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आत्मा – एक द्रव्य के रूप में अध्ययन

अनात्मवादी वैज्ञानिक युग:- वर्तमान आधुनिक वैज्ञानिक युग न केवल भौतिक, वरन् सामाजिक, राजनैतिक एवं मानसिक परिवर्तनों का एक मात्र आधार एवं प्रेरक है इसने जहां जीवन के सभी पक्षों से सम्बन्धित अनेक नई अवधारणाओं को जन्म दिया है वहीं इसने अनेक प्राचीन मान्यताओं, सिद्धान्तों एवं परम्पराओं को भी अविश्वसनीय एवं अनुपयोगी ठहरा दिया है। इस का सर्वाधिक प्रभाव आधुनिक शिक्षा प्राप्त, सम्पन्न एवं समृद्धिशील युवा व प्रौढ़ पीढ़ी पर हुआ है जो भौतिक विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरने में असफल रही मान्यताओं को निरस्त करने में जरा भी संकोच नहीं करती, विज्ञान के प्रति यह विश्वास इतना घनीभूत है कि थोड़े भी व्यक्तियों या वस्तुओं पर किये गये अध्ययन या प्रयोगों के निष्कर्षों को वह तुरन्त ही आत्मसात् करने हेतु तत्पर रहती है, भले ही वे निष्कर्ष बाद के अध्ययनों में मिथ्या भी सिद्ध हो जाने वाले हों।

प्राचीन काल से ही विश्व के प्रसिद्ध दर्शनकारों ने, मनीषी महर्षियों ने आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार किया है, साथ ही आत्मा के स्वभाव शक्तियों, कार्यों, वर्तमान दुःखमय संसार दशा एवं उससे मुक्ति के उपायों पर भी विचार किया है। एक चार्वाक दर्शन ऐसा है जो आत्मा के पृथक् अस्तित्व को स्वीकार न कर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश इन पंच महाभूतों के संयोग से जीवोत्पत्ति का प्रतिपादन करता है।

आधुनिक विज्ञान ने इस चार्वाक दर्शन की मान्यता को और भी विस्तार दे दिया है क्योंकि अनेक प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोगों एवं अध्ययनों में भी आत्मा कहीं पकड़ने में नहीं आया, वैज्ञानिक उपकरण उसके अस्तित्व को प्रमाणित करने में सर्वथा असफल रहे। चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक प्रविधियों ने (माइक्रो बायोलॉजी, अंगों का प्रयोग शाला में विकास एवं प्रत्यारोपण), कम्प्यूटर क्रान्ति ने और अब कृत्रिम बुद्धि के विकास के प्रयासों ने आत्मा के पृथक अस्तित्व को स्वीकार करने वालों के समक्ष चुनौती सी प्रस्तुत कर दी है।

भौतिक वैज्ञानिक उन्नति के दुष्प्रभाव:- आज की इस भौतिक उन्नति ने वर्तमान ही नहीं वरन् पूर्व (बुजुर्ग) पीढ़ी को भी भौतिकता के रंग में इस प्रकार रंग दिया है कि नैतिकता, सदाचार व संयम की सारी मर्यादायें छिन्नभिन्न हो गई हैं और मानव समाज भौतिक इन्द्रिय विषयों से प्राप्त क्षणिक सुख में ही मग्न होकर आत्म पतन के मार्ग पर निश्चिंतता से अग्रसर है। प्रबुद्ध समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक व अन्य विचारशील लोग इस पर चिन्ता तो व्यक्त करते हैं परन्तु वे भी बेबस अनुभव करते हैं क्योंकि भौतिक सुखों की लालसा से प्रेरित जीवन चर्या स्वार्थपूर्ण, सद्भाव व संवेदना शून्य एवं व्यस्त से व्यस्ततम होती जाती है।

अतः जब आत्मा-परमात्मा की, आत्म विकास की चर्चा भी की जाती है तो लोगों का सामान्य मत यह होता है कि आत्मा किसने देखा, स्वर्ग-नरक कोरी कल्पना है। अतः परलोक की चिन्ता छोड़कर वर्तमान में जीना ही श्रेयस्कर है। और ऐसी मान्यता ने व्यक्ति को अपने से और भी दूर कर दिया है। यह कहा जाता है कि विज्ञान ने जीवन को अधिक सुविधा युक्त, स्वतन्त्र एवं सक्षम बना दिया है परन्तु यथार्थ इसके सर्वथा विपरीत है। व्यक्ति अब अधिक अक्षम, साधन-सुविधाओं का गुलाम व अन्ध विश्वासी हो गया है।

इसी का नतीजा है – समाज में नये प्रकार के अंध विश्वासों का जन्म, असुरक्षा, पारस्परिक अविश्वास, अनैतिकता एवं अनाचार से ग्रस्त सामान्य जीवन का आविर्भाव, जहां शिक्षा के प्रसार के बाद भी अन्याय, अनीति व अपराधों का ग्राफ बढ़ता ही जाता है। भौतिक सुख के आकर्षण की पराकाष्ठा ने सामाजिक, भौतिक एवं मानसिक पर्यावरण को चिन्ताजनक स्तर तक प्रदूषित कर दिया है।

अध्यात्मआत्मज्ञान की आवश्यकता:- ऐसी स्थिति में प्राचीन आध्यात्मिक एवं संयमित जीवन शैली की आवश्यकता एवं महत्व और भी बढ़ गया है। इस बात की अतीव आवश्यकता है कि वर्तमान पीढ़ी को प्राचीन संतुष्ट, सुखी, संयमित एवं संतुलित जीवन शैली के आधार – अध्यात्म एवं तत्सम्बन्धी जीवन आदर्शों व सिद्धान्तों से वैज्ञानिक एवं तार्किक विधियों का प्रयोग कर परिचित कराया जावे।

इस हेतु प्रथमतः यह अनिवार्य आवश्यकता है कि व्यक्ति आत्मा के अस्तित्व से, उसके गुण-स्वभाव व उसकी सामर्थ्य से परिचित एवं आत्म सामर्थ्य का विश्वासी हो। आत्म-पतन के कारणों व आत्म विकास की विधियों व आत्मोन्नति के सुफल का उसे ज्ञान व विश्वास हो। केवल तभी वह भौतिकता के मायाजाल से मुक्त होकर वास्तविक आत्मिक सुख शान्तिमय एवं सर्वतः सन्तुष्ट जीवन जीने में सफल हो सकता है।

इसी उद्देश्य को लेकर प्रस्तुत आलेख में आत्मा के सम्बन्ध में आधुनिक पीढ़ी द्वारा उठाये जाने वाले अविश्वास जनित प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं को ध्यान में रखते हुये तर्क, अनुभव व आगम के प्रकाश में तथा वैज्ञानिक प्रयोगों की असफलता के आधार से विचार करना, आत्मा के अस्तित्व को सुनिश्चित रूप से सिद्ध करना तथा आत्मा के स्वरूप, सामर्थ्य, वर्तमान दशा एवं आत्मविकास की विधियों पर भी विचार करना अभीष्ट है।

