश भी कहा गया है ,उसके बराबर है. आकाश का सबसे छोटा अविभाज्य क्षेत्र एक प्रदेश कहलाता है.

यहां लोकाकाश का क्षेत्र तो बहुत बड़ा है तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि संसार में जीव तो बहुत छोटे शरीरों में पाए जाते हैं तो आत्मा लोकाकाश प्रमाण क्षेत्र वाला कैसे हो सकता है.

समाधान :—आत्मा में एक संकोच- विस्तार शक्ति भी पाई जाती है और इस शक्ति के द्वारा आत्मा संसार परिभ्रमण के क्रम में जिस भी सूक्ष्म- स्थूल शरीर को धारण करता है उसके आकार के अनुसार सहज ही अपने आत्म प्रदेशों का संकुचन या विस्तार कर उस शरीर प्रमाण सहजता से रह लेता है. इस गुण के कारण ही एक आत्मा चींटी के सूक्ष्म शरीर में तथा हाथी के विशाल शरीर में भी व्याप्त होकर रहता है. वही आत्मा मनुष्यों में छोटे शिशु शरीर को धारण कर क्रमिक रूप से विस्तार करता हुआ युवा अवस्था में विशाल देह का स्वामी हो  जाता है.

यह उसी प्रकार है -जैसे एक गिलास पानी तरल रूप में एक गिलास जितना स्थान घेरता है, वही वाष्प बनने पर बहुत अधिक स्थान घेरता है तथा यदि उच्च दाब एवं निम्न ताप पर उसी पानी को ठंडा किया जाए तो एक गिलास की तुलना में बहुत कम स्थान में वह पूरा पानी  ठोस रूप में बदल कर समा जाएगा. इस प्रकार पानी की मात्रा समान होने पर भी भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में पानी द्वारा घेरा जाने वाला क्षेत्र एवं आकार भी भिन्न होता है. उसी प्रकार आत्मा भी भिन्न-भिन्न आकारों वाले शरीर में रहने पर भी उसके प्रदेशों की संख्या समान ही रहती है अर्थात उसका मूल क्षेत्र तो समान ही रहता है.

इस प्रकार संसार दशा में जीव भाग्यवशात उपलब्ध स्वदेह प्रमाण क्षेत्र में रहता है वही जीव आत्म-पुरुषार्थ पूर्वक निज आत्मा की मुक्त  दशा (पूर्ण एवं शुद्ध दशा ) को प्राप्त होता है तो स्वयं ही अंतिम शरीर से कुछ न्यून आकार वाला होकर सिद्धालय में रहता है. इन सारी संसार दशाओं में एवं मुक्त दशा में आत्मा के प्रदेशों की संख्या अपरिवर्तित ही रहती है.

  स्वक्षेत्रत्व (असंख्य प्रदेशत्व) एवं संकोच विस्तार शक्ति को जानने से लाभ :—उक्त सम्पूर्ण विवेचन को जानने से लाभ यह है कि

(1) आत्मा भी एक वास्तविक पदार्थ होने से एक निश्चित क्षेत्र वाली वस्तु है. अतः शरीर का एवं आत्मा का आकार एक समान दिखाई देने पर भी दोनों का आकार एक नहीं होता अलग-अलग होता है .इसप्रकार आत्मा एवं शरीर की भिन्नता का ज्ञान व विश्वास पैदा होता है.

(2) शरीर के स्थूल-सूक्ष्म या छोटे-बड़े रूप-आकार को देख कर स्वयं या अन्य को सबल-निर्बल मानने की भ्रान्ति का निवारण हो जाता है. तथा शरीर के आकारों के आधार से उत्पन्न होने वाले हर्ष-विषाद व अहंकार या दीनता के भाव समाप्त हो जाते हैं.

(3) शरीर के विभिन्न आकारों से निरपेक्ष असंख्य प्रदेशी आत्मा तो छोटा-बड़ा नहीं होता हुआ सदैव ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य आदि अनंत गुणों से युक्त असंख्य प्रदेशी आकार वाला ही रहता है. ऐसा दृढ़ विश्वास उत्पन्न होता है.

(4) फलतः जीव की दृष्टि शरीर के विभिन्न आकारों से हटकर ध्रुव स्वभाव एवं आकार वाले निज ज्ञायक स्वभाव पर स्थिर हो जाती है और वह परम  शांति  का अनुभव करता है.

(8) अमूर्तत्व :—जो वस्तु शरीर के अवयवभूत इन्द्रियों (ज्ञानेन्द्रियों ) के द्वारा जानी जा सके उसे मूर्त या मूर्तिक कहते हैं. सम्पूर्ण शरीरादि दृश्यमान जगत, तरंगें, उर्जा के अनेक प्रकार सब ही मूर्त पदार्थ हैं क्योंकि इनका ज्ञान इन्द्रियों द्वारा हो जाता है. विभिन्न प्रकार की उर्जा  तथा तरंगों का उत्पादक मूर्त पदार्थ होने से एवं मूर्त उपकरणों से इनका ग्रहण होने से ये मूर्तिक ही हैं.

आत्मा अमूर्त पदार्थ है क्योंकि आत्मा को जानने में इन्द्रियाँ सहायक नहीं होतीं. इन्द्रियों से जानने में नहीं आने से ही आत्मा को अतीन्द्रिय तथा इन्द्रियातीत (इन्द्रियों की सामर्थ्य से बाहर) भी कहा जाता है.

संसार दशा में शरीर एवं उसमें होने वाली क्रियाओं से शरीरस्थ आत्मा का ज्ञान हो जाता है अतः इस अपेक्षा आत्मा को कहीं-कहीं मूर्तिक भी कहा गया है, परन्तु यह मात्र संयोगाधीन औपचारिक कथन है. आत्मा तो स्वभावतः अमूर्तिक पदार्थ ही है.

उपसंहार:—इस प्रकार आत्मा के स्वरुप-स्वभाव को स्पष्टतया समझने की दृष्टि से अनंत गुणात्मक शाश्वत आत्म-वस्तु के कुछ मुख्य-मुख्य सामान्य-विशेष गुणों का संक्षिप्त विवेचन किया गया है जो आत्म-जिज्ञासुओं के लिए विशेष उपयोगी है

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सम्पूर्ण जगत  एवं उसके अवयवभूत यह आत्मा अनादि-अनंत, शाश्वत, अनन्तगुण -शक्तियों का स्वामी, सहज अपनी पर्यायों  -दशाओं रूप से परिणमनशील अर्थात अपने कार्य रूप पर्यायों को करने में परद्रव्यों की अपेक्षा रहित स्वाधीन परिपूर्ण पदार्थ है. इसके ज्ञान-सुख एवं अन्य गुणों का स्वरुप इसकी पर पदार्थों से परम निरपेक्षता, पर द्रव्यों की अकिंचित्करता की घोषणा कर आत्मा की परम स्वाधीनता का प्रतिपादन करता है. इस प्रकार पर पदार्थों में होने वाले राग-द्वेष-मोह की निरर्थकता- दुःखमयता बताते हुए सांसारिक दुखों से मुक्ति हेतु निजात्मोन्मुख अनवरत प्रवृति रूप निर्विकल्प शुद्धात्म संवेदनमय  निराकुल सुख-शान्ति का मार्ग प्रशस्त करता है.

अध्याय —5

आत्मा का अनेकांत स्वभाव ;–

पूर्व अध्यायों में आत्मा के सत्स्वभाव का, उसकी अनंत गुणात्मकता एवं परिणमनशीलता, आत्मा के प्रमुख सामान्य एवं विशेष गुणों का विस्तृत विवेचन किया गया है जो आत्मा के सामान्य विशेष स्वभाव को समझने की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है.

इस अध्याय में सभी चेतन-अचेतन द्रव्यों में पाए जाने अनेकांत स्वभाव का संक्षिप्त विवेचन किया जा रहा है जो वस्तु स्वरुप के यथार्थ असंदिग्ध ज्ञान-श्रद्धान के लिए तथा आत्म हितार्थ आत्मा एवं सामान्य वस्तु स्वरुप को समझ कर हेय -उपादेय का एवं आश्रयभूत स्वभाव का निर्णय करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है.

अनेकांत की परिभाषा;–

वस्तु में वस्तुत्व को निपजाने वाली (उत्पन्न करने वाली) परस्पर विरुद्ध दो शक्तियों का एक साथ प्रकाशन (ज्ञान में आना) अनेकांत है.

 हम जानते हैं कि यह विश्व और उसके घटक रूप यह चेतन-अचेतन द्रव्य समुदाय अनादि-अनंत है और इसीलिये यहां न तो किसी नवीन द्रव्य की उत्पत्ति होती है और न ही किसी वर्तमान द्रव्य का नाश ही होता है. अतः ऊपर परिभाषा में प्रयुक्त ‘निपजाना’ शब्द का अर्थ बनाये रखना या धारण करना समझना चाहिए, अर्थात प्रत्येक वस्तु में परस्पर विरुद्ध शक्तियां युग्म रूप में स्वभावतः पाई जाती हैं, जो वस्तु में वस्तुत्व को (वस्तुपने को) बनाये रखती हैं. वस्तु के स्वभाव से ही ये शक्तियां सहज व्यक्त होती हैं.

अनेकांत शब्द की व्याख्या;–

  • अनेकांत =अनेक +अंत , अथवा अन+एक +अंत 

अनेक अर्थात एक नहीं, एक से अधिक अर्थात अनंत

अंत अर्थात गुण, धर्म, शक्तियां, योग्यता आदि स्वभाव

इस अर्थ के अनुसार प्रत्येक द्रव्य में अनंत गुण, धर्म, शक्तियां स्वभाव रूप से पाई जाती हैं .

तथा अनेकांत =अन् + एकांत, अन् अर्थात नहीं है , एकांत अर्थात एक धर्म -पक्ष -पहलू -दृष्टिकोण .

इसका अर्थ हुआ –वस्तु में मात्र एक धर्म -पक्ष – पहलू या दृष्टिकोण ही नहीं होता वरन अनंत गुण पर्याय स्वभावात्मक वस्तु को एक -एक गुण पर्याय स्वभाव की तरफ से देखने पर वस्तु को देखने के अनेक दृष्टिकोण या पक्ष ज्ञान में उत्पन्न होते हैं .  जब एक पक्ष से वस्तु के स्वरुप को देखा या विचारा जाता है तो वह पक्ष मुख्य हो जाता है तथा अन्य सभी पक्ष उस दृष्टिकोण में गौण हो जाते हैं. परन्तु जब एक पक्ष को ज्ञान- विचार या कथन में मुख्य करके अन्य पक्षों को गौण किया जाता है तब भी ज्ञान में उन पक्षों की वस्तुस्वभाव में स्वीकृति सदा विद्यमान रहती है और रहनी भी चाहिए क्योंकि गौण किये गए पक्ष से सम्बंधित गुण -धर्म वस्तु स्वभाव के ही अंश हैं.

अनेकांत का शाब्दिक अर्थ समझने के बाद यह जानना उपयोगी रहेगा कि अनेकांत की परिभाषा में जिन परस्पर विरुद्ध दो धर्मों की चर्चा की गई है, वे कैसी हैं  कि जो वस्तु के स्वरुप को उत्पन्न करती हैं या धारण करती हैं.

आत्मा में परस्पर विरुद्ध शक्तियों का अस्तित्व — पूर्व अध्यायों में विवेचित आत्मा के सामान्य- विशेष द्रव्य -गुण पर्याय स्वभाव को यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो उसमें अनेक परस्पर विरुद्ध स्वभाव सहज ही दृष्टि का विषय बनते हैं , इन्हीं परस्पर विरुद्ध दो स्वभावों   का एक साथ प्रकाशन (ज्ञान ) अनेकांत स्वभाव कहलाता है.जैसे ;–

“पर्याय दृष्टि से (पर्याय की मुख्यता से ) देखने पर आत्मा अनेक रूप दिखाई देता है और द्रव्य दृष्टि से (द्रव्य की मुख्यता से) देखने पर एक रूप; क्रमभावी (क्रमशः होने वाली )पर्याय दृष्टि से देखने पर क्षणभंगुर दिखाई देता है और सहभावी (एक साथ रहने वाले ) गुणदृष्टि से देखने पर ध्रुव ; ज्ञान की अपेक्षा वाली सर्वगत दृष्टि (स्व -पर प्रकाशक स्वभाव की दृष्टि )से देखने पर परम विस्तार को प्राप्त दिखाई देता है और प्रदेशों की अपेक्षा वाली दृष्टि से देखने पर अपने आत्म प्रदेशों में ही दिखाई देता है . आत्म तत्त्व अनेक शक्तियों वाला होने से कभी तो वह अनेकाकार -अशुद्ध अनुभव में आता है, कभी एकाकार शुद्ध दिखाई देता है . एक ओर से देखने पर तीनों लोक स्फुरायमान होते हैं (दिखाई देते हैं) और एक ओर से देखने पर केवल एक चैतन्य ही शोभित होता है . एक ओर से देखने पर कषायों का क्लेश दिखाई देता है और एक ओर से देखने पर शान्ति (कषायों के अभाव रूप शांत भाव) है ;एक ओर से देखने पर भव की पीड़ा दिखाई देती है और एक ओर से देखने पर मुक्ति भी स्पर्श करती है.”(सन्दर्भ -श्री समयसार परमागम, आत्म ख्याति कलश 272,273,274)

उक्त अवतरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है किआत्मा एक ही साथ अनेक परस्पर विरोधी स्वभावों का धारक है. इस के आधार से ज्ञात आत्मा में परस्पर विरोधी धर्म युगल निम्न हैं ;–(1)एक -अनेक ,(2)नित्य -अनित्य , (3)आत्मगत -सर्व गत,(4)शुद्ध -अशुद्ध , (5)संसार -मोक्ष ,(6)तत् -अतत् , (7) अस्ति -नास्ति आदि .