आत्मा एवं इसके समानार्थक शब्दों के अर्थ:-

(1) आत्मा का अर्थ:- आत्मा शब्द संस्कृत भाषा के अनुसार ‘अत्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है –सतत् गमन। गमनार्थक धातुएं ज्ञान के अर्थ में भी प्रयुक्त होती हैं। अतः अत् का एक अर्थ निरन्तर जानना भी है।

आत्मा शब्द भाषा विज्ञान के अनुसार इस प्रकार निष्पन्न हैः- आत्मा = आ+अत् (धातु) + मनिन् (प्रत्यय) ‘आ’ का अर्थ है पूर्ण रूप से, ‘अत्’ अर्थात् सतत् जानना एवं ‘मनिन्’ का अर्थ है तन्मय रूप से अथवा तन्मय होकर। ‘मनिन्’ प्रत्यय, आ+अत् में जुड़ने पर आत्मन् शब्द बनता है (मनिन् में इन् का लोप हो जाने से) आत्मन् से ही ‘आत्मा’ बनता है।

इस प्रकार ‘आत्मा’ शब्द का अर्थ हुआ – पूर्ण रूप से तन्मय होकर निरन्तर जानना। ‘अत्’ का अर्थ निरन्तर गमन-परिणमन भी होने से यह पदार्थ के नित्य-निरन्तर परिणमन-परिवर्तनशील स्वभाव को भी सूचित करता है।

आधुनिक विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, उसकी अवस्था मात्र बदलती है। परिवर्तन के साथ स्थायित्व अथवा स्थापित्व के साथ परिवर्तन यही सृष्टि का शाश्वत नियम है। अतः इस सिद्धान्त के अनुसार आत्मा भी निरन्तर परिवर्तनशील एवं वस्तु रूप से ध्रुव (स्थाई) रहने वाला पदार्थ होना चाहिये। वह ऐसा है भी।

वर्तमान जीवन में जन्म से लेकर वर्तमान समय तक के अर्जित ज्ञान व अनुभूत सुखादि से, राग-द्वेष आदि भावों के परिवर्तनों व पुनर्जन्म की घटनाओं से आत्मा का स्थायित्व के साथ परिवर्तनशीलता का स्वभाव अथवा आत्मा की उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मकता स्वतः सिद्ध है। ‘आत्मा’ की इस पूरी व्याख्या से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि आत्मा नामक पदार्थ या द्रव्य मात्र जानने-देखने, अनुभव करने के ही स्वभाव वाला होने से मात्र ज्ञाता-दृष्टा है। जड़ पदार्थों को बनाना, बिगाड़ना, उनमें परिवर्तन करना अथवा उनका उपयोग-यह सब इसके कार्य की सीमा से बाहर ही है।

(2) आत्मवाची समानार्थक मुख्य शब्द और उनके अर्थ:-

() ‘जीव का अर्थ:- ‘जो जीवे सो जीव’ ऐसा सूत्र वाक्य है। जो जीता है, जिसमें जीवन है उसे जीव कहते हैं।

‘जीवन’ शब्द ‘जीव’ शब्द में ‘न’प्रत्यय लगने से बनता है। ‘न’ प्रत्यय क्रिया की निरन्तरता का सूचक है, अतः जीवन का अर्थ हुआ – जीवरूप से निरन्तर रहना और यह कार्य जीव के अतिरिक्त अन्य का नहीं हो सकता। क्योंकि शरीर को जीव द्वारा त्याग देने के बाद उसमें जीव का अभाव हो जाने से जीव के स्वभाव से सम्बंधित सारी ही क्रियाएं अर्थात् जीवन की क्रियाएं भी समाप्त हो जाती है। जबकि शरीर अपने पूर्ण स्वरूप-संरचना के साथ यथावस्थित पड़ा रहता है।

जीवन अर्थात् जानने-देखने, सुख-दुःख का अनुभव करने वाले जीव का जीव रूप से रहना/जीवित रहना। जब तक किसी शरीर में सक्रिय इन्द्रियाँ, मन, वचन, काय बल, आयु एवं श्वासोच्छवास पाये जाते हैं तब तक उसमें जीवन की जानने-देखने, सुख-दुःख का अनुभव करने की क्रियाओं का अथवा तो राग-द्वेष, क्रोध-मान आदि विकार रूप (दोषपूर्ण) भावों का अस्तित्व भी पाया जाता है और तब तक ही उसमें जीवन का अस्तित्व स्वीकार किया गया है, उसे जीवित कहा जाता है।

साथ ही सुख-दुःख का अनुभव एवं रागादि विकार भी ज्ञानपूर्वक ही होते हैं, अतः जीव का मुख्य स्वभाव एवं कार्य जानना सिद्ध होता है। इस प्रकार आत्मा ही जीव है और जीव ही आत्मा है।

() चेतन का अर्थ:- चेतन शब्द चेत+न (प्रत्यय) मिलकर बना है, तथा चेत शब्द ‘चित्’ धातु से निष्पन्न होता है। जिसका अर्थ है:- जानना, देखना, समझना, सतर्क होना आदि। अतः चेतन शब्द – चेत+न (प्रत्यय) मिलकर बना होने से यह भी जानने-देखने, समझने, सतर्क होने रूप कार्य की निरन्तरता का सूचक है। फलतः जिसमें ये क्रियायें होती हैं वह चेतन वस्तु है।

लगभग 50-60 वर्ष पूर्व माताएं बच्चों को प्रातः जगाते समय कहा करती थीं, ‘उठो बेटा! चेत करो, उठो। यहां इस कथन का तात्पर्य यह था कि रात्रि पर्यन्त तुम अपने चेतने सम्बन्धी (जानने-देखने, सीखने-समझने सम्बन्धी) कार्यों से निद्रा की दशा में विरत रहे हो, अब सूर्योदय हो गया है अतः तुम उठो और अपने जानने-देखने रूप कार्य में लग जाओ, जाग्रत हो जाओ।

वास्तव में तो चेतन का चेतने सम्बन्धी कार्य निद्रावस्था में भी स्वप्नादि के देखने रूप से अथवा अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प, विचार आदि के रूप में निरन्तर चलता ही रहता है जो चेतन वस्तु के चेतने रूप स्वभाव की निरन्तर क्रियाशीलता का ही द्योतन करता है। चेतन होने की योग्यता अथवा स्वभाव को ही चैतन्य कहते हैं, इसे ही चेतना भी कहा जाता है। इस प्रकार जो आत्मा है, वही जीव है, वही चेतन है।

आत्मा के अस्तित्व की सिद्धि:-

आत्मा व इसके समानार्थक जीव व चेतन शब्दों की व्याख्या समझ में आने पर आत्मा नामक चेतन पदार्थ के अस्तित्व में कोई संदेह रहना नहीं चाहिये। परन्तु अनेक विचारकों के अनेक मन्तव्य होने से, वैज्ञानिकों द्वारा आत्मा के अस्तित्व की पुष्टि न होने से आत्मा नामक वस्तु के स्पष्ट अस्तित्व के प्रति संदेह होना स्वाभाविक है।