इसी प्रकार आत्मा में अनंत धर्म -युगल पाए जाते हैं,  इन्हें धर्म कहने का कारण यह है कि ये धर्म वस्तु स्वभाव को धारण करते हैं (यः धरति इति धर्मः अर्थात जो धारण करता है वह धर्म है). यदि एक भी धर्म को अस्वीकार किया जाए तो वस्तु का अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता,  फलतः वस्तुओं के अभाव का प्रसंग बनता है . परन्तु वस्तु सत्ता स्वरुप -सत्स्वभावमय होने से कभी नष्ट नहीं होती . इससे यह सिद्ध हो जाता है कि ये धर्म युगल रूप में ही वस्तु के स्वभाव रूप से सदा विद्यमान रहते हैं.  ये परस्पर विरुद्ध धर्म ही अनेकांत स्वभाव कहे जाते हैं  .

आत्मा में परस्पर विरुद्ध धर्मों की सिद्धि :–हमने यह देखा है कि आत्मा के स्वरुप का सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर उसमें अनेक परस्पर विरुद्ध स्वभाव दृष्टिगोचर होते हैं , तो आत्मा में परस्पर विरुद्ध स्वभाव वाले अंश और उन अंशों के परस्पर विरुद्ध स्वभावों का नियमन करने वाली शक्तियां भी आत्मा में ही होना चाहिए . जैसे आत्मा का अनंत गुणमय स्वभाव नित्य है तथा पर्यायों का अनित्य स्वभाव है ; तो फिर अनन्तगुणात्मक द्रव्य स्वभाव के नित्यत्व का नियामक कारण भी आत्मा में ही होना चाहिए , उसे ही आत्मा का नित्य धर्म कहते हैं. इसीप्रकार पर्याय के अनित्य स्वभाव के नियामक कारण रूप अनित्य धर्म की भी सिद्धि हो जाती है .  इसी प्रकार अन्य धर्म युगल जैसे एक -अनेक , अस्ति -नास्ति , तत् -अतत् , शुद्ध -अशुद्ध आदि की भी सिद्धि की जा सकती है .

परस्पर विरुद्ध धर्मों से वस्तु के वस्तुत्व की निष्पत्ति :–अनेकांत की परिभाषा में कहा गया ‘वस्तु में वस्तुत्व का निष्पादन ‘ परस्पर विरुद्ध धर्मों द्वारा किस प्रकार संभव होता है यह समझना बहुत रुचिकर होगा. जैसे विश्व में ‘जन्म एवं मृत्यु’ ये परस्पर विरुद्ध धर्म निरंतर क्रियाशील रहते हैं . हम कल्पना करें कि यदि इनमें से एक धर्म मात्र जन्म या मृत्यु ही हो तो क्या इस विश्व का अस्तित्व रह पायेगा ?स्पष्ट ही नहीं रह पायेगा . इसीप्रकार विश्व की आर्थिक गतिविधियों में उत्पादन एवं उपभोग परस्पर विरुद्ध हैं अथवा आय एवं व्यय हैं.  यदि इनमें से केवल एक कार्य हो और दूसरा न हो तो विश्व की एक भी आर्थिक क्रिया का संचालन संभव नहीं होगा और विश्व की अर्थ व्यवस्था नष्ट हो जावेगी . इसीप्रकार यदि भारत में मात्र केंद्रीय सत्ता हो और राज्य न हों अथवा मात्र राज्य हों परन्तु केंद्रीय सत्ता न हो तो भारत का एक अखंड राष्ट्र के रूप में अस्तित्व असंभव ही है . शरीर में भोजन का ग्रहण तो हो परन्तु उत्सर्जन न हो अथवा मात्र उत्सर्जन हो और ग्रहण न हो तो क्या किसी प्राणी के अस्तित्व की कल्पना की जा सकती है ? निश्चय ही नहीं की जा सकती . इससे सिद्ध होता है कि उक्त सभी विश्व केअर्थव्यवस्था के अथवा शरीर के परस्पर विरोधी धर्म उन सबके अस्तित्व की गारंटी हैं ;  एक भी धर्म का अभाव होने पर इनका अस्तित्व असंभव है .

इसी प्रकार वस्तु में भी एक -अनेक, नित्य -अनित्य .अस्ति -नास्ति आदि अनेक परस्पर विरुद्ध धर्म वस्तु में वस्तुत्व को बनाये रखने के लिए अनिवार्य हैं .इनमें से एक भी धर्म का अभाव होने पर सम्पूर्ण वस्तु के ही नष्ट होने का प्रसंग आता है . अनेकांत के परस्पर विरुद्ध धर्मों की विशेषताएं :–

गुण-पर्यायों के समान ही द्रव्य में पाए जाने वाले परस्पर विरुद्ध धर्मों की भी अनेक विशेषताएं हैं जो निम्न प्रकार हैं :—

(1)ये धर्म परस्पर विरुद्ध धर्मों के जोड़े के रूप में वस्तु में अविरोध रूप से रहते हैं जैसे अस्ति -नास्ति धर्म , नित्य -अनित्य धर्म आदि. इन धर्मों का स्वभाव परस्पर विरुद्ध है परन्तु वस्तु में एक साथ रहने में कोई विरोध नहीं होता .

(2) सामान्य -विशेष गुणों के समान ही धर्म भी अनंत होते हैं.

(3)गुणों के विपरीत धर्मों में कोई परिणमन नहीं होता .

(४ सामान्य – विशेष गुणों के समान ही धर्म भी वस्तु का शाश्वत स्वभाव हैं (कुछ पर्याय सम्बन्धी धर्म अपवाद हैं ).

(5) सारे ही गुण -धर्म वस्तु में सहभावी रूप से रहने से नित्य होतें हैं, परन्तु कुछ पर्याय सम्बन्धी धर्म अनित्य भी होते हैं जैसे संसार दशा में पाए जाने वाले विकार रूप राग -द्वेषादि धर्म (शुद्ध -अशुद्ध धर्म युगल में अशुद्ध धर्म ). मुक्ति की दशा में आत्मा के सर्व विकारों का अभाव हो जाने से अशुद्ध धर्म रूप रागादि विभाव स्वभाव भी नष्ट हो जाते हैं. वहां मात्र शुद्ध धर्म स्वभाव ही रह जाता है फलतः आत्म द्रव्य -गुण -पर्याय तीनों रूप से शुद्ध प्रगट हो  जाता है .

(6)धर्म वस्तु स्वभाव की मर्यादा स्थापित करते हैं और उस मर्यादा में रह कर ही वस्तु के अनंत सामान्य – विशेष गुणों का क्रमिक परिणमन एवं वस्तु का अस्तित्व कायम रहता है .

(७) ये धर्म वस्तु में ही वस्तु स्वभाव के लिए मर्यादा , क़ानून , नीति या नियम की तरह होते हैं और वस्तु स्वभाव (शाश्वत एवं पर्याय स्वभाव ) कभी भी धर्मों द्वारा स्थापित मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता.

(८) जिस प्रकार समाज या राष्ट्र में अच्छे क़ानून-नीति या नियम कभी भी नहीं बदलते, उसी प्रकार धर्मो  द्वारा स्थापित मर्यादा भी कभी बदलती नहीं है. इसीलिए धर्मों का परिणमन भी नहीं होता .

(9)वस्तु एवं उसका स्वभाव शाश्वत एवं पूर्ण होने से किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रखता परन्तु परस्पर विरुद्ध धर्मों के अनुसार उस वस्तु का कथन करने की पद्धति सापेक्ष होती है जिसे स्याद्वाद कहा जाता है. स्याद्वाद अर्थात किसी अपेक्षा से कथन करना.

परस्पर विरुद्ध धर्मों द्वारा स्थापित वस्तु स्वभाव की मर्यादा एवं उनकी अपरिणमनशीलता :—

हम जानते हैं कि प्रत्येक सुस्थापित राष्ट्र -राज्य का एक सुविचारित संविधान होता है तथा तदनुसार अनेक सुदृढ़ कानून -नियम -नीतियां या परम्पराएं आदि होते हैं जो विधि -निषेध रूप होते हैं तथा नागरिकों के कार्य- व्यवहार को नियमित, नियंत्रित एवं निर्देशित करते हैं . नागरिक उन कानूनों – नियमों का पालन करते हुए अर्थात कानून द्वारा स्थापित मर्यादा का उल्लंघन न करते हुए अपनी योग्यता एवं सामर्थ्य अनुसार अपना कार्य करने हेतु पूर्ण स्वतंत्र होते हैं. उन नियमों के सम्यक् अनुपालन पूर्वक ही उस राष्ट्र का अस्तित्व सहजपने  बना रहता है . स्थापित नियमों के अनुसार कार्य करते हुए भी व्यक्तियों का दैनंदिन कार्य -व्यवसाय निरंतर बदलता रहता है परन्तु वे श्रेष्ठ नीतियां -नियम अथवा कानून कभी नहीं बदलते. वास्तविकता यह है कि कानून के अनुसार कार्य व्यवस्था सदैव निराबाध चलती रहती है परन्तु कानून कभी कोई काम नहीं करता. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वहां कानून का अस्तित्व ही नहीं है. कानून का अस्तित्व तो सदैव बना रहता है लेकिन एक बार कानून के अनुसार व्यवस्था स्थापित हो जाने के बाद वह शांत रूप से देश में ही रहता है , वह कहीं चला नहीं जाता . वह उस व्यवस्था में ही शक्ति रूप से विद्यमान रहता है .

 बिलकुल इसी प्रकार विश्व के प्रत्येक चेतन -अचेतन पदार्थ में भी ये परस्पर विरुद्ध धर्म नियामक स्वभाव के रूप में निरंतर विद्यमान रहते हैं और इन धर्मों द्वारा स्थापित मर्यादा -सीमा में रहते हुए प्रत्येक द्रव्य , उसके अनंत सहभावी गुण एवं क्रमभावी पर्यायों का सहज अस्तित्व निरंतर बना रहता है .

यह अस्ति -नास्ति, नित्य -अनित्य ,एक -अनेक आदि धर्मों द्वारा स्थापित मर्यादा ही तो है कि पदार्थ सदैव अपने स्वचतुष्टय रूप (स्व द्रव्य -क्षेत्र -काल -भाव रूप )अस्तित्व में निरंतर विद्यमान रहता है तथापि अनंत पर पदार्थों के बीच  रहते हुए भी कभी भी परचतुष्टय रूप (पर द्रव्य -क्षेत्र -काल -भाव रूप ) से नहीं रहता (अस्ति -नास्ति धर्म ), उसका अनंत गुणमय द्रव्यांश सदैव ध्रुव -नित्य विद्यमान रहता है तथा पर्यायांश एक समय मात्र रह कर विलीन हो जाता है (नित्य -अनित्य धर्म ), अनंत गुण पर्यायों का समुदाय होने पर भी वह एक अखंड द्रव्यपने से रहता हुआ अपने एकत्व से कभी च्युत नहीं होता तथापि एक अभेद- अखंड  द्रव्य रूप में रहते हुए भी अनंत गुण पर्यायों का अस्तित्व कभी खंडित न होने से उसका अनेकत्व सदैव ही प्रकाशित रहता है (एक -अनेक धर्म ).

इसीप्रकार पर्यायों में अनेक प्रकार का अशुद्ध परिणमन होते रहने पर भी वस्तु का ध्रुव अंश (अनंत गुणमय द्रव्य ) कभी भी अशुद्ध नहीं होता , वह सदैव शुद्ध ही रहता है (शुद्ध -अशुद्ध धर्म ), ज्ञान अनेक ज्ञेयों को, लोकालोक को जानता हुआ भी उन ज्ञेयों रूप कभी नहीं होता , वह तो सदैव सहज ज्ञान स्वभाव रूप से ही विद्यमान रहता है (तत् -अतत् धर्म ).

इससे स्पष्ट हो जाता है कि धर्म वस्तु में स्वभाव रूप से सदैव विद्यमान रहते हैं, वे अपरिणामी होते  हैं लेकिन उनके द्वारा स्थापित सीमाओं में रहते हुए द्रव्य का सक्रिय अस्तित्व निरंतर बना रहता हैं.

 अस्ति –नास्ति धर्म पर विशेष स्पष्टीकरण :– अस्ति -नास्ति धर्म के विवेचन में समागत स्व एवं पर चतुष्टय का स्वरुप इस  प्रकार है —

स्व चतुष्टय –स्व द्रव्य -क्षेत्र -काल -भाव को स्वचतुष्टय कहते हैं.

१–स्व द्रव्य —पदार्थ जिस वस्तु से बना है वह उसका स्व द्रव्य है .

२–स्व क्षेत्र —पदार्थ या उसके प्रदेशों का विस्तार जितने क्षेत्र में होता है वह उसका स्व क्षेत्र है .

३–स्व काल —पदार्थ की वर्तमान अवस्था (पर्याय) वह उसका स्व काल है .

४–स्व भाव —पदार्थ की शक्तियां -गुण आदि उसका स्व भाव हैं .

पर द्रव्यों के द्रव्य -क्षेत्र -काल -भाव को पर चतुष्टय कहते हैं .

 पदार्थ की कार्योत्पादक शक्तियां उसकी अपनी होती हैं और वह उन शक्तियों के आधार से ही स्वकाल अर्थात स्वकार्य की उत्पत्ति करता है . इस प्रकार स्व द्रव्य -क्षेत्र -काल- भाव वस्तु की संपत्ति है, वस्तु का जितना कुछ है वह स्व चतुष्टय में गर्भित है .

अस्ति धर्म वस्तु की संपत्ति की अंतरंग व्यवस्था करता है उसी समय नास्ति धर्म वस्तु को पर द्रव्य के द्रव्य -क्षेत्र -काल भाव रूप नहीं होने देता .

  धर्मों का परिणमन स्वीकार करने पर दोष :–जैसे अस्ति -नास्ति धर्म को लें तो यहां या तो अस्ति है या नास्ति है इन दोनों के बीच की कोई स्थिति द्रव्य में नहीं है . जैसे द्रव्य एवं गुणों की पर्यायों में हीनाधिकता रूप तारतम्य पाया जाता है  वैसा यहां नहीं है. अतः यदि अस्ति धर्म का परिणमन हो तो वह नास्ति रूप ही होगा , बीच की कोई स्थिति संभव नहीं है ; तो ऐसा मानने पर द्रव्य के स्वचतुष्टय रूप से अस्तित्व का अभाव होगा तथा मात्र नास्ति धर्म होने से द्रव्य का परचतुष्टय से तो अभाव है ही ,अतः वस्तु ही नहीं रहेगी .इसी प्रकार यदि नास्ति धर्म का परिणमन हो तो वह अस्ति रूप ही होगा तो वस्तु स्वचतुष्टय के समान ही परचतुष्टय रूप से भी अस्तित्वमय होगी परन्तु ऐसा होना असंभव है , अतः पुनः वस्तु के नाश का प्रसंग आता है . इसीप्रकार अन्य धर्मों के सम्बन्ध में भी समझा जा सकता है.

अनेकान्तात्मक (परस्पर विरुद्ध धर्मात्मक) वस्तु स्वरुप का कथन करने की पद्धति :–

ऊपर यह सिद्ध हो चुका है कि विश्व का प्रत्येक पदार्थ अनंत धर्मात्मक है . स्याद्वाद उस अनंत धर्मात्मक वस्तु का कथन करने की निर्दोष पद्धति है .

स्याद्वाद =स्यात्+वाद ,  स्यात् अर्थात किसी सुनिश्चित अपेक्षा से , वाद अर्थात कथन  करना .

अतः अनंत धर्मात्मक वस्तु का किसी एक सुनिश्चित अपेक्षा से कथन करना स्याद्वाद है .दूसरे शब्दों में अनेकांत स्वरुप वस्तु का उस वस्तु की व्यवस्था (संरचना ) के अनुरूप कथन करना स्याद्वाद है.

वस्तु अनंत धर्मात्मक है और उस वस्तु का शब्दों द्वारा एक साथ कथन करना संभव नहीं होता क्योंकि शब्दों की शक्ति सीमित है , शब्दों द्वारा क्रमिक रूप से ही कथन किया जा सकता है .इस प्रकार कथन करते समय सहज ही एक धर्म की मुख्यता हो जाती है परन्तु उस समय ज्ञान में अन्य धर्मों की अस्वीकृति नहीं होती . अतः वे धर्म ज्ञान में रहते हुए भी कथन में गौण हो जाते हैं .

वास्तव में तो स्याद्वाद में प्रयोजन की मुख्यता होती है. जिस समय किसी एक धर्म की मुख्यता से कथन करना हो , वस्तु का ज्ञान कराना हो तो उस धर्म की मुख्यता से ही कथन किया जाता है और अन्य धर्म वहां गौण हो जाते हैं . जैसे वस्तु की एकता अखण्डता को बताने के लिए एक नामक धर्म की मुख्यता से वस्तु को एक कहा जाता है परन्तु वहां वस्तु के अनंत गुण- पर्याय रूप अनेकत्व से इंकार नहीं है क्योंकि वस्तु एक नामक धर्म की अपेक्षा एक है सर्वथा एक नहीं है . उसी समय उसमें अनेक गुण- पर्यायों की विद्यमानता होने से अनेक नामक धर्म की अपेक्षा वह अनेकरूप भी है . इस प्रकार समग्र रूप से -अनेकांत दृष्टि से कहें तो वस्तु एक साथ ही एक -अनेक रूप है या वस्तु एक भी है और अनेक भी है . अखंड -अभेद द्रव्य की अपेक्षा वस्तु एक ही है और अनंत गुण -पर्यायों की अपेक्षा देखने पर अनेक ही  है.

भी ‘ और ‘ही ‘ का प्रयोग —-उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जब दोनों धर्मों का कथन एक साथ किया जाता है तो ‘भी ‘ का प्रयोग किया जाता है जैसे नित्य -अनित्य धर्म के सन्दर्भ में –वस्तु एक ही समय में नित्य भी है और अनित्य भी है .; तथा पृथक -पृथक धर्मों की अपेक्षा कथन करने पर ‘ही ‘ का प्रयोग किया जाता है जैसे वस्तु द्रव्य स्वभाव की अपेक्षा नित्य ही है तथा पर्याय स्वभाव की अपेक्षा अनित्य ही है .

 उपसंहार :—-इसप्रकार हमने देखा कि परस्पर विरुद्ध धर्मात्मक अनेकांत स्वभाव वस्तु  के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए , उसके सुनिश्चित अस्तित्व एवं स्वतंत्र क्रियाशीलता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं. वस्तु में दिखाई देने वाली अनेक विचित्रताओं -विरुद्धताओं का स्पष्टीकरण अनेकांत स्वभाव के यथार्थ ज्ञान के बिना संभव नहीं है . ये अस्ति -नास्ति आदि धर्म वस्तु  को  देखने के लिए विभिन्न दृष्टिकोण ही उपलब्ध नहीं कराते बल्कि ये वस्तु में स्वभाव रूप से रहते हुए पदार्थों के मध्य कल्पित उपकार या अपकार रूप पारस्परिक हस्तक्षेप की मिथ्या धारणाओं एवं आशंकाओं को भी निरस्त कर देते हैं .

वास्तव में तो जिस प्रकार सुदृढ़ एवं औचित्यपूर्ण  कानून व्यवस्था किसी राष्ट्र – राज्य के सुनिश्चित एवं सुरक्षित अस्तित्व एवं उसकी स्वतंत्रता , शक्ति एवं सम्पन्नता का असंदिग्ध परिचायक होती है उसीप्रकार ये अनेकांत स्वभाव रूप धर्म प्रत्येक वस्तु के स्वतंत्र -सुनिश्चित -शक्ति एवं वैभव संपन्न अस्तित्व को सुनिश्चित करते हैं एवं उस अस्तित्व के परिचायक भी हैं .

 इसीप्रकार स्याद्वाद अनेकांतात्मक वस्तु का कथन करने की निर्दोष एवं वैज्ञानिक पद्धति है . इसमें प्रयोजन के अनुसार किसी एक धर्म को मुख्य करके वस्तु के सम्बन्ध में कथन किया जाता है. तब उसी समय अन्य सारे धर्म ज्ञान में गौण रूप से स्वीकार होते  हैं वस्तु सदैव निरपेक्ष होती है अर्थात वस्तु के अपने अस्तित्व, स्वभाव  एवं कार्य के लिए अन्य कोई कारण नहीं होता है , वस्तु स्वयं से ही वैसी  होती है . परन्तु कथन सदैव सापेक्ष होता है क्योंकि अनंत धर्म स्वभाव युक्त वस्तु का कथन एक साथ किया जाना असंभव होने से प्रसंगानुसार प्रयोजनभूत एक -एक धर्म की अपेक्षा कथन करना वक्ता की बाध्यता होती है . यदि किये गए कथन में अपेक्षा प्रगट नहीं होती तो भी कथन तो सापेक्ष ही होता है , उपयुक्त अपेक्षा कथन में छिपी हुई होती ही है .

आत्मा के अनेकांत स्वभाव के ज्ञान  कीजीवन में उपयोगिता :–

 (1) प्रत्येक वस्तु एवं आत्मा में विद्यमान परस्पर विरुद्ध अनंत धर्मों का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर आत्मा में पाई जाने वाली अनेक विरुद्धताओं सम्बन्धी प्रश्नों का सहज ही समाधान हो जाता है तथा तत्सम्बन्धी एकांतिक मान्यताओं का निवारण हो जाने से आत्मा के पूर्ण स्वरुप का ज्ञान उदित होता है.

(2) आत्मा में स्वभावगतअनेक विचित्रताओं का ज्ञान हो जाने से आत्म स्वभाव की विलक्षणता एवं परिपूर्णता की महिमा आती है तथा ऐसा विलक्षण स्वभावों का धनी मैं आत्मा हूँ ऐसे आत्म गौरव का जन्म होता है.

(3) अनेकांत स्वभाव का ज्ञान हो जाने से जगत के सारे ही पदार्थ परिपूर्ण एवं स्वतंत्र निश्चित होने से सर्व प्रकार की पराधीनताओं का अंत हो जाता है तथा आत्मा में अपूर्व निर्भयता का जन्म होता है.

(4) अनेकांत सिद्धांत सारे ही पदार्थों को अपनी स्वरुप सीमा में मर्यादित एवं प्रतिष्ठित कर देता है, अतः अभाव एवं अतिरेक की काल्पनिक मान्यताओं से उत्पन्न परस्पर सहयोग एवं हस्तक्षेप के लोभ एवं भय का समूल नाश होकर व्यक्ति सर्वप्रकार से निश्चिन्त होता हुआ  स्वावलम्बी जीवन की ओर अग्रसर होता है.

(5) अनेकांत एवं स्याद्वाद शैली का ज्ञान हो जाने से लौकिक जनों  द्वारा किये जाने वाले विभिन्न एकांतिक मान्यतापरक कथनों से व्यक्ति भ्रमित नहीं होता तथा ऐसे कथनों को सही परिप्रेक्ष्य  में समझने में समर्थ होता है. वह वस्तु स्वरुप का यथार्थ विवेचन करने की सामर्थ्य से  भी संपन्न हो जाता है.

(6) प्रत्येक द्रव्य के परिपूर्ण, स्वतंत्र एवं सक्रियअस्तित्व का बोध हो जाने से पारस्परिक औपचारिक कार्य कारण संबंधों की निरर्थकता भासित होने लगती है अतः परलक्षी प्रवृत्ति का क्रमशः अभाव होकर आत्मनिष्ठ आत्मोन्मुख प्रवृत्ति का सहज ही उदय होने लगता है. फलतः व्यक्ति अपने आत्माश्रित अतीन्द्रिय आनंद का रसास्वादन करने में समर्थ होता हुआ मुक्ति के मार्ग पर सहज ही अग्रसर हो जाता है. यही अनेकांत स्वभाव के ज्ञान की सर्वोपरि सर्वमहान उपयोगिता है.

लौकिक एवं पारलौकिक जीवन में चारित्र:—-हमने देखा है कि ज्ञानपूर्वक श्रद्धा एवं श्रद्धापूर्वक चारित्र होता है. यथार्थ ज्ञान सर्व समस्याओं का समाधान कारक है तथा श्रद्धा धर्म का-मोक्षमार्ग का, सुख के लिए अथवा तो सुख के साधनों की उपलब्धि के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों का आधार  है. परन्तु सुख की उपलब्धि का मूल साधन हितकर-सुखकर साधनों की प्राप्ति एवं अनुभूति के लिए तथा अहितकर पदार्थों व कारणों के निवारण हेतु किये जाने वाले प्रयत्न ही हैं. इसप्रकार सुख की उपलब्धि का वास्तविक साधन प्रयत्नरूप आचरण या चारित्र ही सिद्ध होता है चाहे वह लौकिक सुख हो या पारलौकिक-आत्मिक सुख हो.

लौकिक जीवन में चारित्र:—लौकिक सुख से यहाँ तात्पर्य केवल व्यक्तिगत, शारीरिक इन्द्रियों के विषय सेवन जनित सुख से  ही नहीं है बल्कि परिवार, समाज एवं राष्ट्र में शांति-सहयोग-सद्भाव एवं प्रेमपूर्ण वातावरण से भी है जो कि वहां के व्यक्तियों के शिष्टाचार एवं सदाचार का प्रतिफल होता है.

शिष्ट अर्थात सभ्य- विद्वान् व्यक्ति, अतः शिष्टाचार का अर्थ हुआ–सभ्य -विद्वान् व्यक्तियों  द्वारा किया जाने वाला आचरण. इस प्रकार देखा जाये तो शिष्टाचार का क्षेत्र बहुत व्यापक है परन्तु सामान्यतया शिष्टाचार से तात्पर्य –परिवार एवं समाज के विभिन्न घटकों, पूज्य पुरुषों एवं सामान्य व्यक्तियों के प्रति उनके पद-दायित्व, आयु-विद्या आदि के अनुरूप यथायोग्य सम्मान, विनय, प्रेम एवं स्नेह पूर्ण व्यवहार से लिया जाता है. साथ ही दैनिक जीवन में उपयोगी महत्वपूर्ण वस्तुओं के प्रति समुचित व्यवहार भी शिष्टाचार में गर्भित है.