आत्मा नामक वस्तु का स्वतन्त्र अस्तित्व है इसे सिद्ध अथवा स्वीकार करने के लिये निम्न बिन्दुओं पर दृष्टिपात करना उपयोगी रहेगा।

(1) कोई भी शब्द निरर्थक नहीं होता:- इस विश्व में जितने भी वाचक शब्द हैं उनसे सम्बन्धित वाच्य वस्तु का सदैव ही सद्भाव पाया जाता है। चाहे वह किसी भी भाषा का हो। वह वस्तु कोई द्रव्य, उसका कोई गुण या स्वभाव अथवा उसकी कोई दशा (पर्याय) हो सकती है। यदि नई वस्तुओं का आविष्कार होता है तो उसके लिये नये शब्द भी बनाये जाते हैं जैसा कि आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के तीव्र प्रवाह के इस युग में देखा जा रहा है। पुराने लोगों ने जिन कम्प्यूटर, मोबाइल, राकेट, चिप, स्टार्टअप आदि शब्दों के बारे में पढ़ा भी नहीं था, वे आज के बच्चों की जुबान पर भी चढ़े हुये हैं।

यदि यह कहा जाये कि बन्ध्या-पुत्र, आकाश-कुसुम जैसे शब्द तो हैं परन्तु ये वस्तुएं तो देखी नहीं जाती। इसका उत्तर यह है कि ये शब्द नहीं, शब्द युग्म हैं जो असम्भव अस्तित्व हीन वस्तुओं को इंगित करते हैं। वास्तव में मूल शब्द तो बन्ध्या (स्त्री), पुत्र, आकाश और कुसुम हैं ओैर इनका अस्तित्व तो जगत में सुविदित है।

उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि आत्मा नामक शब्द यदि लोक व्यवहार में सुप्रचलित है तो आत्मा नामक पदार्थ भी जगत में होना ही चाहिये। असत् (अस्तित्वहीन) पदार्थों के लिये लोक व्यवहार में भी कोई शब्द प्रचलित नहीं होता।

(2) विश्व को जानने वाला कोई तो भिन्न चेतन पदार्थ होना ही चाहिये:- वास्तव में तो यह विश्व चेतन-अचेतन पदार्थों का समुदाय है जहां सभी अपनी पृथक् सत्ता को कायम रखते हुये एक साथ रहते हैं तथा कार्य रूप परिणमन (अवस्था परिवर्तन) भी अपने स्वभावानुसार उनमें सहज ही होता रहता है। यदि विश्व में मात्र अचेतन द्रव्यों का ही अस्तित्व स्वीकार किया जाये तो उनके जानने वाले भिन्न द्रव्य के अभाव में विश्व व उसके घटक द्रव्यों का अस्तित्व ही निरर्थक हो जाता है।

यदि जानने वाला ही न हो तो विश्व के जानने में आने योग्य पदार्थों के अस्तित्व का क्या अर्थ है? यदि यह कहा जाये कि भोजन-पानी, हवा, व स्त्री-पुरूष के रज-वीर्य से मिलकर बना यह शरीर ही चेतनता को प्राप्त होकर जानने-देखने, अनुभव करने की सामर्थ्य वाला हो जाता है और शरीर की स्थिति तक (आयु प्रमाण) वह जानता-देखता भी रहता है, तो यह बात युक्ति संगत नहीं है। क्योंकि ऐसा मानने पर जन्म-मृत्यु की, आयु की बात कोरी कल्पना ही होगी। वास्तव में तो अनेक अचेतन पदार्थों से मिलने पर भी उनमें मूलतः चेतना का अभाव होने से उनके यथा विधि संयोग से निर्मित शरीर में चेतना का उत्पन्न होना असंभव है।

अतः जगत के अचेतन, जड़ पदार्थों को जानने वाला कोई चेतना संयुक्त, जानने-देखने के स्वभाव वाला भिन्न द्रव्य होना ही चाहिये और ऐसा है भी क्योंकि विश्व एवं उसके घटक द्रव्यों को देखना जानना यह तो प्रत्यक्ष ही है। यह देखने-जानने वाला पदार्थ ही आत्मा है।

(3) जन्म मृत्यु का होना आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करता है:- नवीन देह को आत्मा के द्वारा धारण करना जन्म कहलाता है और वर्तमान शरीर को त्याग देना ही मृत्यु कहलाता है। संसार अवस्था में आत्मा अपने कर्मानुसार अलग-अलग जड़ शरीरों को धारण करता हुआ एवं उस शरीर में अपनी आयु पूर्ण कर उसको छोड़ता और पुनः नवीन देह धारण करता रहता है। शरीर व आत्मा का संयोग होने पर जीवन की क्रियाएं प्रारम्भ होती हैं और इनका वियोग होने पर वे समाप्त भी हो जाती हैं। परन्तु जीव और शरीर कभी समाप्त नहीं होते, इनका मात्र रूपान्तरण होता है।

मृत्यु के बाद भी जड़ शरीर व उसके अंगोपांग तो वही रहते हैं, परन्तु उनमें आत्मा के अस्तित्व के कारण चलने वाली जीवन की क्रियाएं समाप्त हो जाती हैं। इससे सिद्ध होता है कि शरीर कहीं मरता नहीं है, वह तो जीवित अवस्था में एवं मृत्यु के बाद की अवस्था में भी समान ही रहता है। अतः वहां जीवन का आधारभूत कोई अन्य पदार्थ अवश्य ही उससे भिन्न होना चाहिये जो जानने-देखने वाला, सुख-दुःख का अनुभव करने के स्वभाव वाला हो, वही आत्मा है।

वास्तव में तो जीवित प्राणी का शरीर एवं मृत शरीर दोनों ही अचेतन है। आत्मा ही एक मात्र चेतन पदार्थ है जिसके निमित्त से उस शरीर में जीवन के लक्षण देखे जाते हैं। जीवन की सारी मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओं के पीछे भी मूलतः तो ज्ञान ही है जो आत्मा का विशिष्ट स्वभाव है तथा जो जीवन की क्रियाओं के परिवर्तन के क्रम में भी सदाकाल विद्यमान रहता है। इस प्रकार भी आत्मा का पृथक् अस्तित्व सिद्ध होता है।

(4) आयु का व्यवहार आत्मा की पृथक सत्ता का परिचायक है:- आयु का व्यवहार विश्व व्यापी है। जब दो व्यक्ति मिलते हैं तो जिज्ञासावश आयु भी पूछ ली जाती है। आयु अर्थात किसी आत्मा की उस शरीर में व्यतीत की गई समयावधि। इस प्रकार आयु का व्यवहार आत्मा के किसी शरीर में रहने की अवधि जानने के सम्बन्ध में होता है।

शरीर जिन जड़ परमाणुओं का बना है वे तो शाश्वत हैं और उनका परिणमन रूप कार्य निरन्तर चलता रहता है। उन जड़ परमाणुओं के विशिष्ट प्रकार के संयोग को ही शरीर कहा जाता है जिसको अपना आश्रय स्थल बनाकर कोई जीव उसमें रहता है। प्रत्येक जीव का अपने-अपने भाव रूप कर्मानुसार अपने शरीर में रहने का समय भी निश्चित होता है और समयावधि पूरी होते ही जीव उस पुराने शरीर को छोड़कर नये शरीर में चला जाता है। इस अवधि को ही उस जीव की उस शरीर में रहने की आयु कहा जाता है। इससे सिद्ध होता है कि आयु का लोक व्यवहार भी शरीर से भिन्न आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करता है।

(5) पुनर्जन्म पूर्वजन्म की स्मृति:- समाचार पत्रों में यदा-कदा प्रकाशित होने वाले पुनर्जन्म व पूर्वजन्म की स्मृति के समाचार भी इस शरीर से भिन्न किसी चेतन पदार्थ के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। किसी-किसी व्यक्ति को (जीव को) मृत्यु के बाद धारित नवीन जन्म में पूर्व भव (पूर्व जन्म) की स्मृति उत्पन्न हो जाती है। उस व्यक्ति द्वारा पूर्व जन्म का विवरण बताये जाने एवं परीक्षण किये जाने पर सत्य भी पाया जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि पूर्व देह को छोड़कर आया हुआ जीव ही नवीन देह को धारण कर नवीन स्थान पर उत्पन्न हुआ है। चूंकि जीव का स्वभाव ही जानना-देखना है, और कोई भी द्रव्य कभी भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता, इस नियम से वह जीव अपने ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव सहित ही नये स्थान पर उत्पन्न होता है। किसी किसी जीव को किसी समय में अपने ज्ञान स्वभाव के पूर्व जन्म की स्मृति रूप विकास को प्राप्त हो जाने पर ही वह पूर्वजन्म का विवरण बता पाता है। यह पूर्व जन्म की स्मृति रूप ज्ञान का विकास सब जीवों को नहीं होता।

पर्वू जन्म की स्मृति एवं नवीन देह का धारण, आत्मा के शरीर से भिन्न अस्तित्व को तथा अस्तित्व की निरन्तरता को सिद्ध करता है। शरीर जड़ है अतः मृत्यूपरान्त उसको नष्ट कर दिया जाता है अथवा नष्ट होने के लिये छोड़ दिया जाता है और शरीर व इन्द्रियों की क्रियाओं के माध्यम से अपने अस्तित्व की घोषणा करने वाला आत्मा अन्यत्र नवीन देह धारण कर लेता है।

(6) व्यंतरों (भूतप्रेतों, प्रेतात्माओं का) का अस्तित्व:- विश्व में भूत-प्रेतों, प्रेतात्माओं का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है। ये भूत-प्रेत व्यंतर जाति के देव होते हैं जो सामान्यतः तीव्र राग या द्वेष रूप प्रकृति वाले या तीव्र अहंकारी होते हैं। ये अपने तीव्र राग या द्वेष के कारण स्वयं को उपलब्ध विशिष्ट ज्ञानजन्य स्मृति का उपयोग करके अपने पूर्व जन्मों से सम्बन्धित प्रियजनों का हित करने के लिये अथवा शत्रुओं को परेशान-पीड़ित करने के लिये अथवा तीव्र अहंकार की पूर्ति हेतु अनेक प्रकार की कौतूहल पूर्ण क्रियाएं अदृश्य रहकर करते रहते हैं। अनेक भुक्तभोगी व्यक्तियों के अनुभव इनकी उपस्थिति की साक्षी देते हैं।

प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध में मारे गये अनेक विमान पायलटों व सैनिकों की आत्माओं द्वारा परवर्ती युद्ध काल में पायलटों व सैनिक दुकड़ियों का मार्ग दर्शन किये जाने की घटनाएं प्रसिद्ध हैं। वे और कोई नहीं, मृत पूर्व सैनिकों व पायलटों की आत्माएं ही हैं जो मृत्यूपरान्त व्यंतरों (भूत-प्रेतों) के रूप में देवयोनि में उत्पन्न हुई हैं। उदयपुर (राज.) की दो घटनाएं एवं जबलपुर (म.प्र.) की एक घटना प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुभव अनुसार भूत-प्रेतों के अस्तित्व को प्रमाणित करती हैं।

यदि आत्मा न हो तो भूत-प्रेतों द्वारा पूर्व जन्मों के इष्ट-अनिष्ट व्यक्तियों का हित-अहित करना किस प्रकार संभव है, क्योंकि उनके द्वारा पूर्व में धारित शरीर तो बहुत पहले ही नष्ट किया जा चुका होता है।

(7) परकाया प्रवेश की प्राचीन घटनाएं उल्लेख:-

महर्षि पतंजलि प्रणीत ‘योग सूत्र’भारतीय अध्यात्म वि द्या में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। उसमें योग साधना पूर्वक उपलब्ध परकाया प्रवेश सम्बन्धी सामर्थ्य  एवं विधियों का भी उल्लेख किया गया है (योग सूत्र, विभूतिपाद, सूत्र-38)। प्राचीन साहित्य में ऐसे योगियों के विवरण मिलते हैं जो परकाया प्रवेश की विद्या में पारंगत थे। आदि शंकराचार्य के सम्बन्ध में भी ऐसा उल्लेख उपलब्ध होता है जिसमें उन्होंने किसी प्रश्न का समाधान पाने के लिये एक सद्यः मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया था और उद्देश्य पूरा होते ही वे अपने पूर्व शरीर में वापस आ गये थे। (संदर्भ-जगतगुरू शंकराचार्य (उपन्यास) लेखक-जनार्दनराय नागर)

जैन धर्म के आचार्य शुभचन्द्र द्वारा रचित ‘ज्ञानार्णव’ नामक ग्रन्थ में भी योगियों के लिये पर-काया प्रवेश की विधि का विवेचन किया गया है। (सर्ग-29, श्लोक क्र. 93 से 102 तक) यह ग्रन्थ जैन योग साधना का प्रतिष्ठापक महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है।

सन् 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ के दिनों में भारत म्यांमार सीमा पर तैनात पश्चिमी कमान के कमाण्डेन्ट श्री एल.पी. फेरेल ने एक वृद्ध साधु द्वारा मृत युवक के शरीर में प्रवेश की प्रत्यक्ष घटना का तथा देह परिवर्तन के बाद नवीन युवा देह धारक उस संन्यासी से बातचीत का वर्णन किया है। जो बाद में नई दिल्ली-भारत से प्रकाशित ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के 17 मई 1959 के अंक में स्वयं श्री फेरेल द्वारा छपवाया गया था। यही घटना बाद में मथुरा (उ.प्र., भारत) से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ के मई 1970 के अंक में भी प्रकाशित हुई थी।