दूसरी ओर सदाचार का सम्बन्ध व्यक्तिगत जीवन में न्याय-नीति पूर्वक आदर्शनिष्ठ यथासंभव अहिंसक एवं सादगीपूर्ण सरल जीवनयापन की प्रवृत्ति से है. सदाचारी पुरुष राज्य-नीति, लोक-नीति एवं धर्म-नीति के विरुद्ध किसी भी प्रकार के कार्यों से स्वयं को दूर ही रखता है. सदाचार के अंतर्गत आने वाले आचरण के प्रमुख बिंदु निम्न प्रकार हो सकते हैं :—

(1) अन्याय एवं अनीति पूर्ण, कानून विरुद्ध एवं लोक निंद्य कार्यों से दूर रहना.

(2) स्थूल पांच पाप -हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील सेवन (अब्रह्म) एवं अति परिग्रह रूप कार्यों से रहित जीवन शैली.

(3) मद्य-मांस-मधु एवं पांच प्रकार के क्षीरी वृक्षों के त्रस (चलते-फिरते) जीवों से परिपूर्ण फलों का सेवन नहीं करना (क्षीरी वृक्ष –बरगद, पीपल, ऊमर, कठूमर एवं पाकर), इन फलों को खाने में  चलते-फिरते जीवों का घात होने से प्रचुर हिंसा का दोष लगता है.

(4) सप्त व्यसन (जुआ खेलना, चोरी करना, शराब या नशे का सेवन, मांस भक्षण, शिकार करना, परस्त्री सेवन एवं वैश्या गमन) का त्याग. ये लोक निंद्य पापपूर्ण प्रवृत्तियां हैं.

(5) लौकिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता होने पर भी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं वनस्पति का यथासंभव मितव्ययता पूर्ण प्रयोग; क्योंकि इनके आश्रय से पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक एवं वनस्पतिकायिक अर्थात इनको अपने शरीर रूप से धारण करके रहने वाले एकेन्द्रिय (मात्र स्पर्शन इन्द्रिय वाले) असंख्य जीव रहते हैं, साथ ही इनमें अन्य चलते-फिरते सूक्ष्म-स्थूल जीव भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.अतः उन समस्त जीवों की रक्षा की भावना से सदाचारी व्यक्ति इनका न्यूनतम उपयोग करते हैं, अनावश्यक उपयोग तो कदापि नहीं करते.

(6) दीन-दुखी-निर्धन एवं रोगी व्यक्तियों एवं प्राणियों के प्रति दया का भाव एवं उनके कष्ट निवारण के प्रति तत्परता.

(7) अपने प्रति अपराध एवं अहित करने वालों के प्रति भी क्षमा एवं उदारता रूप वर्तन.

(8) कुमार्ग पर चलने वाले लोगों को उपदेश देकर सन्मार्ग पर लाने हेतु प्रयत्नशीलता, परन्तु न सुधरने पर उनकी होनहार जान कर उदासीन-द्वेषरहित प्रवृत्ति.

(9) पांचों इन्द्रियों (स्पर्शन, रसना, नासिका, नेत्र एवं कर्ण) के विषय सेवन काल में अति आसक्ति रहित वर्तन, इष्ट इन्द्रिय विषयों के प्रति भी गृद्धता- तीव्र लालसा न रखना.

(10) न्याय नीति पूर्वक उपलब्ध भाग्य प्रमाण आजीविका एवं भोग सामग्री में संतुष्ट रहना, अनावश्यक धनार्जन न करना, न ही इस हेतु राज्य एवं लोक नीति का उल्लंघन करना.

(11) सच्चे वीतरागी देव -शास्त्र- गुरु  के प्रति भक्ति युक्त होकर आत्म हितार्थ धर्म मार्ग पर चलने के लिए उत्साह एवं पुरुषार्थ युक्त होना.

(12) अपने एवं अन्य के सदगुणों को बढ़ाने एवं अवगुणों को घटाने के लिए नित्य जाग्रति एवं सचेष्ट रहना.

(13)विचारों में अनेकांत, व्यवहार  में अहिंसा एवं अपरिग्रह युक्त जीवन शैली को अपनाना.

(14) शरीर एवं अन्य संयोग जीव के पूर्व कृत पाप-पुण्य भावों के फलानुसार होते हैं, सुख-दुःख कषाय (क्रोध-मान-माया- लोभ) अथवा राग-द्वेष की मंदता एवं तीव्रता के अनुसार  होते हैं. धर्म (चारित्र) जीव के पुरुषार्थ के अनुसार होता है, धर्म ही वास्तविक निराकुल सुख का आधार है अतः सदाचारी व्यक्ति जीवन में चारित्र रूप धर्म साधन हेतु सदैव तत्पर रहता है. ये धर्म साधन के लिए किये जाने वाले प्रयत्न सदाचार ही हैं.

ऐसे ही अन्य अनेक प्रकार के आचार-विचार- व्यवहार लौकिक सदाचार रूप आचरण में गर्भित किये जा सकते हैं. ये सर्व आचरण निज आत्मा से भिन्न अन्य व्यक्ति एवं वस्तुओं से सम्बंधित होने से पराधीन तथापि मंद कषाय रूप प्रवृत्तियां हैं अतः शुभाचार रूप हैं. कषायों की तीव्रता की दशा में सदाचार व शिष्टाचार का स्थान  स्वछंदता एवं अशिष्टता ले लेती है जो अशुभाचार रूप (पापरूप) है तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में आकुलता (दुःख) का कारण बनती है.

जिस व्यक्ति के जीवन में यथार्थ धर्म का प्रादुर्भाव हो जाता है उसकी इन्द्रिय विषयों, कषायों एवं पापों में प्रवृत्ति निरंतर घटती जाती है और सर्व ही सदाचार एवं शिष्टाचार उसके जीवन में सहज ही प्रतिष्ठित हो जाते हैं तथा यथाशक्ति व्रत-जप-तप-संयम-इन्द्रिय निग्रह सहज ही पलने लगते हैं. ऐसे सत्पुरुषों का जीवन उत्कृष्ट आचरण के निमित्त से सहज ही आनंदमय होता है, साथ ही वे अपने आचरण से अन्य लोगों के लिए भी आदर्श रूप होते हुए उच्च आचार-विचार हेतु  प्रेरणा स्रोत होते हैं. इससे परिवार-समाज एवं राष्ट्र में भी सुख-शांति-सद्भाव एवं सहयोग का वातावरण निर्मित होता है. ऐसे ही व्यक्ति अपनी धर्म भावना के बल से पारलौकिक- आत्मिक निराकुल अतीन्द्रिय सुख को भी उपलब्ध कर अपने मानव जीवन को सार्थक करते हैं. 

अध्याय —6

संसार का स्वरुप

पिछले अध्यायों में हमने आत्मा के अस्तित्व, उसके सामान्य-विशेष गुण और अनेकांत स्वभाव का विस्तृत अध्ययन किया है और यह भी जाना है कि आत्मा के अस्तित्व एवं स्वभावों का यथार्थ ज्ञान ही संसारी जीवों के सुखी होने का मार्ग प्रशस्त करता है. यह मार्ग आत्मा एवं अन्य पदार्थों के सर्वांग स्वरुप (द्रव्य-गुण-पर्याय स्वभाव) के सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान एवं सम्यक् चारित्र रूप है. जिसे मोक्षमार्ग भी कहा गया है. यही मोक्षमार्ग आत्म विकास का मार्ग है जिसकी पूर्णता आत्मा के शुद्ध स्वभाव एवं सामर्थ्य की पूर्ण व्यक्तता-प्रगटता पूर्वक होती है जहाँ जीव संसार-शरीर एवं मोह-रागादि समस्त विकारों से तथा सर्व प्रकार के कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाता है, यही मोक्ष है.

परन्तु इस आत्म विकास की आवश्यकता उसी जीव को तो होगी जो वर्तमान संसार अवस्था में दुखी अनुभव करता हो तथा जिसे इन सांसारिक दुखों से मुक्ति की छटपटाहट लगी हो. अतः आत्म विकास के मार्ग की चर्चा करने के पूर्व वर्तमान सांसारिक जीवन की दशा का-उसके फल का सतर्क परीक्षण करना उचित प्रतीत होता है कि वास्तव में संसार में दुःख है या नहीं.

इसीलिये यहाँ प्रारम्भ में संसार के स्वरुप का विवेचन किया जा रहा है—

संसार शब्द का अर्थ —शब्द कोषों में ‘संसार’ शब्द के मुख्यतः तीन अर्थ प्राप्त होते हैं–

१. जहाँ संसरण अर्थात परिवर्तन हो वह संसार है, २. जहाँ जन्म-मृत्यु एवं पुनर्जन्म रूप भवान्तरों में (अलग-अलग भवों में)  गति हो वह संसार है, और ३. धर्म निरपेक्ष जीवन अर्थात मोह-क्षोभ (कषाय,राग-द्वेष) सहित जीवन संसार है.

व्याख्या–आत्मा ध्रुव वस्तु है तथा सभी जीव स्थायित्व चाहते हैं. जन्म मृत्यु के दुखों से सभी परिचित हैं अतः जन्म, मृत्यु व पुनर्जन्म रूप संसार, अस्थायित्व से युक्त परिवर्तनशील संसार प्रत्यक्षतः दुखमय सिद्ध हो जाता है.

पूर्व में कहा गया है कि सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान-चारित्र रूप मोक्षमार्ग है. सम्यक् चारित्र शुद्धोपयोग रूप अथवा निज शुद्धात्मा में आचरण रूप होने से धर्म है, वह धर्म सुख स्वभावी आत्मा में लीनता रूप होने से आनंदमय है. अतः धर्म निरपेक्ष जीवन अर्थात निजात्मा से भिन्न पर पदार्थों में लीनता-स्थिरता रूप प्रयत्न  उनमें सुख का अभाव होने से सहज ही दुखमय हो जाता है तथा यह  प्रयत्न यथार्थ वस्तु स्वरुप के अज्ञान जनित मोह-राग-द्वेष रूप विकार सहित ही होता है. ये मोहादि विकार स्वयं दुखमय एवं दुःख के कारण हैं अतः इसप्रकार भी धर्मनिरपेक्ष जीवन के आत्म विकार सहित होने से तथा पर पदार्थों में लीनता-स्थिरता रूप प्रयत्नों के असंभव होने से फलतः असफल होने से संसार दुखमय सिद्ध हो जाता है.

सांसारिक जीवन बंधन रूप  होने से भी दुखमय है :—-

सांसारिक जीवन शरीर व अन्य बाह्य पदार्थों में प्रवृत्ति रूप होता है, अर्थात उनमें इष्ट-अनिष्ट बुद्धि पूर्वक उनके संयोग-वियोग हेतु प्रयत्न. इन प्रयत्नों का कारण वस्तु स्वरूपका अज्ञान है तथा उन्हें सुख-दुःख का कारण मानकर उनका कर्त्ता-भोक्ता बनने का भाव या प्रयत्न वस्तु-व्यवस्था के विपरीत प्रवृत्ति होने से अपराधी वृत्ति है और अपराध का फल  बंधन होता है. बंधन के कारण स्वतंत्रता एवं शक्ति बाधित हो जाती है जो दुखमय है. यही कारण है कि संसार दशा में अनंत ज्ञानादि गुणों का धारक शुद्धात्मा जड़ पदार्थों  के आकर्षण के फल में जड़ मय कर्म एवं शरीर के बंधनों से युक्त होकर अपनी शक्ति एवं स्वतंत्रता को खो बैठता है. फलतः अनंत ज्ञेयों को एकसाथ जानने की शक्ति वाला आत्मा पराधीन होकर इन्द्रियों के निमित्त से क्रम-क्रम से एक-एक पदार्थ को और वह भी अल्प रूप में जान पाता है. सबको एकसाथ जानने की इच्छा परन्तु सांसारिक बंधनों के कारण सबको एकसाथ और पूर्णतः जानने में असमर्थ होने से जीव निरंतर दुखी ही रहता है.

इस प्रकार ‘संसार’ शब्द का अर्थ स्वयं ही इसके दुखमय होने की घोषणा करता है. संसार शब्द का अर्थ इसके वाच्य संसार नामक पदार्थों के समुदाय -इस विश्व में रहने वाले जीवों के सामान्यतः दुखमय जीवन को सिद्ध कर देता है. मात्र संसार-शरीर एवं भोगों से विरक्त आत्महित हेतु उद्यमी ज्ञानी पुरुष इसके अपवाद हैं. फिर भी यह जिज्ञासा शेष रह जाती है कि संसार में विभिन्न गतियों-योनियों में सभी जीव क्या समान रूप से दुखी हैं या उनके दुखों में कुछ भिन्नता भी है.

चारों गतियों में यद्यपि सभी जीव अपने अज्ञान से ही दुखी होते हैं फिर भी उनमें रहने वाले जीवों के जानने की शक्ति, इन्द्रियों एवं मन की उपलब्धता, शरीर की रचना एवं शक्ति तथा बाह्य संयोगों की भिन्नता उनके दुखों के हीनाधिक होने में निमित्त बनती है. आगे चारों गतियों के दुखों का संक्षिप्त विवेचन किया जा रहा है.

(1) मनुष्य एवं गति के दुःख :—इस विश्व में दो प्रकार के व्यक्ति  दिखाई देते हैं –प्रथम सर्व अनुकूलताओं और सामर्थ्य से पूर्ण तथा दूसरे अपने पूर्व कृत पापों के फल में दीन-हीन-निर्बल-अभावों में जीवन जीने वाले.

प्रथम प्रकार  के लोगों को देखें तो स्थूल रूप से उनका जीवन सुखमय प्रतीत होता है. परन्तु पूर्व अध्यायों में विवेचित सामान्य वस्तु स्वभाव एवं आत्मा के ज्ञान एवं सुख स्वभाव के आलोक में देखें तो इस प्रकार के व्यक्ति निरंतर इच्छाओं की पूर्ति की आकुलता में जलने वाले और इसप्रकार दुखी ही नजर आते हैं क्योंकि इच्छा की उत्पत्ति किसी न किसी पदार्थ के अभाव जनित दुःख से निवृत्ति हेतु ही होती है. अतः इच्छा का होना ही दुःख के अस्तित्व को व्यक्त करता है. परन्तु इच्छा की पूर्ति पूर्वकृत कर्मों के फलरूप भाग्योदय (पुण्य) के निमित्त से होती है जो पूरी होने पर व्यक्ति कुछ समय के लिए स्वयं को उस इच्छाजनित आकुलता का अभाव होने से सुखी जैसा अनुभव करता है, परन्तु उसी समय पांच इन्द्रियों एवं मन के अनेक विषयों की इच्छा प्रवर्तमान रहने से तथा एकबार में एक ही विषय -वस्तु का उपभोग संभव होने से आंतरिक आकुलता निरंतर बनी रहती है. इसीलिये तो एक प्रकार के भोग से तृप्त होने पर तुरंत ही नए प्रकार के विषय के सेवन की इच्छा की पूर्ति में व्यक्ति संलग्न हो जाता है जो उसके भीतर चलने वाली आकुलता का स्पष्ट प्रतीक है. यदि व्यक्ति भोगों से ही सुखी होता हो तो फिर उसके बाद उसकी अनेक प्रकार की प्रवृत्तियों पर विराम लग जाना चाहिए. लेकिन ऐसा तो देखा नहीं जाता.

सारे ही विश्व में संपन्न लोगों एवं राष्ट्रों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा, संघर्ष, संपन्न लोगों की और अधिक अर्जन करने की लालसा तथा भौतिक एवं वैज्ञानिक नित नवीन निर्मित साधनों के बीच भी तेज भागदौड़, उनमें बढ़ते हुए जटिल रोग और अधिकाधिक औषधि प्रयोग उनके दुखी होने का ही प्रकटीकरण है. संपन्न लोगों की बढ़ती हुई अपराध प्रवृत्ति उनकी भोगों की तीव्र लालसाजनित आकुलता को ही व्यक्त करती है. यहाँ तक की इस सम्पन्नता की और इन्द्रिय सुखों की चाह के कारण बच्चों का बचपन, युवाओं की जवानी और वृद्धजनों का चैन भी नष्ट हो गया है.

दूसरी ओर जो दूसरे प्रकार के निर्धन-दीन-हीन-रूग्ण व्यक्तियों का समूह है वह तो अपनी अनंत अपूरित इच्छाओं के कारण स्पष्ट ही दुखी दिखाई देता है उसके दुखों के सम्बन्ध में तो लिखने का कोई अर्थ ही नहीं है.

इसप्रकार इस संसार में जीवों का जन्म, वृद्धावस्था एवं मृत्यु तो दुखमय हैं ही परन्तु जन्म से मृत्यु तक का सम्पूर्ण जीवन भी दुखों से परिपूर्ण है.

इच्छाओं के प्रकार:—हम जानते हैं कि संसार के सभी जीव सुख चाहते हैं और दुःख से डरते हैं. दुःख का लक्षण आकुलता है और आकुलता को मिटाने हेतु इच्छा का जन्म होता है. ये इच्छाएं भी मुख्यतः चार प्रकार की होती हैं

(1) इन्द्रिय विषय ग्रहण करने की इच्छा—जैसे वस्तुओं के स्पर्श, रस, गंध, रंग-रूप एवं शब्द को जानने की इच्छा.

(2) कषाय (क्रोध-मानादि ) भावों के अनुसार कार्य करने की इच्छा —जैसे किसी का बुरा करने की या  नीचा दिखाने की इच्छा, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की इच्छा आदि.

(3) पूर्वकृत पापों के फल में प्राप्त अनिष्ट संयोग–रोग, भूख-प्यास, अभाव आदि को दूर करने की इच्छा.

इन तीन इच्छाओं को तो सभी जीव दुखपूर्ण ही मानते हैं.

(4) और चौथी इच्छा उपरोक्त तीन प्रकार की इच्छाओं के अनुसार प्रवर्तन करने और उन्हें पूरा करने की होती है. यदि यह इच्छा पूरी हो जाती है तो व्यक्ति स्वयं को सुखी मानता है अन्यथा बहुत दुखी होता है. इसकी पूर्ति बाह्य साधनों एवं पुण्य के फलने पर निर्भर करती है. यह इच्छा जिसकी अत्यधिक बढ़ी हुई होती है तो वह व्यक्ति महान दुखी होता है.

इसके अतिरिक्त इन्द्रिय विषयों (इन्द्रियों के अनुरूप भोग सामग्री) से सम्बंधित इच्छाएं भी चार प्रकार की होती हैं—-१–इन्द्रिय विषयों के भोग की इच्छा, २–विषयों के संग्रह की इच्छा, ३–इन्द्रियों के विषय भोग में समर्थ होने की इच्छा और ४–इन्द्रिय विषयों के भोग के लिए अनुकूल अवसर की इच्छा. 

निर्धन व्यक्ति प्रथम तीन इच्छाओं के कारण निरंतर दुखी रहता है तथा संपन्न व्यक्ति सारी ही इच्छाओं के कारण दुखी रहता है. इससे सिद्ध होता है कि संसार में कोई भी प्राणी कहीं भी और कभी भी सुखी नहीं है क्योंकि उसके सारी ही इच्छाएं निरंतर विद्यमान रहती हैं.

इच्छापूर्ति हेतु प्रयत्न एवं फल भी दुखमय होता है :—जीव की संसार दशा का स्वरुप ही ऐसा है कि इच्छाएं तो दुःखरूप हैं ही परन्तु उनकी पूर्ति हेतु किये जाने वाले प्रयत्न एवं इच्छापूर्ति हो जाने का फल भी दुःखरूप ही होता है.  

उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को भूख की वेदना सताती है तो वह भोजन बनाने का उद्यम करता है यह स्पष्टतः दुःखरूप है, भोजन करने की प्रक्रिया स्वयं आकुलतामय है तथा भोजन यथेष्ट हो जाये तो उसके फल में मुख-शुद्धि की, विश्राम की तथा भोजन को पचाने की आकुलता हो जाती है. भोजन बनाने में सामग्री का व्यय होता है अतः भोजन के बाद आजीविका हेतु प्रयत्न की, उसमें सफल होने पर अर्जित धन की सुरक्षा एवं उसका सुरक्षित निवेश करने की आकुलता होती है. श्रम करने के उपरांत पुनः भूख की वेदना सताती है. इसप्रकार यह क्रम निरंतर चलता रहता है.

बाल्यावस्था में भावी जीवन की आकांक्षाओं के कारण परिश्रम पूर्वक अध्ययन व उच्च शिक्षा का अर्जन, फिर अच्छी नौकरी या व्यवसाय में लगना, अधिक आय हेतु कठोर श्रम करना तथा उस आय को भोगने के प्रयत्न, कठोर श्रम के कारण स्वास्थ्य की चिंता के चलते स्वस्थ रहने की आकुलता आदि दुखों से परिपूर्ण ही हैं.

इसीप्रकार विवाह एवं परिवार की वृद्धि तथा गृहस्थ जीवन के सारे ही  क्रियाकलाप दुखों की अनवरत श्रंखला की ही कहानी कहते हैं.

वास्तव में तो जीव संसार में एक इच्छा की वेदना के शमन के लिए दूसरी इच्छा के दुःख को गले लगाता है अर्थात एक दुःख से बचने के लिए दूसरे दुःख का वरण कर लेता है. इच्छाओं की वेदना कभी-कभी तो इतनी असह्य हो जाती है कि उसे उसके आगे मृत्यु की वेदना भी कम लगती है और व्यक्ति आत्म-घात करके भी उस अपूर्ण इच्छा की वेदना से मुक्त होने  का प्रयत्न कर बैठता है, मरना श्रेयस्कर समझता है.

इसप्रकार हम कह सकते हैं कि यह सारा ही संसारी जीवन दुखों से परिपूर्ण है. कदाचित अनुकूलताओं की उपलब्धि होने पर सुख मानना भ्रम है क्योंकि उसके तुरंत बाद दुखों की अनवरत श्रंखला उस जीव का स्वागत करने हेतु तैयार रहती है, साथ ही वह इन्द्रिय सुख इन्द्रियों एवं विषय सामग्री के अधीन, क्षणिक, बाधा सहित, उच्चावचन सहित एवं आकुलतामय आदि अनेक दोषों से युक्त होता है अतः दुःख ही है.

तिर्यंच गति के दुःख :—तिर्यंच गति में अन्य गतियों के जीवों की कुल संख्या से अनंत गुना जीव रहते हैं. वनस्पति आदि स्थावर जीवों और सूक्ष्म जीवाणु, कृमि एवं कीटों से लेकर विशालकाय पंचेन्द्रिय पशुओं तक के सभी जीव अपने शरीर एवं परिणामों की वक्रता (शरीर टेढ़ा-मेढ़ा होना एवं मायाचारी युक्त) के कारण तिर्यंच कहे जाते हैं. इनमें एक इन्द्रिय पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं वनस्पति को अपने शरीर रूप से धारण कर रहने वाले और केवल स्पर्श द्वारा ही पदार्थों को जानने की सामर्थ्य वाले स्थावर जीव; स्पर्श एवं स्वाद द्वारा पदार्थों को जानने की सामर्थ्य वाले स्पर्शन एवं रसना इन्द्रिय युक्त सूक्ष्म कृमि, लट, जोंक, केंचुआ आदि दो इन्द्रिय जीव; स्पर्श-स्वाद एवं गंध द्वारा पदार्थों को जानने की सामर्थ्य वाले स्पर्शन-रसना और घ्राण (नाक) इन्द्रिय युक्त चींटी, बिच्छू, दीमक आदि तीन इन्द्रिय जीव; स्पर्श-स्वाद-गंध और वर्ण (रूप-रंग-आकार) आदि के द्वारा पदार्थों को जानने में समर्थ स्पर्शन-रसना-घ्राण एवं नेत्र इन्द्रिय युक्त  मक्खी-मच्छर-टिड्डा-ततैया-भौंरा आदि चार इन्द्रिय जीव; स्पर्श-स्वाद-गंध-वर्ण एवं शब्द द्वारा पदार्थों को जानने में समर्थ स्पर्शन-रसना-घ्राण-नेत्र एवं कर्ण इन पांच इन्द्रिय युक्त बलवान जीव जैसे मछली-मगर-घड़ियाल आदि जलचर, उड़ने वाले पक्षी चिड़िया-गिद्ध-बाज आदि  नभचर, गाय-भैंस-सिंह, हाथी आदि स्थलचर पंचेन्द्रिय जीव निष्कर्षतः देव-नारकी और मनुष्यों के अतिरिक्त सभी जीव तिर्यंच गति में समाहित हैं. पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीवों में कुछ मन रहित असंज्ञी जीव भी होते हैं तथा अधिसंख्य मन सहित सोचने-विचारने- हिताहित का निर्णय करने में समर्थ और सिखाये जाने पर सीखने में समर्थ संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव होते हैं.

तिर्यंच गति में ही आलू आदि जमीकंद में तथा अल्प विकसित रोंये वाले फल एवं सब्जियों आदि में रहने वाले अतिसूक्ष्म जीव भी आते हैं. इन्हें वैदिक शास्त्रों में अनन्तकाय (अनंत जीवों का एक शरीर) कहा गया है औरजैन ग्रंथों में अनन्तकाय तथा निगोद (जहां दुखों से बचने के लिए कोई गोद अर्थात शरण स्थल न हो ) कहा गया है. ये निरंतर जन्म-मरण करते हुए तीव्र कषाय वश महा दुखी होते हैं. ये अत्यल्प ज्ञानसे युक्त एकेन्द्रिय जीव मात्र वनस्पतियों में पाए जाते हैं. निगोद जीवों की उपस्थिति के कारण ही कच्ची रोंयेदार सब्जियों-फलों एवं कंदमूल को अभक्ष्य (न खाने योग्य) की श्रेणी में रखा गया है.

विडम्बना यह है कि कई लोग तो सूक्ष्म कीटों एवं वनस्पति आदि स्थावर जीवों में आत्मा का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते, ऐसी स्थिति में इनका सामूहिक संहार निरंतर होता रहता है.साथ ही सूक्ष्म शरीर अत्यल्प ज्ञान और इन्द्रियों की अल्प शक्ति के कारण ये एक और दो इन्द्रिय जीव अपने अस्तित्व को व्यक्त करने में, प्रतिक्रिया करने में, संकटों का प्रतिकार करने में असमर्थ रहते हैं. स्थूल दो इन्द्रिय एवं तीन-चार व पांच  इन्द्रिय जीव अपनी रक्षा एवं भोजन हेतु प्रयत्न करते देखे जाते हैं परन्तु अत्यल्प ज्ञान और शारीरिक अक्षमता के कारण असफल रहते हैं. इन सभी जीवों में भोजन-आवास आदि के लिए संघर्ष, निर्बल जीवों को बलवान जीवों द्वारा मार कर अपना ग्रास बना लेना, निरंतर असुरक्षा, सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, वध-बंधन, मारण-ताड़न आदि के दुःख, इच्छाओं की तीव्रता परन्तु उनको अभिव्यक्त करने में असमर्थता तथा उनकी पूर्ती का न होना आदि तिर्यंच गति के अनंत दुखों की कहानी कहते हैं.