यद्यपि शास्त्रकारों ने आत्म कल्याण की दृष्टि से इस विद्या को महत्वहीन माना है तथा येाग साधकों को इस विद्या के आकर्षण से बचकर मात्र आत्मलीनता पूर्वक उत्पन्न आत्मिक आनन्द की प्राप्ति के लिये ही उद्यमी रहने का निर्देश दिया है। परन्तु इस प्रकार की घटना दो शरीरों से भिन्न उनमें रहने वाले एक सचेतन पदार्थ आत्मा के अस्तित्व को तो सिद्ध करती ही है। इससे शरीर स्वभावतः ही जड़ अचेतन सिद्ध हो जाता है और उससे भिन्न ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव वाला आत्मा भी।

(8) पंच महाभूतों से रचित जड़ शरीर चेतना का आधार नहीं है:- भौतिकता की चकाचौंध से प्रभावित ‘खाओ-पियो और मौज करो’ को ही जीवन का एक मात्र कार्य-उद्देश्य मानने वाले लोग ऐसा मानते हैं कि जीवन मात्र वर्तमान शरीर की अवस्थिति तक ही है, मरने के बाद तो कुछ भी नहीं है, स्वर्ग-नरक सब यहीं है, अलग से ऐसा कोई स्थान व योनि नहीं है। ऐसे लोग आत्मा के अस्तित्व को, अस्तित्व की निरन्तरता को स्वीकार नहीं करते। लेकिन यह मान्यता यथार्थ नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा माना जाये तो भोजन बनाते समय भगोनी, देगची आदि बर्तनों में पांचों ही महाभूतों का समवाय (मिलना, एकत्र होना) हो जाता है तो फिर वहां जीवोत्पत्ति क्यों नहीं होती, बल्कि वहां तो यदि कोई सूक्ष्म जीव खाद्य सामग्री में रह गया हो तो वह भी मर जाता है। यदि शरीर मात्र को ही जीवन का, ज्ञान का आधार माना जाये तो फिर जीव का ध्यान अन्यत्र होने पर भी इन्द्रियां सदैव विद्यमान एवं खुली होने से तथा उनके सम्बन्धित विषयों का संयोग होने पर उन विषयों का ज्ञान हो जाना चाहिये क्योंकि इन्द्रियों का उन विषयों से संयोग तो हुआ है। परन्तु ध्यान अन्यत्र होने पर उन विषयों का ग्रहण नहीं होता, ज्ञान नहीं होता, उनसे सम्बन्धित सुख-दुःख भी नहीं होता, क्योंकि ध्यान अन्यत्र होने पर ज्ञान भी अन्यत्र ही होता है, इन्द्रियों से जुड़ा हुआ नहीं रह जाता।

इससे सिद्ध होता है कि जड़ शरीर के अवयवभूत इन्द्रियां ज्ञान का आधार नहीं हैं, ज्ञान का आधार तो ज्ञान-ध्यानरूप चेतना जिसका स्वभाव है ऐसा आत्मा ही है और वह शरीर से भिन्न ही है।

(9) जीव विज्ञान के अनुसार आत्मा की सिद्धि:- आधुनिक विज्ञान के अनुसार मृत शरीर में जीवन की सहज एवं आवश्यक क्रियाएं जैसे जनन, उत्सर्जन, भोजन ग्रहण, उर्जा उत्पादन (पाचन), पोषक तत्त्वों का विभिन्न अवयवों तक परिवहन, पोषण एवं वृद्धि आदि बन्द हो जाती हैं। जब तक जीवन का अस्तित्व है तब तक ही उक्त क्रियाओं का सद्भाव पाया जाता है और जीवन जीव की उपस्थिति में ही संभव होता है।

जीव विज्ञान (बायोलॉजी) के अनुसार शरीर की कोशिका चाहे वह जन्तु कोशिका हो अथवा वनस्पति कोशिका, शरीर की सबसे छोटी इकाई है। कोशिका में भी जीवन की उक्त सारी क्रियाएं निरन्तर होती रहती हैं और जब कोशिका मर जाती है तब उसका स्थान नई कोशिका ले लेती है। इन कोशिकाओं के समूह से शरीर के ऊतक, कई ऊतकों से मिलकर एक अवयव, कई अवयवों से मिलकर शरीर का एक संस्थान (जैसे पाचन-श्वसन-जनन-उत्सर्जन-रक्त परिवहन-अस्थि संस्थान एवं तंत्रिका तंत्र आदि) बनते हैं और कई संस्थानों से मिलकर एक विकसित प्राणी का शरीर बनता है। यहां भिन्न भिन्न अवयवों की कोशिका रचना भिन्न भिन्न होती है परन्तु उनका मूल स्वरूप समान ही रहता है। सबसे छोटा जीव एक कोशिकीय (प्रोटोजोआ) होता है तथा अन्य विकसित जीवों में क्रमशः अधिक कोशिकाएं व उनसे निर्मित अनेक अंगोपागं होते हैं। परन्तु ये शरीर या इसके सूक्ष्म-स्थूल अवयव तभी तक क्रियाशील रहते हैं जब तक कि उनमें जीव का (आत्मा का) अस्तित्व है। आत्मा द्वारा उस शरीर को छोड़ देने के समय से ही उसमें जीवन की सारी क्रियाएं सदा के लिये समाप्त हो जाती है।

यदि शरीर को ही आत्मा का पर्याय मान लिया जाये तो सारी चिकित्सकीय जांचों में स्वस्थ घोषित व्यक्ति का भी प्राणान्त कैसे संभव होगा? जबकि स्वस्थ घोषित व्यक्ति भी मरते तो देखे जाते हैं और बाद में ऐसे लोगों के अंगो का प्रत्यारोपण अस्वस्थ व्यक्ति के शरीर में किया भी जाता है। जब वह अंग सही है तो उसे पूर्व शरीर में कार्य करना चाहिये, परन्तु वह नहीं करता क्योंकि पूर्व शरीर में जीवन के आधारभूत आत्मा का अभाव हो गया है। वही अवयव नवीन शरीर में आत्मा का अस्तित्व होने से प्रत्यारोपण के बाद सक्रिय हो जाता है।

कई बार न्यायिक मामलों में शवों का पुनः पुनः पोस्टमार्टम अथवा तो उनकी (डी.एन.ए.) जांच भी की जाती है। वहां भी अवयवों की स्थिति अथवा कोशिका की रचना वही की वही रहती है। उसमें क्रोमोसोम व जीन्स के अणु भी यथावस्थित रहते हैं परन्तु जीवन की क्रिया नहीं होती। कारण एक ही है कि वहां आत्मा का सद्भाव नहीं है। साथ ही आत्मा द्वारा शरीर का त्याग करने पर वह शरीर या तो सूखने लगता है अथवा सड़ने लगता है। पेड़ों की लकड़ी तथा खान से निकले पत्थर आदि मूल पेड़ या खान से अलग करने पर सूख जाते है । फल, सब्जियां मूल पौधे से अलग होने पर बढ़ना बन्द कर देते हैं । और कुछ काल बाद ही उसमें विद्यमान पोषक तत्त्वों का आश्रय पाकर नये सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होने लगती है जो उस फल या सब्जी का भक्षण कर उसके मूल स्वरूप को विघटित कर देते हैं। परन्तु पूर्व मूल आत्मा का अभाव हो जाने पर उन मृत कोशिकाओं में वृद्धि या विकास रूप जीवन की क्रियाओं का (पत्र-पुष्प-फल आदि उत्पत्ति रूप) अभाव पाया जाता है। जबकि अभक्ष्य कहे जाने वाले जमीकन्द (आलू आदि) में जीवों का सद्भाव होने से, मूल पौधे से अलग कर देने पर भी श्वसन, पोषण एवं वृद्धि आदि जीवन के लक्षण पाये जाते हैं।