आधुनिक बूचड़ खानों में पशुओं को अत्यंत पीड़ित कर मारना, उन  के  जीवित  रहते ही शरीर से चमड़ा उतार लेना, जीवित पशुओं को आग में भूनना या  उबलते पानी में पकाना, उनके शारीरिक अवयवों से औषधियों एवं  सौंदर्य प्रसाधनों का निर्माण तथा उनकी प्रभावकारिता व निरापदता का पशुओं पर निर्दय परीक्षण, अन्य नई औषधियों के भी उन पर प्रयोग, वैज्ञानिक आविष्कारों हेतु उन पर मारणान्तिक अनुसन्धान, रोग का कारण मान लिए गए सूक्ष्म कीटों-जीवाणुओं और विभिन्न फसलों में उत्पन्न होने वाले कीटों को मारने के लिए अधुनातन कीटनाशकों का प्रचुर प्रयोग तिर्यंच गति के घोर दुःखमय जीवन के नए आयाम हैं.

इस प्रकार तिर्यंच गति में जीवों की संख्या भी अनंत है और उनके दुखों की कथा भी अनंत है. निजात्म स्वरुप का घोर अज्ञान, शरीर व भोगों के प्रति तीव्र आसक्ति परन्तु समर्थ शरीर एवं भोगों की अनुपलब्धता तथा ज्ञान व अभिव्यक्ति के साधन और सामर्थ्य (इन्द्रियां एवं उनकी शक्ति) का हीन होना ये तिर्यंच गति की विशेषताएं हैं जो उनके दुखों का भी मूल कारण हैं.

इसके अतिरिक्त भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शनशास्त्रों में दो योनियों या गतियों की चर्चा और की गई है, वे हैं–स्वर्ग एवं नरक. अनेक लोग इस ज्ञात विश्व में दिखाई न देने से स्वर्ग एवं नरक का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते परन्तु सर्वज्ञ परमात्माओं द्वारा अपने ज्ञान में इनका अस्तित्व स्पष्टतः जाना गया है तथा तर्क एवं युक्ति से भी इनका अस्तित्व सिद्ध होता है. अतः निश्चित ही इनका अस्तित्व स्वीकार किया जाना चाहिए.

स्वर्ग के दुःख :—ऐसा माना जाता है कि स्वर्ग में सुख ही सुख है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है. यह सत्य है कि जीवों द्वारा पूर्व जन्मों में किये गए शुभ-पुण्य कार्यों के फल में स्वर्ग में रहने का अवसर मिलता है. वहां प्रचुर भोग सामग्री, मनमोहक पर्यावरण, दीर्घायु, सदैव मनोनुकूल वर्तन करने वाले संगी-साथी, सुन्दर-स्वस्थ-समर्थ शरीर जीवों को पुण्य के फल में सहज ही मिलते हैं. मनुष्यों को सहज सुलभ विद्या एवं शक्ति से विलक्षण विद्या, बुद्धि, शक्ति एवं सौंदर्य के स्वामी होने से इन्हें देव कहा जाता है. इनका शरीर भी रस-रक्त-मांस-मल-मूत्र आदि से रहित अत्यंत सुन्दर एवं तेजस्वी होता है. सर्व अनुकूलताओं के उपलब्ध होने से जीव वहां रहना चाहता है.

ये जीव आयु पूर्ण होने तक अपनी पंचेन्द्रिय विषय-भोगों की लालसा को तृप्त करने हेतु भोगों में अनवरत प्रवृत्ति करते हैं. परन्तु यह अनवरत भोग प्रवृत्ति उनकी तीव्र वेग से व्यक्त होती हुई इच्छाओं का ही प्रतिफल है और भोगों की आकांक्षा इतनी तीव्र होती है कि वह कभी तृप्त होती ही नहीं है, वह तृप्ति हो भी कैसे क्योंकि भोगों में सुख है ही नहीं, सुख तो आत्मा का स्वभाव है. इसप्रकार स्वर्ग के जीव इच्छाओं के तीव्र प्रवाह की आकुलता से सदा पीड़ित ही रहते हैं. इसके साथ ही जैसा कि पूर्व अध्यायों में .कहा गया है — आत्म स्वरुप के अज्ञान सहित तीव्र आसक्ति पूर्वक भोगों में प्रवृत्ति पापरूप कार्य है अतः इसका फल भी दुःखरूप ही आता है.

स्वर्ग ‘ शब्द की व्याख्या :—स्वर्ग शब्द का अर्थ होता है –स्वर्ग = सु +अर्ग. पाठक अर्गला या अनर्गल अथवा निरर्गल शब्दों से तो परिचित होंगे ही. अर्गला अर्थात सांकल जो दरवाजा बंद करने के लिए काम में ली जाती थी ताकि अनावश्यक कोई कमरे में अंदर न आ सके. अतः अर्गला का अर्थ हुआ –बाधा उत्पन्न करने या लाने वाला / वाली. इसीप्रकार अनर्गल या निरर्गल शब्दों का अर्थ होता है –निर्बाध या स्वछन्द. इसप्रकार अर्ग शब्द का अर्थ सिद्ध होता है –बाधा. परन्तु स्वर्ग शब्द में सु +अर्ग होने से तथा सु अर्थात अच्छा या श्रेष्ठ अर्थ होने से स्वर्ग शब्द का अर्थ होता है –अच्छी बाधा. परन्तु हम जानते हैं कि बाधाएं कभी अच्छी नहीं होती, वे तो दुःखरूप ही होती हैं. यही वह तथ्य है जो स्वर्ग को दुःखरूप सिद्ध कर देता है.

यह जिज्ञासा फिर भी रह जाती है कि बाधाओं के अच्छे होने का क्या अर्थ है. उत्तर बहुत सरल है –यह जीव अनादि अज्ञान के कारण आत्म स्वरुप की विस्मृति पूर्वक पर पदार्थों में सुख मानता रहा है. स्वर्ग में यह जीव भोगों में सुख की तीव्र वासना के कारण वहां विद्यमान बाधाओं को भी भूलकर मग्न हो जाता है. वहां अपनी श्रेणी व स्तर के अनुरूप भोगों में कभी व्यवधान नहीं आता, परन्तु वहां किसी भी जीव को अपनी श्रेणी व स्तर से भिन्न उच्च स्तरीय भोगों के भोगने की तथा उस हेतु प्रयत्न करने की, मनुष्यों के समान अपने स्तर को उद्यमपूर्वक ऊंचा उठाने की सुविधा नहीं होती. यदि कोई देव सद्भाग्य से संयम (भोगों से विरक्ति) धारण करना चाहे तो वह भी वहां संभव नहीं होता  क्योंकि उसे जिन अन्य देव-देवियों के साथ भोग भोगने हैं उनका पुण्य का उदय (पुण्य का फलना) उसे भोगों से मुक्त नहीं होने देता. इसप्रकार अनेक बाधाओं के होने पर भी जीव वहां उपलब्ध भोगों में सुख बुद्धि होने से उसे अच्छा मानता है अतः स्वर्ग की यह संज्ञा सार्थकहै.

भोगों के भोगने की अनिवार्यता, उच्चस्तर के देवों के भोगों तक पहुँच के अभाव जनित ईर्ष्या, आत्मोन्नति की स्वतंत्रता का अभाव, इच्छाओं के वेगवान प्रवाह जनित तीव्र आकुलता तथा भोगों की सहज उपलब्धि होने पर भी भोगों से अतृप्ति स्वर्ग को दुखमय सिद्ध करती है.

नरक गति के दुःख :—नरक शब्द का अर्थ है–वह स्थान जहाँ जीव को कुछ भी प्रीतिकर-रुचिकर नहीं लगता–न वहां के जीव और न ही वह स्थान एवं वातावरण. एक अन्य अर्थ के अनुसार -जहाँ पापियों को अपने पाप कर्मों का अत्यंत दुखमय फल भोगना पड़ता है वह नरक है. वहां के जीवों को नारकी कहते हैं. मनुष्य लोक में भी जब कोई व्यक्ति निरंतर अत्यंत निर्दय एवं पाप पूर्ण कार्य करता है तो उसे भी वृद्धजन “नारकी” शब्द से सम्बोधित कर दिया करते हैं. यह सम्बोधन नारकी जीवों की मनोवृत्ति का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त है.

नरकों का स्थान भूमि में बहुत नीचे गहराई में होने से नरकों के स्थान को पाताल लोक या अधो लोक भी कहा जाता है. दूसरी और स्वर्गों के स्थान को भूमि से बहुत ऊंचाई पर स्थित होने से ऊर्ध्व लोक या देव लोक भी कहा जाता है. यह स्वाभाविक भी है क्योंकि उच्च स्तरीय परिणाम एवं आचरण वाले जीवों का स्थान भी सामान्य जनों से ऊंचा तथा निम्न स्तरीय परिणाम एवं आचरण वाले जीवों का स्थान सामान्य जनों से नीचे होना ही चाहिए.

नरक शब्द के अर्थ से ही यह सहज स्पष्ट हो जाता है कि नरकों में घनघोर दुःख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है. अत्यंत दुर्गन्धमय विकृत एवं बार-बार खंडित होकर भी पुनः-पुनः जुड़ जाने वाला शरीर, दुर्गन्धमय भयावने आवास व पर्यावरण, तीव्र क्रोध से परस्पर मारकाट एवं चीख पुकार से युक्त वातावरण, प्रबल इच्छाओं की वेदना परन्तु इच्छापूर्ति के साधनों का सर्वथा अभाव, तीव्र सर्दी-गर्मी भूख-प्यास की वेदना परन्तु इनके उपायों की पूर्ण अनुपलब्धता और इतना सब होने के साथ ही दीर्घायु युक्त जीवन के आधार से वहां के दुखों का परिचय हो जाता है. यदि प्रत्यक्ष ही देखना हो तो किसी आधुनिक बूचड़खाने को देख लेना चाहिए. नरक का दुःख उससे अनंत गुना है.

यह सिद्ध किया जा चुका है कि यह जीव अपने शाश्वत ज्ञानानंदमय शुद्ध आत्म स्वभाव के  अज्ञानजनित पर पदार्थों में सुख बुद्धि के कारण उनमें इष्ट-अनिष्ट मान्यता सहित इष्ट के संयोग एवं अनिष्ट  के वियोग की इच्छा के कारण दुखी होता है. स्वर्गों में जीव इष्ट संयोगों को भोगने की एवं उनके स्थायित्व की इच्छा से दुखी रहता है, इसीप्रकार नरक में जीव अनिष्ट माने गए सर्व संयोगों के नाश या वियोग की इच्छा से दुखी रहता है. बाह्य संयोग-वियोग कहीं सुख-दुःख के कारण नहीं होते, उनमें कल्पित इष्ट-अनिष्ट की मान्यता पूर्वक उनसे सुखी या दुखी होने की भ्रम पूर्ण इच्छा ही दुःख का कारण है.

प्राप्त शरीर के प्रति ममत्व एवं बाह्य संयोगों में प्रतिकूलता की मान्यता अथवा तो उनसे दूर हो जाने की तीव्र इच्छा नारकियों के दुःख का एकमात्र कारण है. मनुष्य एवं तिर्यंच गति के सूक्ष्म कीट से लगाकर पशु तक सभी जीव अपनी उस योनि में जीर्ण शरीर होने पर भी रहना चाहते हैं, देव तो कभी स्वर्ग को छोड़ना ही नहीं चाहते परन्तु नारकी दुखों की भीषणता के चलते सदैव वहां से मुक्त होने की कामना किया करता है, लेकिन आयु पूर्ण होने के पूर्व निकलना असंभव होने से तथा वहां के संयोगों में तीव्र अरुचि होने से प्रचुर दुःख का ही वेदन किया करता है.

इसप्रकार उक्त चारों गतियों के दुखों का वर्णन इस तथ्य को सिद्ध एवं स्वीकार करने के लिए पर्याप्त है कि संसार में कहीं भी सुख नहीं है और इन दुखों का कारण जीव के अज्ञानमूलक मोह-राग-द्वेष परिणाम ही हैं न कि बाह्य शरीर एवं सांसारिक संयोग-वियोग. अतः सुखी होने के लिए पूर्ण सुखी जीवों (परमात्माओं) अथवा सुख के मार्ग पर चलने वाले ज्ञानी साधु पुरुषों का सानिध्य एवं अनुसरण करना चाहिए. फिर उनके द्वारा उपदिष्ट दुखों से निवृत्ति रूप तथा आत्मिक सुख में प्रवृत्ति रूप मोक्ष मार्ग का और उसके कारणभूत यथार्थ स्व एवं पर रूप में विभक्त पदार्थों के यथार्थ स्वरुप के प्रतिपादक सत्साहित्य-शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए,  उसे चित्त में धारण कर चिंतन-मनन पूर्वक स्व (निज शुद्धात्मा) एवं पर (शेष समस्त अन्य पदार्थ) स्वभाव का निर्णय करके उसकी प्रतीति करना चाहिए और अंत में उनके द्वारा बताये गए सम्यक्श्रद्धान-ज्ञान-चारित्र रूप मोक्षमार्ग पर चलने हेतु उद्यमी होना चाहिए.