आधुनिक विज्ञान एक कोशिका को जीवन की पूर्ण एवं स्वतन्त्र इकाई मानता है तो उसके आश्रय से एक स्वतन्त्र एक कोशीय जीव भी रहना चाहिये। इसलिये कोशिका में होने वाली जीवन की सारी ही क्रियाऐं अन्य समानजातीय कोशिकाओं के सदृश होने पर भी उनसे स्वतन्त्र ही होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक शरीर अनेक सूक्ष्म जीवों के आश्रय रूप अनेक कोशिकाओं से निर्मित होता है और उस विशाल शरीर के आश्रय से एक भिन्न जीव (मुख्य जीव) रहता है। और इस मुख्य जीव के द्वारा उस शरीर को छोड़ने के साथ ही उसके अवयवभूत कोशिकाएं भी मर जाती हैं अर्थात उनके आश्रय से रहने वाले जीव भी उन कोशिकाओं को त्याग देते हैं। इसके बाद भी कोशिकाओं की मूल रचना वही रहती है, उनमें सूखने की प्रक्रिया के चलते तरलता का अभाव हो जाता है। परन्तु जिनमें नमी बहुत अधिक होती है, वे नये जीवों के द्वारा उन कोशिकाओं को, उनके अवयवों को अथवा उनके समुदाय को अपना आश्रय स्थल बना लेने से, तथा उन्हीं कोशिकाओं में विद्यमान पोषक तत्वों को भोजन के रूप में ग्रहण करने से उनमें सड़ने की-विघटन की एवं नई कोशिकाओं के निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। परन्तु मूल कोशिका की जीवन की क्रियायें तो प्रारम्भ नहीं होती।

प्रश्न:- यहां यह प्रश्न भी उपस्थित हो सकता है कि एक शरीर में अनेक जीवों का अस्तित्व किस प्रकार संभव है?

उत्तर:- इसमें कोई बाधा नहीं है। आधुनिक विज्ञान इस बात को स्वीकार कर चुका है कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में अनेक प्रकार की कोशिकाएं, अनेक प्रकार के सूक्ष्म-स्थूल कृमि, बैक्टीरिया व पाचक रस (एन्जाइम) पाये जाते हैं और उन जीवों के कार्य एवं प्रकृति भी भिन्न-भिन्न पाई गई है। बैक्टीरिया, एन्जाइम व वायरस को जीव माना गया है और रोगोत्पत्ति की दशा में उनको नष्ट करने के लिये एन्टीबायोटिक एवं एन्टीवायरल दवाएं दी जाती हैं। वास्तव में तो आत्मा अमूर्त-इन्द्रियों से अग्राह्य एवं प्रकाश तत्त्व है, जैसे एक कक्ष में अनेक दीपकों का प्रकाश अपने पृथक अस्तित्व सहित सहज निर्बाधरूप से रह सकता है उसी प्रकार एक शरीर के एवं उसके अवयवों के आश्रय से अनेक सूक्ष्म-स्थूल जीव एवं उस पूरे शरीर में व्याप्त एक मुख्य जीव भी रह सकता है।

इस प्रकार जीवन का एक मात्र आधार आत्मा ही सिद्ध होता है, शरीर या उसके अवयवभूत जड़ कोशिकाएं नहीं। इस प्रकार भी शरीर से भिन्न आत्मा के अस्तित्व की सिद्ध होती है।

(10) नवोत्पन्न पशु एवं मानव शिशुओं की क्रियाएं पूर्वार्जित ज्ञान जन्य संस्कारों का परिचय देती हैं :- सामान्यतः यह माना जाता है कि पंचेन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, नासिका, नेत्र, कान-इन्द्रियाँ) एवं मनयुक्त पशु (पालतु पशु) एवं मानव सिखाने पर नया ज्ञान व कौशल अर्जित करते हैं। परन्तु हम देखते हैं कि उत्पन्न होने के साथ ही मानव शिशु अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों के प्रति हंसने व रोने के रूप में अपनी प्रतिक्रिया देना, स्तनपान करना आदि प्रारम्भ कर देते हैं। पशुओं में भी शिशु अपनी माँ के स्तन ढूंढ लेते हैं और स्तनपान कर क्षुधा-तृप्ति कर लेते हैं, वे अपनी माँ को पहचानने में कभी गलती नहीं करते। अन्य सूक्ष्म-स्थूल कीट-पतंगे भी अपनी जरूरत के अनुसार भोजन, आवास आदि की व्यवस्था कर ही लेते हैं।

उक्त सब बातें इस बात की साक्षी हैं कि नवोत्पन्न मानव या पशु शिशु भी कुछ न कुछ आधारभूत ज्ञान जन्म से ही लिये हुये है जिसके बल पर वह अपनी मूलभूत अवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है। वह सुखी अथवा दुखी भी होता है। इससे बिना किसी से सीखे ही उसके इष्ट-अनिष्ट पदार्थों के या स्थितियों के ज्ञान व उनकी प्राप्ति व अप्राप्ति के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की सामर्थ्य की सिद्धि होती है।

यदि आत्मा का अस्तित्व स्वीकार न किया जाये तो प्रश्न यह उठता है कि अचेतन पदार्थों से निर्मित नये जड़ शरीर में यह ज्ञान-सामर्थ्य यह सुख-दुःख आया कहां से? इससे ही यह सिद्ध होता है कि उस अचेतन नव विकसित शरीर में कोई अन्य जानने-देखने वाला, सुख-दुःख का अनुभव करने वाला चेतन पदार्थ (पूर्व शरीर को छोड़कर आया हुआ) विद्यमान होना चाहिये क्योंकि जीवों द्वारा पूर्व जन्मों में अर्जित ज्ञान ही संस्कार रूप में अगले जन्मों में व्यक्त होता है।

इस प्रकार नवोत्पन्न शिशुओं की सहज क्रियाओं से भी पूर्व जीर्ण शरीर को छोड़कर नये शरीर को धारण करने वाले ज्ञान-दर्शन स्वभावी आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व की सिद्धि होती है।

(11) बुद्धि, इच्छा एवं शारीरिक प्रयत्नों में विरोधाभास से आत्मा की सिद्धि:-

यदि जीवित प्राणियों के द्वारा की जाने वाली क्रियाओं का विश्लेषण किया जावे तो उनके किसी भी कार्य को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। उनमें सर्वप्रथम है-ज्ञान अथवा बुद्धि – जो पदार्थों का अथवा अपने लक्ष्यों के औचित्य का, उनकी हेयोपादेयता का, इष्ट-अनिष्टपने का अध्ययन, विश्लेषण एवं निर्णय करने के लिये उत्तरदायी है।

दूसरा है-मन, इच्छा अथवा राग-द्वेष। राग इष्ट पदार्थों (हितकर-इच्छित) की प्राप्ति हेतु जीव में उत्पन्न भाव (भावना, विकल्प, विचार) है जो इष्ट पदार्थों के संरक्षण-संवर्धन से भी सम्बन्धित है, तथा द्वेष अनिष्ट (अहितकर-अनिच्छित) पदार्थों की अप्राप्ति एवं उनको दूर करने, नष्ट करने से सम्बन्धित जीव के भावों से सम्बन्धित है। जीव के सभी स्व एवं पर से सम्बन्धित अथवा अहंकार-ममकार से सम्बन्धित भाव, क्रोधादि सभी कषायें, भावनाएं आदि राग-द्वेष में गर्भित हो जाते हैं।

तीसरा है बुद्धि के निर्णयानुसार अथवा राग-द्वेषादि जनित इच्छा अनुसार किये जाने वाले शारीरिक प्रयत्न-इनमें समस्त शाब्दिक एवं शारीरिक प्रयत्न व क्रियाएं सम्मिलित हैं जैसे एक युवक आई.ए.एस. के रूप में नियुक्ति के सुविचारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अध्ययनरत है। तो यहां इस कार्य में उक्त तीनों अवयव स्पष्टतः दिखाई दे जाते हैं:- 1. बौद्धिक निर्णय – इसके अन्तर्गत खूब सोच-विचार कर यह निर्णय लिया जाता है कि आई.ए.एस. के रूप में कार्य करना ही मेरे लिए उपयुक्त है। 2. इच्छा अथवा राग – उसे आई.ए.एस. के पद के प्रति राग या लगाव उत्पन्न हो गया है और वह इसके लिये कुछ भी श्रम करने हेतु तत्पर है और 3. इसके लिये किया जाने वाला निरन्तर अध्ययन रूप परिश्रम।

अब यदि शरीर ही आत्मा हो, आत्मा नाम का कोई भिन्न चेतन द्रव्य न हो तो ये तीनों कार्य – बुद्धि, इच्छा एवं परिश्रम एक शरीर के ही कार्य होने से इनमें पूर्ण समन्वय होना चाहिये, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है।

व्यक्ति आई.ए.एस. बनना चाहता है, इस हेतु दृढ़ संकल्पित है परन्तु बुद्धि-स्मृति, उसकी आँखें व शरीर उसका साथ नहीं देते, वे और अधिक पढ़ने से मना कर देते हैं, वह थक जाता है, पढ़ा हुआ भूल जाता है अथवा तो कदाचित् उसका मन ही पढ़ने में नहीं लगता। ऐसा क्यों होता है? जब बुद्धि, इच्छा व श्रम एक ही शरीर के तीन अवयव हैं तो उनमें यह विरूद्ध प्रवृत्ति नहीं होना चाहिये। बुद्धि के अनुसार इच्छा व श्रम होना चाहिये या इच्छानुसार बुद्धि एवं श्रम होना चाहिये अथवा श्रम की सामर्थ्य  के अनुसार बुद्धि व इच्छा होना चहिये। परन्तु ऐसा होता नहीं है। और भी, जैसे व्यक्ति गपशप में व्यस्त है, उपन्यास या चलचित्र में रमा है वहां बौद्धिक रूप से उसे पता है कि इसमें मेरा समय बर्बाद हो रहा है परन्तु इच्छा-राग बलवान है और वह लम्बा समय व्यर्थ ही गंवा देता है। तथा जैसे एक व्यक्ति को यात्रा करनी है परन्तु व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब हो जाता है।

यदि आत्मा न हो तो फिर बुद्धि, इच्छा व प्रयत्न एक ही शरीर के कार्य होने से इनमें पूर्ण तालमेल होना चाहिये, इन तीनों में कोई विरोध अथवा असहयोग नहीं होना चाहिये। परन्तु वास्तविक जीवन में इनमें विरोध (समन्वय की कमी) पाया जाता है जो यह सिद्ध करता है कि वस्तुतः श्रम या प्रयत्न का साधन शरीर भिन्न है और बुद्धि एवं राग का कर्त्ता कोई अन्य है।

यह भी स्मरणीय है कि जब एक ही व्यक्ति हो तो उसे अपने सारे कार्यों में स्वतन्त्रता होती है, वहां तालमेल या समन्वय की आवश्यकता या कमी का कोई प्रश्न ही नहीं है। परन्तु जैसे ही व्यक्ति अन्य से जुड़ता है जैसे साझेदारी या विवाह में, वहां तालमेल की आवश्यकता होती है क्योंकि जहां दो होते हैं वहां इच्छाओं अथवा हितों का टकराव होता ही है और तब उसको टालने के लिये परस्पर समन्वय व सहयोग की भी आवश्यकता होती है।

दैनिक जीवन में अनुभूत शरीर व मन-बुद्धि के संघर्ष व असहयोग इस बात को सुनिश्चिततया सिद्ध करते हैं कि मन व बुद्धि का धारक कोई ज्ञाता-दृष्टा, रागादि भावों से युक्त कोई चेतन पदार्थ शरीर से भिन्न लेकिन शरीर में ही अवस्थित होता है जो ज्ञान-बुद्धि एवं मन-इच्छा-राग-द्वेष का मूल कारक है तथा शरीर बुद्धि एवं रागादि के अनुरूप प्रयत्नों का कारक है। वह चेतन पदार्थ मन व बुद्धि का, इच्छाओं का धारक द्रव्य ही आत्मा है तथा शरीर जड़-अचेतन है। दो परस्पर विरूद्ध प्रकृति के पदार्थ एक साथ रहने से ही वहां विरोधाभास भी (बुद्धि, मन व शारीरिक श्रम के बीच पाये जाने वाले) स्वाभाविक ही हैं। इस प्रकार भी आत्मा का पृथक अस्तित्व सिद्ध होता है।

(12) मोक्ष की इच्छा आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करती है:- इस विश्व में सभी जीव दुःखी हैं और दुःखों से मुक्ति की इच्छा रखते हैं। पंचेन्द्रिय पशु एवं कीट आदि दुःखों, बन्धनों से मुक्ति के लिये निरन्तर संघर्षशील देखे जाते हैं; मनुष्य की तो बात ही क्या, उसके सारे क्रिया कलाप घर-परिवार, धन-सम्पत्ति एवं शरीर के प्रति अपनी आसक्ति रूप बन्धनों से उत्पन्न दुःख से मुक्ति के लिये ही होते हैं। जब परिवार, व्यवसाय अथवा सामाजिक-राजकीय स्थितियों जनित प्रतिकूलता अथवा शरीर की असाध्य रोग जनित असह्य वेदना सही नहीं जाती तो वह उस प्रतिकूलता से, वेदना से मुक्ति पाने के लिये छटपटा उठता है, यहां तक कि अविवेक की दशा में मृत्यु को भी गले लगा लेता है । विवेकी होने की दशा में व्यक्ति वानप्रस्थ अथवा सन्यस्त जीवन अपना कर ईश्वराराधना अथवा आत्मसाधना द्वारा संसार के दुःखों से मुक्ति का उपक्रम करने लगता है।