अध्याय —7 

आत्मा के अस्तित्व एवं स्वभाव ज्ञान से प्राप्त निष्कर्ष और आत्म विकास की प्रारंभिक भूमिका

पूर्वोक्त छह अध्यायों में हमने आत्मा के अस्तित्व की सिद्धि करते हुए आत्मा के सामान्य स्वभाव, सामान्य-विशेष गुणों एवं अनेकांत स्वभाव का और संसार के दुखमय स्वरुप का विस्तृत अध्ययन किया है. यथास्थान आत्मा के अस्तित्व एवं विभिन्न स्वभावों के ज्ञान से व्यक्ति को क्या लाभ होता है यह भी जाना है. जैसा कि पूर्व अध्यायों में कई स्थानों पर स्पष्ट किया गया है कि आत्मा के सामान्य-विशेष स्वभावों गुणों को जानने का लाभ दुखों से मुक्ति एवं स्वाधीन निराकुल आत्मिक सुख की उपलब्धि सहित सम्पूर्ण आत्म-विकारों से मुक्त होकर आत्मा की पूर्ण शुद्ध-निर्मल दशा को प्राप्त करना ही है, जिसमें आत्मा की सर्व स्वभावभूत सामर्थ्य पर्याय में भी व्यक्त हो जाती है. फलतः स्वभाव से ही द्रव्य- गुण रूप से पूर्ण, शुद्ध वअनंत शक्तिमयआत्मा पर्याय से भी शुद्ध व अनंत शक्तिमय व्यक्त होकर सर्वतः शुद्ध हो जाता है, पूर्णतः निर्विकार होने से सर्व बंधनों से मुक्त हो जाता है.

चतुर्गति रूप संसार का दुखमय स्वरुप जान लेने के बाद विवेकशील व्यक्ति की इन दुखों से मुक्ति की छटपटाहट बढ़ती जाती है और वह दुःख से मुक्ति के मार्ग पर बढ़ने के लिए उत्सुक हो जाता है. परन्तु वस्तु एवं आत्म स्वभाव का पूर्वोक्त सम्पूर्ण विवेचन सैद्धांतिक है अतः यह जिज्ञासा फिर भी शेष रह जाती है कि इस सम्पूर्ण ज्ञान की जीवन में प्रयोग पद्धति अर्थात आत्म-विकास की प्रक्रिया क्या है कि जिससे व्यक्ति सांसारिक दुखों से क्रमिक रूप से मुक्त होता हुआ तथा आत्माश्रित निराकुल अतीन्द्रिय सुख को प्राप्त करता हुआ तथा पुरुषार्थपूर्वक उसे बढ़ाता हुआ आत्मा के विकारों के अभावपूर्वक आत्मा की शुद्धि की वृद्धि करता हुआ आत्मविकास के मार्ग पर अग्रसर होता है तथा अंततः पूर्णता को उपलब्ध कर लेता है, संसार से मुक्त हो जाता है.

हम जानते हैं कि प्रत्येक प्रक्रिया या विधि का आधार कुछ सुविचारित निष्कर्ष होते हैं और वे निष्कर्ष वस्तु स्वभाव के अध्ययन से ज्ञात सिद्धांतों पर आधारित होते हैं अतः आत्म-विकास की प्रक्रिया पर विचार करने से पूर्व यथार्थ वस्तु स्वभाव के सम्यक ज्ञान से उपलब्ध सिद्धांतों एवं निष्कर्षों पर दृष्टिपात करना उपयोगी रहेगा.

सामान्य वस्तु स्वभाव एवं आत्म स्वभाव के अध्ययन से उपलब्ध सिद्धांत एवं निष्कर्ष— पूर्वोक्त सामान्य वस्तु स्वभाव एवं सम्पूर्ण आत्म स्वभाव के गहन अध्ययन, तर्क-वितर्क पूर्वक चिंतन-मनन एवं निर्णय के आधार पर हमें अनेक महत्वपूर्ण सिद्धांत उपलब्ध होते हैं, उन सिद्धांतों की यथार्थता का निर्णय हो जाने पर विवेकशील आत्महित के इच्छुक व्यक्ति को अपने ज्ञान में कर्तव्य-अकर्तव्य सम्बन्धी अनेक निष्कर्ष सहज ही स्पष्ट हो जाते हैं. उनमें से मुख्य –मुख्य सिद्धांत एवं निष्कर्ष निम्न प्रकार हैं—

  • इस विश्व में विद्यमान सभी चेतन-अचेतन पदार्थ  सत्  (अस्तित्व) स्वभावी होने से अकारण हैं. उनका कोई निर्माता-रक्षक या संहारक नहीं है.  सत् स्वभावी पदार्थ अनंत गुणों-शक्तियों से परिपूर्ण होता ही है. शक्तियां सदैव सक्रिय होती हैं, उनकी सक्रियता द्रव्य में  प्रतिसमय होने वाली नई-नई परिवर्तनशील पर्यायों के रूप में दृष्टिगत होती है. इसप्रकार प्रत्येक द्रव्य अनंत शक्तिमय होने से तथा अपने पर्यायरूप कार्यों में प्रतिसमय संलग्न रहने से अपने आप में परिपूर्ण एवं स्वतंत्र होता है. विश्व में कोई भी द्रव्य न्यून शक्ति वाला अथवा खाली नहीं होता कि उसे अन्य द्रव्य की सहायता से पूर्ण किया जा सके.

(2) इसप्रकार अनादि-अनंत काल के प्रवाह में सदैव अबाधित विश्व की एक बनी-बनाई परिपूर्ण व्यवस्था होने से उसमें परिवर्तन, संशोधन या परिवर्धन के प्रयास सदैव ही निष्फल होते हैं.

(3) अपने स्वचतुष्टय की सीमा में सुरक्षित रहने से तथा सहज स्वतंत्र परिणमनशील स्वभाव होने से  विभिन्न द्रव्यों के मध्य किसी भी प्रकार के संबंधों की कल्पना भ्रममूलक है अतः उनमें परस्पर कर्त्ता बनने का, हस्तक्षेप या सहयोग का प्रयत्न असंभव होने से सर्वथा निरर्थक है. इसीप्रकार अन्य के द्वारा अपकार के भय एवं उपकार के लोभ के परिणाम भी मात्र काल्पनिक ही हैं.

(4) द्रव्य शाश्वत एवं पर्याय क्षणिक होने से द्रव्य को पर्याय जितना ही मानकर अथवा पर्यायों में इष्ट-अनिष्टपना मानकर पर्यायों के आधार पर द्रव्य के संयोग-वियोग में हर्ष-विषाद करना या इष्ट पर्यायों के स्थायित्व एवं अनिष्ट पर्यायों के समयपूर्व अभाव के प्रयत्न करना वास्तव में तो दुःख का ही कारण है.

(5) द्रव्यों में होने वाला विकार परद्रव्य की उपस्थिति या निकटता में होने पर भी परद्रव्य से निरपेक्ष अपने सहज परिणमन स्वभाव की विकाररूप परिणमन की उस समय की योग्यता के कारण ही होता है. अतः अन्य द्रव्यों को किसी द्रव्य के विकार का कारण कहना मात्र औपचारिक है तथा कारण मानना यह निरा अज्ञान है.

(6) सम्पूर्ण ही विश्व के पदार्थ अपने में परिपूर्ण और स्वतन्त्रतया क्रियाशील होने से, उनकी भूतकालीन एवं भविष्यकालीन पर्यायों का वर्तमान में अभाव होने से और वर्तमान एकसमयवर्ती पर्याय अपने अल्प इन्द्रिय ज्ञान का विषय न होने से तथा उस परिणमनशील द्रव्य से अन्य द्रव्य सदैव अप्रभावित रहने से इस विश्व एवं उसके घटक द्रव्यों पर दृष्टिपात करना भी निरर्थक होने है,  समय एवं श्रम का अपव्यय ही है. अतः जगत के सर्व द्रव्यों और उनके कार्यरूप पर्यायों से निरपेक्ष मात्र अपने ज्ञाता-दृष्टा आनंदमय आत्म स्वभाव पर दृष्टि करना ही उचित है.

(7) आत्मा एक द्रव्य होने से अस्तित्व-वस्तुत्व आदि अनंत सामान्य गुणों से, ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य आदि अनंत विशेष गुणों से तथा अस्ति-नास्ति, एक-अनेक आदि अनंत परस्पर विरुद्ध धर्मों से युक्त एक पूर्ण समर्थ चेतन (ज्ञाता-दृष्टा) पदार्थ है. अतः शरीर, इन्द्रियां,आहार-जल अथवा परमेश्वर आदि के कारण आत्मा का जीवन या अस्तित्व मानना निरा अज्ञान है.

(8) आत्मा में ज्ञान और सुख गुण अपने ज्ञान व सुख स्वभाव की  स्वतंत्र परिणमन की योग्यतानुसार होते हैं, वे इन्द्रिय एवं मन के विषयों के आधीन नहीं हैं. अतः ज्ञान व सुख के लिए इन्द्रिय व मन के विषय रूप पर पदार्थों की ओर दौड़ना उनमें ज्ञान व सुख का अभाव होने से सदैव असफल प्रयत्न है, फलतः मात्र आकुलता का कारण है.

(9) आत्मा के साथ जन्म से ही रहने वाला शरीर, इन्द्रियां आदि जड़ हैं, संयोगरूप होने से इनका वियोग भी निश्चित है, तब परिवार-समाज-धन-वैभव, पद-प्रतिष्ठा आदि तो प्रत्यक्ष ही भिन्न हैं. अतः इनमें अपनत्व-ममत्व-स्वामित्व की मान्यता अयथार्थ होने से दुःख का कारण है. इन सबका परिणमन स्वतंत्र होने से ये अविश्वसनीय हैं यह प्रत्यक्ष अनुभूत है. अतः संयोगों के कारण स्वयं एवं अन्य को श्रेष्ठ या दीन-हीन मानना अज्ञान भाव है.

(10) आत्मा के ज्ञान, बुद्धि, बल, ऋद्धि आदि में राग एवं गर्व, तथा अल्पज्ञता एवं दौर्बल्य आदि में द्वेष व हीनता का भाव अज्ञान भाव है क्योंकि ये आत्मा के पर्यायरूप भाव क्षणिक होने से नाशवान हैं.

(11) प्रत्येक द्रव्य स्वयं में सर्व प्रकार से स्वतंत्र एवं परिपूर्ण होने से उनमें किसी भी प्रयत्न से अन्य द्रव्य का कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व असंभव है. फिर भी भूमिकानुसार गृहस्थ या साधु दशा में पुरुषार्थ की निर्बलता एवं राग की विद्यमानता के कारण पदार्थों से सम्बंधित मन-वचन-काय की क्रियाशीलता के चलते अभीष्ट कार्य के होने या न होने की दशा में हर्ष या विषाद उचित नहीं है क्योंकि कार्य का होना या न होना तो उस पदार्थ की उस समय की परिणमन की योग्यता पर ही निर्भर होता है उसमें जीव का कोई कर्तृत्व नहीं है. जीव तो मात्र अपने रागादि परिणामों का ही कर्त्ता होता है तथा उनके सद्भाव में होने वाली मंद-तीव्र आकुलता का ही भोक्ता होता है.

(12) आत्मा में होने वाला मोह-राग-द्वेष रूप विकार पर पदार्थों के लक्ष्य से होता है जो उसके ज्ञान व सुख स्वभाव की पूर्ण सामर्थ्य की व्यक्तता में बाधक है. जीव को सुख की सदैव इच्छा होने से तथा सुख ज्ञानपूर्वक ही होने से यह अल्प व्यक्त ज्ञान व सुख आकुलता सहित ही होता है. साथ ही पर पदार्थों में प्रवृत्ति सदैव सीमित होती है, बाधा सहित होती है तथा पराधीन होती है अतः विकार एवं आकुलता का कारण होती है.

 इसके विपरीत स्वद्रव्य में प्रवृत्ति स्वतंत्र होने से निर्बाध होती है अतः ज्ञान व सुख स्वयं का ही स्वभाव होने से उसका शुद्ध निराकुल परिणमन सहज ही होने लगता है जो आनंद रूप है अतः सुखी होने के लिए परपदार्थों से लक्ष्य हटाकर निज ध्रुव शुद्धात्मा में स्थिरता-लीनता रूप प्रयत्न ही एकमात्र कर्तव्य है.

(13) इस विश्व में जीव के दुःख का एकमात्र कारण यथार्थ वस्तु स्वरुप के अज्ञानजनित स्व-पर एवं हितकारी भाव-अहितकारी भाव आदि के सम्बन्ध में विपरीत श्रद्धा (मिथ्या-दर्शन), यथार्थ वस्तु स्वरुप का अज्ञान (मिथ्या-ज्ञान) तथा इन दोनों पूर्वक सुख की प्राप्ति के लिए आत्मा से भिन्न पर पदार्थों एवं उनके भावों में प्रयत्नरूप, लीनता-स्थिरतारूप आचरण (मिथ्या-चरित्र) हैं.

इसके विपरीत वस्तु स्वरुप के यथार्थ श्रद्धान पूर्वक निजात्मा में आत्म-बुद्धि एवं हितरूप श्रद्धा -(सम्यक् दर्शन), सामान्य वस्तु स्वरुप सहित निजात्म स्वभाव का यथार्थ ज्ञान (सम्यक् ज्ञान) और इन दोनों सहित वास्तविक निराकुल आत्मिक सुख की प्राप्ति के लिए निजात्मा में लीनता-स्थिरता के लिए प्रयत्नरूप आचरण (सम्यक् चारित्र) आत्मा के सुख के कारण हैं.  अतः सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चारित्र को प्रगट करना ही आत्मा का एकमात्र कर्तव्य है.