यह प्राणियों अथवा मनुष्यों द्वारा संसार एवं दुःखों से मुक्ति का प्रयत्न आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व को सिद्ध करता है, क्योंकि किसी शरीर मात्र का नाम कोई पशु-पक्षी अथवा मनुष्य नहीं है। शरीर की रचना तो जीवन व मृत्यु की अवस्था में समान होने से वह तो अचेतन ही सिद्ध होता है और अचेतन को कोई बन्धन नहीं, कोई दुःख भी नहीं और मुक्ति भी नहीं होती।

इससे सिद्ध होता है कि सुख-दुःख का अनुभव करने वाला, बन्धनों को अनुभव कर उनसे मुक्ति की इच्छा करने वाला कोई सुख स्वभावी, निर्बन्ध, अनुभवशील चेतन पदार्थ आत्मा, शरीर से भिन्न परन्तु शरीर में रहने वाला अवश्य ही होना चाहिये। क्योंकि जो दुखी है वही प्रयत्न पूर्वक सुखी होता है, जो बंधा है वही बन्धनों से मुक्ति का प्रयत्न कर मुक्त होता है वही आत्मा है।

(13) आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करने में विज्ञान की असफलता का कारण:-

आधुनिक विज्ञान भौतिक जड़ पदार्थों से सम्बन्धित है। विज्ञान जड़ पदार्थों के भौतिक, रासायनिक गुणों का तथा सजीव पदार्थों के शरीर की सूक्ष्म-स्थूल रचना व उनके कार्यों-विशेषताओं का अध्ययन, विश्लेषण एवं मूल्यांकन करता है, इसके लिये वह अत्याधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों, मशीनों व प्रविधियों का प्रयोग करता है। यहां मूर्त (इन्द्रिय-ग्राह्य) पदार्थों का अध्ययन-अनुसंधान मूर्त उपकरणों द्वारा किया जाता है। लेकिन आत्मा अमूर्त, ज्ञान-दर्शन-सुख आदि अनन्त गुणों के पुंज रूप चैतन्य पदार्थ है। अमूर्त अर्थात जो इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सके ऐसा पदार्थ। जो सचेतन शरीर के अवयव भूत इन्द्रियों द्वारा भी ग्रहण नहीं किया जा सकता, वह आत्मा पूर्णतः अचेतन जड़ उपकरणों द्वारा किस प्रकार देखा जा सकता है? अर्थात् नहीं देखा जा सकता।

जैसा कि इसकी परिभाषा से स्पष्ट है आत्मा ज्ञान-दर्शन स्वभाव के द्वारा जानने वाला और इस स्वभाव के द्वारा ही जानने में आने वाला पदार्थ है। इसको अनुभव किया जा सकता है परन्तु देखा नहीं जा सकता/इन्द्रिय ग्राह्य न होने से इसका भौतिक प्रयोगशाला में अध्ययन-परीक्षण भी संभव नहीं है।

जिस प्रकार बिजली के तारों में करंट रूप में बहते हुये विद्युत प्रवाह को देखा नहीं जा सकता परन्तु बल्ब, टी.वी. या अन्य विद्युत उपकरणों की क्रियाशीलता द्वारा उसके अस्तित्व का ज्ञान किया जा सकता है। करंट बिजली के तारेां में इलेक्ट्रानों के प्रवाह रूप होने से वोल्टमीटर (विभव मापी), एमीटर (धारामापी) आदि अनेक उपकरणों द्वारा उसके अस्तित्व का ज्ञान एवं परीक्षण-मापन अवश्य किया जा सकता है। करन्ट की सामर्थ्य  अनेक उपकरणों में भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों के रूप में देखी जाती है, परन्तु करन्ट का प्रवाह सर्वत्र समान ही होता है, उसकी तीव्रता (सामर्थ्य ) समय-परिस्थिति एवं उपकरण की प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है। उसी प्रकार आत्मा भी अनुभव में आने वाला एवं अनुभव पूर्वक चेतन-अचेतन सभी पदार्थों को जानने वाला अमूर्त-अतीन्द्रिय (इन्द्रियों की क्षमता-सीमा से बाहर) पदार्थ है। अनेक भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों को धारण करता हुआ यह आत्मा उन शरीरों की प्रकृति के अनुसार ही अपने जानने-देखने के स्वभाव द्वारा स्वयं के अस्तित्व की घोषणा करता है। जानने-देखने, समझने, चिन्तन-मनन आदि एवं शरीरों में पाई जाने वाली जीवन की आवश्यक क्रियाओं द्वारा यह जानने में आता है। इसमें अनुभव होने वाले सुख-दुःख का भी शरीर व मुखाकृति के अनेक रूपों द्वारा अनुमान किया जा सकता है। किसी जीव के अनुभव को कोई दूसरा जीव अनुभव नहीं कर सकता, उसकी अनुभूतियों का (सुख-दुःखादि का) अनुमान अवश्य कर सकता है। शरीर की अवयवभूत इन्द्रियां इसमें सहयोगी होती हैं। आत्मा की पर्यायगत (अवस्थागत) सामर्थ्य  उन शरीरों के माध्यम से की जाने वाली मानसिक, शाब्दिक एवं शारीरिक क्रियाओं के रूप में व्यक्त होती है परन्तु यह आत्मा की ही सामर्थ्य  होती है शरीर की नहीं क्योंकि शरीर तो जड़ है, निष्क्रिय है। शरीर की क्रियाशीलता आत्मा की उपस्थिति में ही देखी जाती है, अन्यथा नहीं। साथ ही अनेक शरीरों में पाई जाने वाली क्रियाएं भले ही अनेक प्रकार की हों, परन्तु उनमें रहने वाला आत्मा तो एक ही प्रकार का होता है।

वास्तव में तो जिस प्रकार भौतिक जड़ पदार्थों का अध्ययन करने वाला विज्ञान भौतिक विज्ञान कहलाता है, उसी प्रकार आत्मा का अध्ययन करने वाला विज्ञान अध्यात्म विज्ञान, आत्मा का विज्ञान अथवा तो वीतराग विज्ञान कहा जाता है।

निष्कर्ष:- उक्त विवेचन से यह अत्यन्त स्पष्ट है कि आत्मा एक अमूर्तिक, इन्द्रियों से अग्राह्य, ज्ञान-दर्शन-सुख आदि अनेक गुणों से युक्त चेतन पदार्थ है और यह उसके द्वारा धारित शरीर से भिन्न अस्तित्व वाला है।

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