उक्त निष्कर्षों के आधार पर व्यक्ति के चित्त में यह तथ्य सुनिश्चिततया निर्णीत हो जाता है कि यह संसार दुखमय है तथा आत्मा ज्ञान व आनंद स्वभाव होने से सुख का पिण्ड है. अतः उस सुखार्थी व्यक्ति के ज्ञान में सुख के मार्ग की खोज का वास्तविक प्रयत्न निज आत्मा में ही प्रारम्भ होता है और जैसा कि चारित्र गुण के प्रकरण में यह सिद्ध किया ही गया है कि आत्मा के हित की प्राप्ति- सुख की प्राप्ति के लिए प्रयत्न-आचरण या चारित्र रूप है और यह श्रद्धान एवं ज्ञान के सम्यक् होने पर होता है इसीलिये यह चारित्र रूप प्रयत्न आत्मा में होने से–सम्यक् चारित्र कहा जाता है जो आत्म-विकास रूप है.

आत्म विकास की प्रक्रिया :—किसी भी विकास की प्रक्रिया में दो कार्य एकसाथ होते हैं —(1) त्रुटियों को दूर करना तथा (2) करणीय कार्य-सही कार्य को पूरी निष्ठा-तत्परता-हितबुद्धि से सोत्साह प्रारम्भ करना. 

यह सर्व ज्ञात तथ्य है कि ग्रहण पूर्वक ही त्याग होता है जैसे कि रोग मुक्ति के प्रयोजन से अपथ्य-अहितकर आहार-विहार का त्याग तथा पथ्य-हितकर आहार-विहार एवं औषधि का सेवन एक साथ ही प्रारम्भ होता है. इसीप्रकार दुःख से निवृत्ति एवं सुख में प्रवृत्ति रूप-आत्म विकास रूप मोक्षमार्ग में प्रगति करने के लिए भी गलतियों का निवारण तथा सम्यक् मार्ग पर आरोहण-गमन एक साथ ही होता है

आत्म-विकास की प्रारम्भिक भूमिका:—जिस प्रकार किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए प्रारम्भिक तैयारी की जाती है उसीप्रकार इस चतुर्गति संसार में परिभ्रमण रूप अनादिकालीन दुखमय परंपरा का अभाव करके पूर्ण शुद्ध शाश्वत अनंत गुणमय चैतन्य आत्म स्वभाव की लीनता पूर्वक आत्म स्वभावभूत अतीन्द्रिय निराकुल आनंद का रसास्वादन करने रूप सर्वोपरि कर्तव्य के लिए भी पूर्व तैयारी अर्थात प्रारम्भिक भूमिका पर आरोहण अनिवार्य आवश्यकता है. क्योंकि पूर्व तैयारी के बिना कार्य की सफलता सदैव संदिग्ध ही होती है.

इस प्रारम्भिक भूमिका का निर्माण आत्मा की संसार दशा में ही लौकिक जीवन में हो जाता है. यह बिलकुल वैसे ही है जैसे कि पराधीनता की दशा में ही उससे मुक्ति का प्रयत्न प्रारम्भ किया जाता है. इस प्रारम्भिक भूमिका में पदार्पण करने वाले व्यक्ति के जीवन में से स्वच्छंदता एवं निरंकुशता की प्रवृत्ति समाप्त होने लगती है तथा उसके जीवन में शिष्टाचार एवं सदाचार, विनयशीलता, विषयों के प्रति गृद्धता (तीव्र लालसा) के अभावपूर्वक संतोषी प्रवृत्ति, अहिंसक जीवन पद्धति आदि अनेक गुणों का समावेश होने लगता है. शिष्टाचार एवं सदाचार का उसके जीवन में प्रवेश न केवल उसके जीवन को संयमित बनाकर अनेक पाप प्रवृत्तियों से उसकी रक्षा करता है बल्कि यह परिवार, समाज एवं राष्ट्र जीवन में भी शांति, सहयोग, सद्भाव एवं सहअस्तित्व आदि अनेक गुणों का वाहक बनता है. इस प्रकार शिष्टाचार एवं सदाचार का आत्म विकास की प्रारम्भिक भूमिका में अत्यधिक महत्त्व है. इनकी विशेष चर्चा आगे की जा रही है.

शिष्टाचार :—शिष्ट अर्थात सभ्य, विद्वान् व्यक्ति. अतः शिष्टाचार का अर्थ हुआ –सभ्य-विद्वान् व्यक्तियों द्वारा किया जाने वाला आचरण. इस प्रकार देखा जाये तो शिष्टाचार का क्षेत्र बहुत व्यापक है. सामान्यतया शिष्टाचार से तात्पर्य परिवार एवं समाज के विभिन्न घटकों, पूज्य पुरुषों एवं सामान्य व्यक्तियों के प्रति उनके पद-दायित्व, आयु-विद्या आदि के अनुरूप यथायोग्य सम्मान , विनय, प्रेम एवं स्नेहपूर्ण व्यवहार से लिया जाता है. साथ ही दैनिक जीवन में उपयोगी महत्वपूर्ण वस्तुओं के प्रति व्यवहार भी शिष्टाचार में गर्भित है.

सदाचार :—सदाचार का सम्बन्ध व्यक्तिगत जीवन में न्याय-नीति पूर्वक आदर्शनिष्ठ, यथासंभव अहिंसक एवं सादगी पूर्ण सरल जीवन यापन की प्रवृत्ति से है. सदाचारी व्यक्ति राज्य नीति, लोक नीति एवं धर्म नीति के विरुद्ध किसी भी प्रकार के कार्यों से स्वयं को दूर ही  रखता है.

आत्म विकास की प्रारंभिक भूमिका रूप  सदाचार के अंतर्गत आने वाले आचरण के प्रमुख बिंदु निम्न प्रकार हो सकते हैं:—

(1) अन्याय एवं अनीतिपूर्ण, कानून विरुद्ध एवं लोकनिंद्य कार्यों से दूर रहना.

(2) स्थूल पांच पाप हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील सेवन (अब्रह्म) एवं अति परिग्रह रूप कार्यों से दूर रहना.

(3) स्थूल हिंसा जनित मद्य, मांस, मधु एवं चलते-फिरते त्रस जीवों से परिपूर्ण क्षीरी वृक्षों के फल एवं अन्य ऐसे ही फलों का और पशुओं की हिंसा से प्राप्त अन्य पदार्थों का सेवन स्थूल हिंसा के पाप से बचने के लिए नहीं करना. (क्षीरी वृक्ष—जिनके पत्तों को तोड़ने पर डंठल में से दूध निकलता है जैसे-बड़, पीपल, गूलर, अंजीर आदि.)

(4) रात्रि में विचरण करने वाले स्थूल-सूक्ष्म जीवों की हिंसा से बचने के लिए रात्रि भोजन न करना, कन्द-मूल के आश्रय से रहने वाले जीवों की रक्षार्थ जमीकंद -आलू, मूली आदि का सेवन न करना. वैदिक शास्त्रों में भी रात्रि भोजन एवं कन्द मूल (अनन्तकाय) के सेवन को नरक का द्वार कहा गया है.

(5) सप्त व्यसन रूप लोकनिंद्य  पापरूप इन्द्रिय विषयों की तीव्र लालसा जनित प्रवृत्तियों से दूर रहना. ये हैं–जुआ, चोरी, शराब या नशे का सेवन, शिकार खेलना, मांस भक्षण, परस्त्री सेवन एवं वैश्या गमन.

(6) लौकिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता होने पर भी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं वनस्पति   का यथासंभव मितव्ययता पूर्वक प्रयोग; क्योंकि इनके आश्रय से पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक एवं वनस्पतिकायिक अर्थात इनको अपने शरीर रूप से धारण करके रहने वाले एकेन्द्रिय (मात्र स्पर्शन इन्द्रिय वाले) असंख्य जीव रहते हैं. साथ ही इनमें अन्य चलते-फिरते सूक्ष्म-स्थूल जीव भी प्रचुरता से पाए जाते हैं. अतः उन समस्त जीवों की रक्षा की भावना से सदाचारी व्यक्ति इनका न्यूनतम आवश्यक उपयोग करते हैं, अनावश्यक व्यय तो कदापि नहीं करते.

(7) दीन-दुखी, रोगी, निर्धन व्यक्तियों एवं प्राणियों के प्रति दया का भाव और उनके कष्ट निवारण हेतु तत्परता.

 (8) अपने प्रति अपराध एवं अहित करने वाले व्यक्ति के प्रति भी उदारता से व्यवहार. 

(9) कुमार्ग पर चलने वाले लोगों को उपदेश देकर सन्मार्ग पर लाने हेतु प्रयत्नशीलता, परन्तु न सुधरने पर होनहार जानकर उदासीन-द्वेष रहित प्रवृत्ति.

(10) पांचों इन्द्रियों (स्पर्शन,रसना, नासिका, नेत्र एवं कर्ण) के विषय सेवन काल में अति आसक्ति रहित वर्तन, इष्ट इन्द्रिय विषयों के प्रति भी गृद्धता-तीव्र लालसा न रखना.

(11) न्याय-नीति पूर्वक उपलब्ध भाग्य प्रमाण आजीविका में एवं भोग सामग्री में संतुष्ट रहना,अति धनार्जन न करना, न ही इस हेतु राज्य एवं लोक नीति का उल्लंघन करना.

(12) आत्म विकास की चरम अवस्था को प्राप्त वीतरागी सर्वज्ञ परमात्मा, आत्म विकास के मार्ग पर अग्रसर वीतरागी निर्ग्रन्थ गुरु-साधु एवं इनके द्वारा उपदिष्ट यथार्थ वस्तु स्वरुप के दिग्दर्शक और आत्म विकास के मार्ग के प्रतिपादक सत्शास्त्रों के प्रति लौकिक कामना से रहित मात्र गुणों के प्रति अनुराग- बहुमान पूर्वक भक्ति युक्त होकर आत्महितार्थ धर्म मार्ग पर बढ़ने के लिए उत्साह और पुरुषार्थ युक्त होना.

(13) अपने एवं अन्य समान रुचि पुरुषों के सदगुणों को बढ़ाने एवं अवगुणों को घटाने हेतु नित्य जागृति व सचेष्ट रहना. इस हेतु यथार्थ वस्तु स्वरुप के प्रतिपादक सत्शास्त्रों का यथेष्ट अध्ययन, चिंतन-मनन पूर्वक कर्तव्य-अकर्तव्य, हेय-उपादेय आदि का निर्णय कर तदनुरूप अपने श्रद्धा-ज्ञान एवं आचरण का परिष्कार करना. 

(14) शरीर एवं अन्य संयोग जीव के पूर्व कृत पाप-पुण्य कर्मों के फलानुसार होते हैं, सुख-दुःख कषाय (क्रोध,मान, माया और लोभ) एवं राग-द्वेष की मंदता और तीव्रता के अनुसार होते हैं. धर्म जीव के पुरुषार्थ साध्य है, धर्म ही वास्तविक निराकुल सुख का आधार है जो आत्मा में आचरण रूप है. अतः सदाचारी व्यक्ति जीवन में धर्म साधन हेतु सदैव तत्पर रहता है. ये धर्म साधन हेतु किये जाने वाले प्रयत्न सदाचार ही हैं.

ऐसे ही अन्य अनेक प्रकार के आचार-विचार-व्यवहार लौकिक सदाचार रूप आचरण में गर्भित किये जा सकते हैं. ये सर्व आचरण निज आत्मा से भिन्न अन्य व्यक्ति एवं वस्तुओं से सम्बंधित होने से पराधीन तथापि मंद कषाय रूप प्रवृत्तियां हैं अतः शुभाचार रूप हैं.  कषायों की तीव्रता की दशा में तो सदाचार व शिष्टाचार का स्थान स्वच्छंदता और अशिष्टता ले लेती है जो अशुभाचार रूप है तथा यह व्यक्तिगत एवं सामजिक जीवन में आकुलता का कारण है.

उपरोक्त शिष्टाचार एवं सदाचार के अंतर्गत वर्णित आचार-विचार-व्यवहार आत्म-विकास की प्रारंभिक भूमिका रूप हैं. इनके जीवन में प्रादुर्भाव के साथ ही व्यक्ति की इन्द्रिय विषयों, कषायों एवं पाप कार्यों में प्रवृत्ति निरंतर घटती जाती है तथा उसका स्थान यथाशक्ति इन्द्रिय एवं प्राणी संयम (इन्द्रियों का निग्रह एवं प्राणियों की रक्षा हेतु चेष्टा) तथा व्रत, जप, तप, स्वाध्याय आदि सहज ही ले लेते हैं. ऐसे सत्पुरुषों का जीवन श्रेष्ठ आचरण के निमित्त से सहज ही आनंदमय होता है, साथ ही वे अपने आचरण से अन्य लोगों के लिए भी आदर्श रूप होते हुए उच्च आचार-विचार हेतु प्रेरणा स्त्रोत होते हैं, इससे परिवार-समाज एवं राष्ट्र में भी सुख  -शांति-सद्भाव एवं सहयोग का वातावरण निर्मित होता है. ऐसे ही व्यक्ति आत्म विकास की इस प्रारंभिक भूमिका से अपनी धर्म भावना के बल पर उग्र पुरुषार्थ पूर्वक वास्तविक आत्म विकास की प्रक्रिया में संलग्न होकर उसके फलरूप पारलौकिक आत्मिक निराकुल सुख को भी उपलब्ध कर अपने मानव जीवन को सार्थक करते हैं.